क्या “जान” की कीमत वक्तव्य है !- अंकुर मिश्र “युगल”

आज के भारत पर आतंको की बरसात का प्रमुख कारण “हमारी सुरक्षा व्यवस्था” है !लगातार सरकार के झांसो में फस रही भोली जनता आखिर कैसे माने की वो सुरक्षित है !जब ‘पालनहार’-सरकार ही हार माँन लेती है तो जनता की क्या मजाल ......! सरकार तो यहाँ तक कह डालती है की “हम हर तरह के आतंक से निपटने में सक्षम नहीं है !” आखिर इस वक्तव्य का क्या मतलब समझा जाए! क्या हमारी सरकार केवल हर तरीके की महँगाई बढाने में माहिर है !! क्या सरकार का ध्यान देश बचाने में नहीं है !! क्या सरकार के कोषागार में धन की कमी है जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था सुधारी जा सके !!क्या जनता को इस तरह के शब्दों के साथ दहशत में लाकर आतंरिक आतंक फ़ैलाने का इरादा है !! या कुछ और .. कही इटली की याद .......!
कुछ भी हो लेकिन ऐसे वक्तव्यों के साथ सरकार के लिए जनता के कुछ प्रश्न जरुर बनते है – सरकार कह रही है की “हम ‘हर’ तरीके के हमलों से निपटने में सक्षम नहीं है “ तो सर्कार ये बताये की आखिर कौन सा ऐसा हमला है जिसे उसने रोक लिया है या भूत में रोक लिया था ,...........
क्या २६/११ के हमले को रोका नहीं जा सकता था , क्या मुंबई में हुए १९९३ या ट्रेन ब्लास्ट को राका नहीं जा सकता था, क्या संसद के हमले को रोका नहीं जा सकता था और क्या एसे अनेक हमले जो हमने झेले है उन्हें रोका नहीं जा सकता था और यदि सरकार एक भी हमला रोकने में सक्षम होती तो उसे ऐसे वक्तव्य बोलने का अधिकार था !
सोचनीय तो यह है हम करोड़ो रुपये रक्षा के लिए खर्च करते है और इन सबके बावजूद ये सब ..........! इन करोड़ों के करोड़ो का दर्द ढोता है एक साधारण व्यक्ति जिसके लिए जीविका भी मुश्किल होती है ! आज सुरक्षित भी वही है जो ऊपर है ,ये कडवा सत्य है हमने/ आपने कभी ये नहीं सुना होगा के किसी बड़े राजनेता का आतंकी हमले में स्वर्गवास हो गया ! और हो सकता है की कभी भविष्य में ऐसे समाचार सुनने को मिले भी नहीं , और जिस दिन ऐसी खबर सुनने को मिलेगी उस दिन आप देखेगे की सुरक्षा व्यवस्था में किस तरह बदलाव आते है ! परन्तु ऐसा भविष्य में होगा ही नहीं क्योंकि आज के इन सभी कांडो के पीछे ...............................................................................................!
एक और सत्य जिस पर हमनें ध्यान नहीं दिया होगा किसी गरीबी योजना का लाभ लेने के लिए जब गरीबो की पंक्ति लगती है तो हम देखते है उस पंक्ति में भी गरीब गरीबी झेल रहा होता है और सबसे पीछे खड़ा होता है !यही रवैया आज की सुरक्षा व्यवस्था पर लागू है !
आज प्रमुख रूप से सुरक्षा तो उन्हें दी जाती है जो उचे-उचे पदों पर है, जिनके पास शक्ति है ! सोचनीय यह है की उस सुरक्षा का फायदा भी वही लेते है - जो गरीबो के लिए दी गई है आखिर यहाँ भी गरीब गरीबी की योजना में गरीबी महसूस करता है , और प्रमुखतः वही इन हमलों का शिकार होता है !!
उपर्युक्त से स्पष्ट है हर छोटी से छोटी व् बड़ी से बड़ी समस्या का कारण “हमारा संचालन” और “संचालक “ है उसी की वजह से आज की समस्याए “आज” पर और “हम” पर हावी है ! भ्रष्टाचार होता है , महंगाई होती है, बलात्कार होते है और आतंकी हमले होते है ! करोड़ो के धन के साथ-साथ लाखो की जाने जाती है और प्रतिउत्तर में नेताओ के वक्तव्य आते है, वह भी ऐसे वक्तव्य जो शहीदों को लज्जित करते है ! आज के भारत को आज के सामने रखने के लिए और आज की चुनौतियों से लड़ने के लिए हमें सुद्रिड संचालक और संचालक के आवश्यकता है !

"गूगल प्लस" है "प्लस" या "माइनस" :- अंकुर मिश्र "युगल"



आज "फेसबुक" के नाम और कम से लगभग सभी परिचित होंगे ! यही वो कड़ी जिसने "सोशल" नेटवर्किंग के जरिये खुद के लिए व्यवसाय और लोगो

को जोडने के लिए एक मार्ग तैयार किया !इससे पहले भी अनेक सोशल वेबसाइट्स ने अपने आप को इस पर उतरा लेकिन "फेसबुक" जीतनी

उपलब्धि किसी को नहीं मिली ! फेसबुक के निर्माता "मार्क जुकरवर्ग" की अदुतीय पहल आज विश्व में अपनी अलग ही विरासत रखती है ! इसने ऐसा

"प्लेटफार्म" तैयार किया जहाँ विश्व की प्रत्येक बड़े "व्यक्तित्व", "स्थान", "जगह" व् "तकनीक" से हम अपना संपर्क बना सकते है !महज ६-७ वर्षों में

फेशबुक ने अपनी दुनिया की जनसँख्या ७५ करोण से ऊपर कर ली है! परन्तु जिस फेसबुक ने सभी "सोशल" नेटवर्किंग-साईट को पीछे करते हुए

अपना साम्राज्य स्थापित किया आज उसी को टक्कर देने की लिए सामने आया है दुनिया का सबसे बड़ा "सर्च इंजन" गूगल ! वैसे गूगल "फेसबुक" से

पहले से कार्यरत है और उसने उसने "आर्कुट" एंड "गूगल बज़" जैसी सोशल वेबसाइट्स में अपना हाथ आजमा लिया लेकिन "फेसबुक" ने उन्हें अपना

साम्राज्य स्थापित नहीं करने दिया ! और उसी "गूगल" ने फिर से "फेसबुक" से टक्कर लेने की सोची है ! परन्तु अनेक अकडे कहते है की इस बार

"गूगल" अपनी पिछली गलतियों को संभलकर बाज़ार में उतर रहा है ! इस चेतावनी को "फेसबुक" के जनक "मार्क जुकरवर्ग" ने स्वीकार करते हुए

"फेसबुक" को और अच्छा बनाने हेतु खुद "गूगल" के नए अविष्कार "गूगल प्लस" का निरिक्षण किया है ! इस निरिक्षण का खुलासा "तकनीक से जुडी

साईट " CNET ने किया ! यह तरीका तो अजीब है, और इसका प्रयोग भी "फेसबुक के महानायक ने किया है !
अब देखना यह होगा की फेसबुक और गूगल की इस जंग में कौन अंगे बढता है फेसबुक को अपनी छवि बचानी है और गूगल को पिछली

पराजयो का बदला लेना है ! वैसे देखा जाये तो इस जंग से उपयोगकर्ताओ को फायदा ही होना है उन्हें कुछ न कुछ नयी तकनीक अवश्य मिलेगी !
1996 में खोजे गए गूगल ने भी अपना साम्रज्य विस्तार बहुत ही तेजी से किया है, और आज उसने दुनिया में सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली निशुल्क

"मेलिंग वेबसाइट" Gmail, अपने Operating System गूगल क्रोंम, मोबाइल OS एंड्रायड , ब्लागिंग के लिए Blogger अदि जैसी सुविधाए विष

को प्रदान की है! इन उपलब्धियों को देखते हुए हमें लगता की इस बार "गूगल प्लस" ,"फेसबुक" पर भरी पडने वाला है ! गूगल प्लस के लंच की

खबर सुनते ही सम्पूर्ण विश्व उसे देखने को लालायित है! चलिए हम सब इंतजार करते है और नए अवतार में नये "फीचर" की कल्पना करते है !

"भग" रूपी भगवान तो नहीं बन सकते !-अंकुर मिश्र "युगल"

संसार जन्मो का मोहरूपी कारखाना है , जहां पर प्रतिदिन हजारी की संख्या में मोहरूपी शवो का निर्माण होता है यह कार्क्रम सदियों से चला आ रहा है और सदियों तक अनवरत चलता रहेगा !इस आवागमन के कार्क्रम में अधिकतम लोग शव रूप में जन्म लेते है और शव रूप में ही शवित होकर समाप्त हो जाते है !संसार में आना और बिना किसी कर्म के मोह माया रूपी अस्त्रों से सुसज्जित होकर पारिवारिक कार्य करना और पत्रिक सद्गुणों का विनाश करना , संसार में भोग विलासो को प्राप्त करना तथा पुनः उस देह का त्याग करना जिसकी उत्पत्ति किसी विशेष कार्य के लिए हुई थी ,इस जीवनलीला को प्रत्येक निम्न एवं उच्च कोटि का व्यक्ति निर्वहन कर सकता है, और सोचे तो ऐसा जीवन तो पशु ,पक्षी भी निर्वहन करते है !
सोचिये ऐसा जीवन ही क्या जिसमे "भग" रूपी ऐश्वर्य, यश, लक्ष्मी ,वैराग्य ,ज्ञान और शौर्य की थोड़ी सी भी मात्र न हो , जो जीवन चिंताओ से ग्रसित न हो , भय से भ्रमित न हो ,हरी से हरित न हो ! मनुष्य को ऐसे कर्मो में कर्मित होना चाहिए जिससे जीवन जीवन-काल में तथा उसके पश्चात प्रसंशा की मिठास न हो ! हम "भग" रूपी भगवन तो नहीं बन सकते किन्तु कम से कम एक राक्षस की संज्ञा से उपनामित होने से तो बच ही सकते है, ये नाम भी हमें उन विद्वानों द्वारा देय होगा जो हमारे सबसे नजदीकी होगे !
"चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रत"
उक्ति को चरितार्थ न करे बल्कि कर्म ऐसा करे जिससे मनुष्य को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से प्रशंशा प्राप्त हो और "महापुरुष" की संज्ञा भी मिलेगी व् भी उन्ही के द्वारा जो "राक्षस" की संज्ञा देने वाले थे ! इस सोचनीय-सोच पर सोचनीय-सोच से जरुर सोचियेगा, कुछ परिणाम जरुर निकालेंगे !
.........
अंकुर मिश्र "युगल"

.................उनको तो सिर्फ कफ़न होगा !!

सच चाहे जितना तीखा हो धंस जाये तीर सा सीने में !
सुनने वाले तिलमिला उठे लथपथ हो जाये पसीने में !!
लेकिन दुर्घटना के भय से कब तक चुपचाप रहेंगे हम !
नस-नस में लावा उबल रहा कितना संताप सहेगे हम !!
जिन दुष्टों ने भारत माँ की है काट भुजा दोनों डाली!
पूंजे जो लाबर,बाबर को श्री राम चंद्र को दे गली !!
उन लोगो को भारत भू पर होगा तिलभर होगा स्थान नहीं !
वे छोड़ जाएँ इस धरती को उनका ये हिंदुस्तान नहीं !!
हमको न मोहम्मद से नफ़रत, ईसा से हमको बैर नहीं !
दस के दस गुरु अपने उनमे से कोई गैर नहीं !!
मंदिर में गूंजे वेदमंत्र गुरु-द्वारों में अरदास चले !
गिरजाघर में घंटे बजे मस्जिद में में खूब नवाज चले !!
होगा न हमें कुछ एतराज इसका न तनिक भी गम होगा !
पर करे देश से गद्दारी उनको तो सिर्फ कफ़न होगा !!

स्त्रोत-अज्ञात......

अभी राजनीती की गरिमा को इतना भी मत गिरायें!! अंकुर मिश्र "युगल"


राजनीती अभी से अपठनीय हो जाएगी ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा !आज हम हर तरीके से अपने को या अपने देश को विकसित तो बनाना चाहते किन देश को चलता कौन है,
हमारे राजनेता, यही वो कड़ी है जो हमें और हमारे देश को विश्व के सामने रखते है, एक समय था जब राजीव गाँधी और अटल बिहारी बाजपेई जी जैसे राजनेताओ से राजनीती खुद परिभाषित होती थी, क्योंकि उनके क्रियाकलापों ने राजनीती की भंगिमा को कभी भी गिरने नहीं दिया, उन्होंने उन सभी मुद्दों पर बातें की जो देश के लिए जरुरी थी !लेकिन आज की राजनीती इसके बिलकुल विपरीत है, यहाँ कुर्सी तो कोई और सम्भालता है लेकिन सञ्चालन कोई और !! यह कोई साधारण मुद्दा नहीं है, यदि हम इस मुद्दे को दिमाग से सोचे तो खुद समझ में आ जायेगा की यदि इसी तरह चलता रहा तो हमारा देश हम नहीं बल्कि दूसरा देश .................चलाएगा..........!
अब तत्काल पर नजर डालते है-
अन्ना हजारे ने "भ्रष्टाचार" के मुद्दे पर राजनीतिज्ञों से टक्कर ली उस समय उसका परिणाम सकारात्मक भी निकला परन्तु बाद में वही सरकार अपने वादों से मुखर गई !!उन्होंने वाही करने से मन कर दिया जिसे उन्होंने अन्ना जी के सामने मन था ! भ्रष्टाचार के कानून को अपने तरीके से बनाने की बात कही,इसमे भी इस बात को ध्यान रखा गया की सांसदों और प्रधानमंत्री को उस नियम के अंदर नहीं लाया जायेगा, जिसका उपयोग भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए होना है, जी हाँ हम बात कर रहे है "लोक-पाल" बिल की !
आखिर क्या कारण है जिसकी वजह से हमारी सरकार को "भ्रष्टाचार" और "काले धन" जैसी बरबादियों से प्यार है !
आज के भ्रष्टाचार विषय पर बात करते है जो बाबा रामदेव से प्रेरित है -बाबा रामदेव का सत्याग्रह किसी भी विषय-वास्तु से भी प्रेरित हो लेकिन उसका विषय ("भ्रष्टाचर") देश हित में था ! विषय को समझते हुये देशवाशियो ने सत्याग्रह में अपना साथ भी दिया ,और जो नहीं दे पायें वो भी समझते है ,यह आज के भारत की जरुरत है ! जनता अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए अपने को जगरूप बनाते हुए देश हित की इस लड़ाई में शांति के साथ बाबा के साथ जुडी !
परन्तु सत्याग्रह के दौरान जो "शर्मसार" घटना सरकार द्वारा करवाई गई वो देश की छवि को गिराने के साथ, राजनीती की परिभाषा को भी परिवर्तित करती है ! इस घटना में सरकार द्वारा जिस तरीके के अतिक्रमण "जनता" पर करवाए गए वो तो सरकार को "लोकतान्त्रिक" नहीं बल्कि "तानाशाही" प्रदर्शित करती है !आखिर उस जनता पर लाठियां बरसा कर सरकार दिखाना क्या चाहती है? जिन अधिकारीयों ने ऐसा करने के आदेश दिए क्या वो भी विदेशी..................!
इस घटना को देखने से लगता है की आज के शिक्षित राजनेता भी राजनीती के लायक नहीं है !उन्होंने अपनी इस अरैजिनिकता से दिखा दिया है की उनके सोचने की क्षमता को किसी ने गिरवी रख रखा है !इस घटना के बाद जनता का उत्तरदायित्व है की वो ईश्वर से उन राजनेताओ की सदबुध्धि के लिए प्रार्थना करे! और देश-हित के कार्यों में अपना सहयोग दे ! ऐसा हमें अपनी राजनीती को बचने के लिए करना ही होगा !!!

"अच्छे काम में सौ अड़ंगे" की सत्यता !! अंकुर मिश्र "युगल"

"अच्छे काम में सौ अड़ंगे" वाली कहावत "अन्ना हजारे" के लोकपाल बिल में सत्य होती नजर आ रही है!
वैसे तो कभी इन नेताओ को विकास का नाम तक याद नहीं रहेगा क्योकि वास्तविक जीवन में इससे इनका कोई नता नहीं होता ये सब राजनैतिक जीवन की बातें होती है,लेकिन कोई अन्य किसी अच्छे कार्य के लिए कदम उठाये तो उसे पीछे हटाने की पूरी कोशिश करते है, और इस कम में सारे राजनैतिक प्रतिद्वंदी एक होते नजर आते है! इन सबकी यथार्थता के लिए हम नजर डालते है "अन्ना हजारे" के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किये गए अभियान की, जिसमे लोकपाल बिल की मंजूरी महत्वपूर्ण थी या ये कहा जाये की ये पूरा अभियान लोकपाल बिल को पास कराने के लिए ही था, जो भ्रष्टाचारियों के लिए एक "रूकावट" है! आज उसी बिल को और उससे जुड़े लोगो को राजनेताओ ने अपने मुद्दा बना लिया है! इक्कीसवीं सदी की इस मंदी में नेताओ के पास मुद्दों की मंदी है इसी कारण उन्होंने इसे ही नया मुद्दा बना डाला! नेताओं को सत्यता या असत्यता से मतलब तो होता नहीं है उन्हें केवल प्रतिद्वंदिता से मतलब होता है, वो तो केवल उस बात पर बात करते है जिस पर कोई अन्य दल समर्थन कर रहा होता है! लोकपाल बिल से जुड़े लोगो में प्रशांत भूषण, संतोष हेगडे, अरविन्द केजरीवाल आदि है, लेकिन आज का दृश्य यह है की इन सभी लोगो में किसी न किसी प्रकार की कमियों को निकलने का काम नेताओ ने शुरू कर दिया है, और ऐसा करने वाले कोई साधारण नेता नहीं बल्कि काग्रेस से दिग्गज दिग्विजय सिंह, जिन्हें मध्य-प्रदेश की राजनीती ने पानी पिला दिया, अमर सिंह जिन्हें सपा से बहार कर दिया गया, इनके अलावा ऐसे तमाम नाम है जो इस कार्य में अडंगा दल रहे है!
पहले तो खुद कांग्रेस ने पूरा जोर लगाया की इस बिल को पास नहीं कराया जाये, लेकिन उसे जनता के सामने झुकना पड़ा?
अब यहाँ प्रश्न उठता है की क्या ये लोग सरकार का ही काम कर रहे है? या फिर ये उन्ही २६ लोगो की श्रेणी में है जिनकी लिस्ट सरकार के पास है-जिनका काला धन स्विस बैंको में जमा है ! अब एक प्रश्न पर और बात कर लेते है जिसे खुद जनता उठा रही है- अन्ना हजारे उस समय कहा थे जब देश अन्य परेशानियों से गुजर रहा था, उदाहरणार्थ- महाराष्ट्रियो का उत्तर-भारतियों पर हमला आदि !
किसी इतिहासकार ने एक प्रश्न उठाया है की उस कमेटी में वही लोग क्यों जिन्हें अन्ना हजारे ने चुना है!
प्रश्न कुछ भी हो परिणाम कुछ भी निकले पर यहाँ एक बात पर हमेशा सोचना रहेगा की देश के किसी भी विकास के कार्य में इतनी वधाएं क्यों आती है, यदि हम अन्य मुद्दों पर (जैसे- महिला आरक्षण, पोटा, सीमा निर्धारण आदि ) नजर दे तो इन पर सभी की "एक राय" हो जाती है परन्तु आज देश की सबसे बड़ी समस्या के निदान के पहले कदम में इतनी परेशानियां क्यों ? यही वो घाव जो हमारे लिए नासूड बन चूका है, और यदि समय रहते हमने इस नासूड से बचने का कोई उपाय नहीं सोचा तो एक बात पक्की है यद् मुद्दा एक दी देश में गृह युद्ध छिडवा देगा ! देह के संचालको को समझाने की जरुरत है की देश के विकास के प्रत्येक मुद्दे को अपन राजनैतिक मुद्दा ण बनायें, कभी कभी देश को देश समझते हुए विकास के मुद्दों पर भी सोच लिया करें! जो देश हित में, राज्य हित में और राजनीति हित में है !!!!

AWAJ_DO


स्वतंत्रता की जो नै लड़ाई अन्ना हजारे जी ने सुरु की है, हमें उसे रुकने नहीं देना चाहिए! हमें देश के युवाओ को प्रोत्साहित करके उस शांति की लड़ाई के जरिये देश के भ्रष्टाचार जैसे अभिशापो को समाप्त करना है! इसी कम को अंगे बढ़ाने के लिए मैंने एक इन्टरनेट पर वेब-साईट बनायीं है जो लोगो को जोडने और लोगो को समझने में सहायता करेगी !!!

www.awajdo.co.cc

यदि हम ये नहीं कर सकते तो हमसे बड़ी समस्या कोई नहीं है !- अंकुर मिश्र"युगल"

अन्ना हजारे जी ने जिस कठिनतम समस्या को समाप्त करने के लिए अनिश्चित कालीन अनशन की सुरुआत कई है, वो केवल अनशन नहीं बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और स्वतंत्रता की नवीनतम लड़ाई है, यहाँ लड़ाई का मतलब कभी भी हिंसा मत लीजियेगा, यह तो वो लड़ाई है जिससे अहिंसा की परिभाषा बनती है इसमे देश के प्रत्येक नागरिक का लगाव होना चाहिए, प्रत्येक नागरिक को अन्ना हजारे का साथ देना चाहिए! अन्ना हजारे जी खुद कहते है" जब किसी समस्या को समाप्त करने के सभी तरीके बंद हो जाते है तो अनशन का सहारा ही बचता है" यह वो अहिंसा-भरा हथियार है जिसके सामने अच्छे लोकतंत्रवादियों, राजनीतिज्ञों को झुकना पड़ता है! वो कहते है हमें-
"जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वह भारत देश है मेरा ! को दोबारा सत्य करना है आज हमे यह गीत बदला हुआ नजर आ रहा है हम आज कह भी सकते है "जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती दी बसेरा वह भारत देश था मेरा !
अब आप सोचिये जब एक ७५ वर्षीय बृद्ध व्यक्ति इस समस्या को समाप्त करने की पहल कर सकता है तो क्या हम नहीं हम तो अभी जवान है! आप अपने आतंरिक ह्रदय से पूछिए क्या आपको भ्रस्टाचार अच्छा लगता है??और हाँ आप यह जबाब मत दीजियेगा की "भ्रष्ट तो सभी है हम क्या कर सकते है!!" क्योकि इस उत्तर से मै पागल हो चूका हूँ! हाँ इस तरीके के उत्तर वाले लोगो से मै बस इतना कहना चाहूँगा की यदि वो इसी तरह सोचते रहे तो वो दिन दूर नहीं है जब हा दोबारा किसी के अधीन होंगे!
आप सोचिये अब समस्या है तो समाधान भी होगा, हमें समाधान के लिए अंगे आना होगा, अंगे नहीं आ सकते तो जो अंगे आ रहा है उसका समर्थन तो कर सकते है, और यदि समर्थन नहीं कर सकते तो लोगो को तो जगा सकते है , यदि लोगो को नहीं जगा सकते तो शांत तो रह सकते है,यदि शांत नहीं रहा सकते तो बुरा तो मत बोलिए !!!
हाँ यदि आप या हम ये सब नहीं कर सकते तो हमसे या आपसे बड़ी समस्या कोई नहीं है !!
यहाँ केवल लोकपाल बिल की बात नहीं है, यह केवल स्विस बैंको में जमा धन की बात नहीं है, यह कोड़ा, कलमाडी, राजा या रानी की बात नहीं है यह देश की बात है यह उस "सोने की चिड़िया" की बात है जिसे यहाँ के कुछ तानाशाहों या मंद्बुध्धियों ने आपने को स्वर्ण बनाने के लालच में खोखला कर दिया है!!
अब सोचिये मत अपना कदम बढाइये, अन्ना हजारे जैसी क्रांतिकारियों की आज देश को जरुरत है,यह तो "आज" की सुरुआत है यदि आपका ,हमारा और उनका साथ रहा तो अंगे अंगे देखिये होता है क्या ???

हम जानते है फिर भी चुप है!- अंकुर मिश्र "युगल"


प्रकृति से खिलवाड का भयावह दृश्य तो हम सभी ने देखा ही है !अब भी वक्त है प्रकृति की चेतावनी को समझ लेना चाहिए उसके साथ हो रहे अपमनानीय व्यव्हार को समाप्त करना चाहिए, हमें उसे अपनत्व के साथ जोडना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब हम उसकी आग में ध्वस्त हो जायेंगे और हमें पश्चाताप का समय भी नहीं मिलेगा!
आज हम जिसकी छत्रछाया में जीवन व्यतीत कर रहे है उसे ही अपने परिवार से अलग मान रहे है और अमाननीय व्यवहार किये जा रहे है !!!
जी हाँ यहाँ हम बात कर रहे है उस पृथ्वी की जिसमे हम रहते है, उस आकाश की जिससे हमें छत मिली हुई है , उस हवा की जिसमे हम साँस ले रहे है , उस पानी की जिसकी वजह से हमारा जीवन है, उस आग की जिसमे हम खाना पकाते है और हर उस तथ्य की जो हमें प्रकृति प्रदान करती है , और इन्ही के साथ हमारा व्यव्हार भी आज द्रिश्नीय हो गया है यहाँ कारन भी खुला हुआ है , हम खुद के लिए वायु चाहिए, और जानते भी है वायु ही जीवन है और पता भी है की ना ना प्रकार के कारखानों तथा वाहनों से उत्सर्जित "ग्रीनहाउस गैस" वायु में क्या असर कर रही है . करकारखानो ,वाहनों तथा फ़सिल तेलों के जलने से उत्पादित ग्रीनहाउस गैसों से आज विश्व एक सबसे कुख्यात तथा गभीर्शील विषय से जूझ रहा है जिसे वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग कहते है.इससे धरती की छतरी "ओजोन परत" में छेद हो रहे है जिससे हमे चर्म रोग इत्यादि हो रहे है.ग्लेशियरों का पिघलना, निचले समुंदरी इलाको का डूब जाना उपरांत का दुस्परिनाम है. लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर रहे !!!!!
जल की तरफ नजर डाले तो यह जरुर कहेंगे "जल ही जीवन है" और आज इसके साथ हो रहे वर्ताव को भी हम जानते है जो जल प्रदुषण के रूप में खुख्यात है केमिकल तथा अन्य हानिकारक पदार्थो का अत्यधिक मात्रा में नदी, तालाब इत्यादि में पाया जाना जल प्रदुसन कहलाता है.जलीय जीव-जन्तु के लिए जानलेवा साबित जल प्रदुसन वातावरण के कई श्रृंखलाओ में बाधा लता है जिससे कूद्रत के प्राणियों को मुश्किलों का सामना करना परता है.नदी के उपरी सतह पर एक परत जम जाने के वजह से जलीय जीव-जन्तु को आक्सीजन तथा रौशनी न मिलने से उनकी मृत्यू हो जाती है.जिनके अभिशाप में हम आज जी रहे है !इसी तरह पृथ्वी के साथ देखे तो ना ना प्रकार के कीटनाशक तथा अन्य खादों का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करके इसे बंजर बनाने पर तुले है .कुरा-कचरा तथा अन्य हानिकारक पदार्थों जमीन में गारने से वहां के जमीन के रोपण शक्ति में कमी होती जा रही है.हमारे खाद्य पदार्थ दूषित होते जा रहे है जिससे हम अनेक रोगों के शिकार होते है, फिर भी हम चुप है!इसी तरह हर प्राकृतिक तथ्य के साथ हमारा व्यव्हार हमें खतरे में डाल सकता है जिससे जापान जैसी तबाहियां आम हो जायेगी और एक दिन ये होगा की पूरा विश्व जापान होगा!!
यहाँ सबसे बड़ी बात यह है की हम जानते है फिर भी चुप है!!

इनपुट २५० करोण आउटपुट शून्य : अंकुर मिश्र "युगल"


कहते है कनून के हाथ बहुत लंबे होते है , उससे बचाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुनकिन है !परन्तु जब कानून ही घुतंर टेंक दे तक क्या करेगे! किसी को किससे इंसाफ की आशा रहेगी ! आज यही परिस्थिति हमारे देश की हो रही है, यहाँ राष्ट्रिय स्टार अनेक बड़े बड़े केशों के मुकदमे अदालत में चल रहे है,पर उनमे अब विलम्ब के साथ साथ कानून ने इंसाफ देना भी बंद कर दिया है !
बोफोर्स घोटाले से कौन अनजान होगा !सन् १९८७ में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता है। और आज भी केंद्र में कांग्रेस की सर्कार है, और सञ्चालन भी वाही गाँधी परिवार कर रहा है !
केश की सुनवाई २५ साल से बराबर होती अ रही है ,सी.बी,आई. जाँच भी हुई है,और सबसे बड़ी बात यह है की इस केश में खर्च होने वाली रकम २५० करोंण है, यह रकम भी आम जनता की ही है !आखिर देश का विकाश कैसे हो महंगाई क्यों न हो !आम जनता भूंखी क्यों न मरे जब उसी के धन का उपायोंग ऐसी जगह किया जा रहा है!! और इतनी रकम का अन्तिम परिनक अत है "इस केश में बहुत अधिक समय हो गया है अतः इस केश को बंद किया जाता है" !क्या हमने इसी के लिए कानून का भरोषा किया है , क्या हमने इसी लिए सरकार को चुना है !
यदि इसी तरह के निर्णय हमारी कानून व्यवस्था देती रही तो आम जनता का क्या होगा!!बोफोर्स जैसे मामलों के परिणाम में कानून के साथ साथ सर्कार का भी पूरा हाथ होना आम जनता के विश्वास घाट को प्रदर्शित करता है!!