क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई, जो तुमने इन बच्चो पर गोली चलाई... #YugalVani

क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई,
जो तुमने इन बच्चो पर गोली चलाई,
एक माँ तुम्हारी भी तो होगी,
जो रोने पर खुद रो पड़ती थी
आंसुओ को तुम्हारे खुद पोछते पोछते,
और न जाने कितने दर्द छिपाती
बिना कुछ बताये बिना कुछ चिल्लाये,
उस माँ के बच्चो पर तुमने गोली चलाई
क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई...
खुद तुम्हे पढ़ाती रही, बढ़ाती रही
अपने पैबंद बार बार गवांती रही,
न जाने किस मिट्टी से बनी थी वो
जो हर दर्द में साथ रही और मुस्कुराती रही
तुम्हारी भी तो ऐसी ही माँ थी न
क्या तुम्हे उस माँ की जरा सी भी याद नहीं आई...
जो जरा से देर से तुम्हारे घर
लौटने में घबरा जाती थी
तुमने उसके बच्चो को घर लौटने ही नहीं दिया...
पैर की जरा सी चोट के खून से
वो माँ सहम जाती थी
उस माँ को तुमने खून से लथपथ बच्चे भेज दिए...
खुद भूखी रहकर
आखिरी रोटी भी खिला देती दी जो तुम्हे
उस माँ के भूखे बच्चे तुमने मार डाले...
तुम्हारी उंगली को बनाया,
फिर उस उंगली को पकड़कर चलना सिखाया
आज उस माँ को तुमने कटा हुआ अगूंठा दिखा दिया...
क्या तुम्हे उस माँ की जरा सी भी याद नहीं आई
जब भी तुमने गोली चलाई
क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई..

एक जवान देश के लिए कभी अकेला नहीं मरता...

देश, दिशा और दशा हर जगह एक फौजी होता है, 
मरने के बाद शहीद होता है ! 
मगर उसके लिए हम आप क्या करते है ? सिनेमा घर में राष्ट्र गान के समय याद कर लिया, या फिर १५ अगस्त और २६ जनवरी को याद कर लिया या कारगिल दिवस और शहीद दिवस में याद कर लिया ! हमारे लिए वो सैनिक बस एक कैलेण्डर की तारीख में कैद है ! आजकल कुछ लोग फेसबुक और अन्य सोसिल साइट्स के जरिये उन्हें देख लेते है ! मगर ये जोस स्थायी समय के लिए होता है ! कुछ घंटो के लिए या फिर कुछ चुनदा तारीखों के लिए, उसके बाद जोश ठंडा पद जाता है और उस सैनिक को भूल जाते है !
खैर जाने दीजिये उस -४० डिग्री में खड़े सैनिक की बहादुरी की तुलना तो क्या, कोई उस पर प्रश्न भी नहीं उठा सकता ! जान की बाजी लगाता है वो सैनिक !

मै हमेशा उनको अलग देखता हूँ, सरहद पर वो सैनिक अकेला नहीं दिखता मुझे उसके साथ दूर गाँव के एक माँ होती है जिसे हमेशा गर्व के साथ डर होता है, एक बीवी होती है जो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं होती फिर भी अपने बच्चो को पढने स्कूल भेजती है , एक पिता होता है जिसे गर्व होता है और पूरे गाँव में बताता है !
सरहद पर खड़ा वो सैनिक और उसका परिवार किसी एक गाँव के छोटे से लोग होते है मगर सबसे अलग ! इनकी कहानिया कही नहीं छपती, ये कभी टीवी पर नहीं दिखते ! इन लोगो को कभी देश प्रेम जगाने के लिए सिनेमा घर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, ये तो देश के लिए रोज, हर पल मरने को तैयार रहते है ! हम वो लोग हैं जो कैलेंडर की तारीखों के हिसाब से उस फौजी को याद करते हैं हमारा राष्ट्रप्रेम किश्तों में बाहर निकलता है।
एक सैनिक का सरहद पर खड़ा होना जितना मुश्किल होता है  उतना ही मुश्किल उसके घर का जीवन गाँव में होता है ! हमें सरहद की तस्वीर में एक सैनिक तो नजर आ जाता है मगर एक पिता, एक माँ, एक बीवी और स्कूल जाते अकेले बच्चे कभी नजर नहीं आते जो हर पल संघर्ष कर रहे होते है ! हम हर साल कैलेंडरों की उन तारीखों पर फ़िर चाहे वो १५ अगस्त हो , २६ जनवरी हो या कारगिल का विजय दिवस, उन फौजियों को याद करते हैं , पर हम कहीं न कहीं उनके परिवारों को भूल जातें हैं।
एक जवान जब भी सेना में जाता है वो कभी अकेला नहीं जाता, उसका पूरा परिवार उसके साथ होता है !
एक जवान ठण्ड में अकेला नहीं सिकुड़ता उसका पूरा परिवार उसके साथ सिकुड़ता होता है !
एक जवान सरहद पर अकेला नहीं लड़ता उसका पूरा परिवार उसके साथ लड़ता होता है !
एक जवान सरहद पर गोली अकेला नहीं खाता उसका पूरा परिवार उसके साथ गोली खाता है !
एक जवान देश के लिए कभी अकेला नहीं मरता, उसका पूरा परिवार मरता है.... पूरा परिवार


"ख़ुशी" , "हंसी" या "मुस्कान"

मेरा घर तीसरे मंजिल में था, बगल में एक परिवार रहने आया था यही कुछ ५-६ महीने हुए थे ! इतवार का दिन था मै कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था तभी अचानक दरवाजा खुलने की आहट आयी, पहले लगा हवा का झोका होगा मगर पीछे देखा तो दो छोटी छोटी आँखे और एक छोटी सी नाक दिखाई दे रही थी ! वो आखे मुझे ही देखे जा रही थी मेरे इशारा करने पर, दरवाजा जरा सा  और खुला बिलकुल जरा सा....
फिर दोबारा बुलाने पर दरवाजा तेजी से खोल एक ७-८ साल की बच्ची सीधे मेरे पास आकर खड़ी हो गयी, शांत आँखों में मानो बल्ब लगे हो ऐसे चमक रही थी, साथ में मेज पर रखे कागजो पर ऐसे नज़रे गडा राखी थी मानो मेरे लिखने का जायजा लिया जा रहा हो ! काफी सोचने के बाद मैंने उससे पूंछा...

क्या नाम है बेटे आपका?
उसका मन उन कागजो से हटा तक नहीं...

फिर मैंने कहा, बेटे आपका नाम क्या है ?
मानो इस बार भी उसके ध्यान में कोई फर्क नहीं पड़ा, उसकी नजर अब भी किताबो में ही थी...

बेटे... बेटे नाम ? नाम क्या है आपका ?
अब इस बार वो अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाकर हसने लगी....

नाम? बेटे ? नाम क्या है आपका ?
उसका मुस्कुराना जारी था, अब मुझे अजीब सा लग रहा था ! वो कुछ बोल नहीं रही थी बस मुस्कुराये जा रही थी! कुछ भी नहीं बोल रही थी, मन ही मन डरने लगा मै... कही ये ? नहीं नहीं ऐसा नही हो सकता....
कई ख्याल आ रहे थे मन में ! तभी डरते हुए मैंने पेन उठाया हाथ में और एक कागज़ में लिखा...

“बेटे आपका नाम क्या है ?”
मैंने इतना लिखा ही था की उसने अपने हाथो से मेरी ठुड्डी पकड़कर सर ऊपर किया और ‘मुस्कुराने’ लगी...
हंसी ?

उसने अपने दोनों हाथ सर पर रखे जैसे मैंने कोई बड़ी बेवकूफ़ी कर कि हो और फिर से दोनों हाथों को होठों के पार ले जाकर वही इशारा किया 
" ख़ुशी " ? अरे हाँ। "मुस्कान"

मेरे मुस्कान कहते ही उसकी मुस्कान हंसी में बदल गयी, मैंने मुस्कान उस नोटबुक पर भी लिख दिया, ये सोच कर शायद कि उसने मेरे होंठ सही पढ़े हैं, वो अपना नाम उस नोटबुक पर लिखा देख और खुश हो गयी।
पन्नों , मेरे और उसके बीच इसी तरह कुछ देर तक बातें हुई , मैंने एक नयी नोटबुक निकाली और उस पर उसका नाम लिख दिया और पहले पन्ने पर लिखा " तुम्हारा नाम क्या है " वो बड़ी तेज़ थी, समझ गयी कि मैं उससे उसकी भाषा सीखना चाहता हूँ। उसने फटाफट इशारों से मुझे समझा दिया, मैंने उन्ही इशारों को फ़िर से दोहराया , और उसने अपने हाथ अपने होठों कि तरफ ले जाकर इशारा कर के जवाब भी दिया, फिर हम दोनों काफ़ी देर तक हँसे।
अब जब भी मेरी छुट्टी होती वो मेरे पास आ जाती और उसकी भाषा में हम खूब बाते करते ! मैं उसके लिए कुछ किताबें ले आया था, जब भी वो आती उन किताबों में जाने क्या ढूंढती , मेज़ पर रखे हुए पेनों से खेलती और मुझे अपनी भाषा में हमेशा कुछ नया सिखा जाती । ये सिलसिला करीब डेढ़ महीने तक चलता रहा , हम अच्छे दोस्त बन गए थे, वो छुट्टी के दिन आकर अपने दोस्तों के बारें में बताती , किताबों में तस्वीरें देखती कुछ देर बैठती और चली जाती। मैं हमेशा उस से एक चीज़ सीखता , उसको दोहरा कर उसको दिखाता , और वो सर हिला कर हंसती। एक अलग ही दुनिया हो गयी थी हम दोनों कि, मुझे ये एहसास हो चूका था कि वो क्यों इस तरह मेरे करीब आ गयी थी , सारी दुनिया उसे कुछ न कुछ सीखाने में लगी हुई थी , और एक मैं था जो उससे सीखता था अजीब सा लगता था कि चुप रह कर भी वो कितना कुछ बोल जाती थी !

एक दिन, शाम का वक्त था बारिश तेज हो रही थी मै जल्दी जल्दी दफ्तर से निकलकर घर जा रहा था, पूरा भीग चूका था, कपकपी छूट रही थी ! अपने घर के नीचे पहुचते ही जल्दी जल्दी ऊपर जाने लगा मगर तभी एक बड़े से ट्रक और कार पर नजर पड़ी ! ट्रक में किसी का सामान लदा हुआ था, कोई जा रहा था ! मै ये सब देखते हुए जल्दी जल्दी ऊपर गया, बगल वाले घर में ताला पड़ा था ! मैंने अपना दरवाजा खोला और कपडे बदलकर चाय गैस में रखी ! फिर तौलिया लेकर खिड़की में गया ! मेरा ध्यान फिर उस कार कि खिड़की पर गया, फिर वो चेहरा सामने आया , बारिश में भीगता हुआ, वो मेरी ही खिड़की कि तरफ देख रही थी , वो जब नहीं देख रही थी तब भी वो हाथ मेरी खिड़की कि तरफ ही इशारे कर रहे थे , उसने मुझे देख लिया था, वो वही इशारे बार बार दोहरा रही थी , मैंने अपना चेहरा थोडा और बाहर निकाल कर समझने कि कोशिश कि। एक तो बारिश कि उन टकराती बूँदो से मेरी आँखें ठीक से खुल नहीं रही थी , और वो जो इशारे कर रही थी वो मैं समझ नहीं पा रहा था। उसने वो मुझे सीखाया नहीं था, मैं भी क्या जवाब देता , एक हथेली बाहर निकाल कर हिलाता रहा, पर वह अब भी वही इशारा कर रही थी , जाने क्या कहना चाहती थी , जाने क्या बताना था उसको , बाल पूरे माथे से चिपक गए थे , मैं भी फिर से भीग गया था।
कुछ तो कहना चाह रही थी वो , जिसे मै आज तक नहीं समझ पाया ! फिर मै दरवाजे के पास पंहुचा तो वहां पर एक कागज पड़ा था ! जिसमे J लिखा हुआ था बस !
जिसे पूरी दुनिया कुछ सिखाने की कोशिश कर रही थी, वो न जाने कितना सिखा गयी मुझे ! फिर भी आखिरी में कही गयी बातो को मै आज तक नहीं समझ पाया ! उसका वो पन्ना न जाने कितने गमो की मुस्कान रखता है...




एक माँ ‘थी’ वो...

एक चेहरा बस स्टाप के एक कोने पर नीचे की और कुछ देखता हुआ खड़ा था, न जाने कितनी बसे उसके सामने से गुजर चुकी थी कईयो ने पूंछा भी.... कहा चलना है मैडम...? मगर कोई जबाब नहीं था ! बस खड़ी थी शांत... बिल्कुल शांत... जमीन पर पड़े कई टिकट उसके पैरो से टकरा टकराकर खेल रहे थे ! कुछ ऑटो वाले सामने खड़े थे जो घूर-घूरकर थक गए थे और उम्मीद छोड़ चुके थे ! हर मिनट वहाँ एक नयी बस होती थी और नए चेहरे दिखाई दे रहे थे, मगर वो चेहरा अब भी वही था!
शाम होने लगी थी सूरज ने भी घर जाने की तैयारी कर ली थी तभी सामने से कुछ स्कूल की बसे आती दिखायी दी, एक के बाद एक करके कई बसे वहा रुकी और आगे निकल गयी... हर बस के आने के साथ उसके भाव बदल जाते थे बच्चो के बस से उतरते ही वो कुछ आगे बढती थी और फिर कुछ सोचकर पैर पीछे खीच लेती !
अब स्कूल की आखिरी बस भी निकल गयी, शाम हो गयी रात होने लगी थी....
धीमे धीमे उस लड़की ने अपने कदम अपने घर की तरफ मोड़ दिए और मायुस सा चेहरा लिए घर चली गयी...!

मैंने कई दिनों तक ये नजारा देखा फिर फिर इस छोटी सी दुनिया की रोज की इस कहानी की जानने की इच्छा हुयी, ये कब से चल रहा है ? कब तक चलेगा ? रविवार को छोड़कर वो लड़की पूरे दिन यहाँ क्या करती है? इन सब प्रश्नों के साथ मै सुबह सुबह बस स्टाप पर पहुच गया ! एक पुरानी पान की दुकान नज़र आयी, बस अभी अभी खुली थी, वो बूढ़ा ताला खोल कर चाबी जेब में ही रख रहा था....

एक लड़की जो उस कोने में रोज खड़ी होती है ? दिनभर यही खड़ी रहती है ? न कही जाती है, न कोई मिलने आता है ? बाबा क्या आप उसे.... उसे जानते हो ?

सर आपको कैसे पता ये सब, ये तो पिछले छ: महीनो से चल रहा है, रोज यही खड़ी होती है वो बेचारी.... किसी ने नहीं पूंछा, मगर आप क्यों ? क्या आप .... क्या आप जानते हो उसे ?

नहीं.. मैं नहीं जानता... पर कुछ दिनों से देख रहा हूं.. सोचा आज पता कर लूं.... कौन है ये लड़की..? ओर ये सब क्या है..? कुछ पता है आपको?

बूढ़ा कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला सर.. छ: महीने पहले की बात है, ये लड़की रोज बस स्टाप आती थी एक छोटे बच्चे के साथ, बड़ा ही शांत था स्कूल बैग के साथ होता था साथ में टिफिन होता था ! दोनों हँसते हँसते आते थे और फिर बच्चा स्कूल बस से स्कूल चला जाता था और माँ घर को... इसी तरह शाम को वो बच्चे को लेकर ख़ुशी से घर चली जाती थी...... !

... और एक दिन इसी बस स्टाप में....

कहते कहते अचानक वो बूढा रुका और फिर कुछ सोचकर बोला, सर... गेंद उस पार गयी... और ... वो बच्चा अपनी माँ से हाथ छुड़ा ... उस गेंद के पीछे दौड़ा....

“माँ’ थी उस बच्चे की ये लड़की...”

इस “थी” शब्द ने मुझे पूरा झकझोर दिया !

मुझसे भी कुछ कहा न गया.... मुझे मेरा जवाब मिल चुका था ..

मैं अब भी रोज़... उसको देखता हूं.... वो माँ अब भी उस स्कूल बस का इंतज़ार करती है.... अब भी... स्कूल के बच्चे अब भी वहीँ उतरतें हैं ... और वो स्कूल की पिली बस.. रोज़ आती है.... वो क्या सोचती है ... उसे कैसा लगता है.... यह शायद ... शब्दों में कहना कठीन होगा.....

शायद इतना कहना काफी होगा... की वो अब भी रोज़ आती है उस बस स्टॉप पर...

हाँ वो एक ‘माँ’ थी....

सच में "मर्दानी" ही थी वो "मर्दानी"...

शाम को शर्मा जी की दुकान की चाय न मिले तो ऐसा लगता था कुछ न कुछ मिस हो रहा हूँ,  साथ में दोस्त होते थे तो हंसी मजाक भी हो जाता था, मन को शांति मिलती थी और ख़ुशी के ठहासे सुनकर आसपास वाले भी हंसाने लगते थे ! उन दिनों की सभी यादे यादगार है ! फेसबुक और इंटरनेट के होने के बावजूद इनका ज्यादा ज्ञान नहीं था ! बस कभी कभी जी.मेल और गूगल खोल लिया करते थे !
और कई ऐसी बाते है जिन्हें सुनकर आप हसोगे.... :)

फ़िलहाल शर्मा जी की दुकान की बात है जहाँ बैठकर मै रोज अपने दोस्तों के साथ बैठकर चाय पीता और ठहाके लगाता था ये किस्सा महीनो से चल रहा था,  मगर उस दिन की बात कुछ अलग थी, चाय पीते हुए नजर एक लड़की पर पड़ी, उम्र लगभग २३-२४ होगी, गोरी और खूब लम्बी थी वो,  साथ में एक बच्चा था करीब ६-७ साल का, स्कूटी में थे दोनों,  बच्चे ने उस लड़की को जकड़कर पकड़ रखा था,  बच्चे का चेहरा तो नहीं दिखा मगर हाँ उस लड़की के होटो से ऐसा लग रहा था जैसे दोनों बाते कर रहे थे ! हँसते हुए...!
पता नहीं क्यों ? मगर उसे देखकर एक मुस्कराहट सी आ गयी चेहरे में और उसने इस मुस्कराहट को देख लिया जबाब में मुस्करा भी दिया और आगे चली गयी ! और हम दोस्त, चाय पीटे हुए फिर से वैसे ही बाते करने लगे !

अगले दिन फिर से शाम को चाय के लिए इकट्ठे हुए, नए जोश के साथ चाय ली और बैठ कर पीने लगे तभी सामने से उस लड़की को फिर से आते हुए देखा वैसी ही उर्जा थी उसके अन्दर,  आज फिर कोई बच्चा उसके पीछे बैठा था मगर कुछ बड़ा था काले रंग का चश्मा पहन रखा था दोनों ने और हस हस कर बाते कर रहे थे ! फिर अचानक से नजर मिली और हम दोनों मुस्करा दिए ! मगर तभी एक आवाज आई देखो देखो "मर्दानी" आई,  मेरा कोई दोस्त ही रहा होगा इस आवाज में... ! वो चली गयी फिर हम बाते करने लगे अपने बारे में, चाय के बारे में और उस मर्दानी के बारे में ! मुझे ऐसे लगा जैसे ये आवाज उस तक पहुच गयी होगी...
इसी तरह इस मुस्कराहट और और उसके आने जाने का सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा ! हमारे चाय पीने और उस मर्दानी का वहां से गुजरने का वक्त भी एक ही हो चूका था ! हर शाम को स्कूटी में आती थी रोजाना कोई न कोई बच्चा पीछे बैठा होता था और दोनों में बाते चल रही होती थी, दोनों हस रहे होते थे !
अब तो इस रोज रोज के हसने और चाय पीने में और मजे आने लगे थे, मर्दानी की मुस्कान और मरदानी सुन्दर जो थी इतनी... अब उसके बारे में जानने की इच्छा होने लगी थी मगर वो आस पास कहीभी अपनी स्कूटी नहीं रोकती थी !
पता नही कहा से आती होगी, कहा जाती है... अनेक प्रश्न दिमाग में आने लगे थे ! अब जब भी हम उसे देखकर “मर्दानी” कहते थे वो सुनकर और तेज मुस्कुरा देती थी ! ये सब देखकर मुझे लगा कुछ तो है.. कुछ तो अलग है... कुछ बात तो है इस सलाम नमस्ते में, मुझे जानने की उत्सुकता थी !
अगले दिन मै एक दोस्त के साथ तैयार था, एक बाइक में... जैसे वो पास आई... सब बोले मर्दानी... उसने सुना और फिर मुस्कराकर निकल गयी, हम दोनों भी पीछे लग गए , हम धीरे-धीरे चल रहे थे मगर उसकी स्कूटी हमारी नजरो के दायरे में थी ! टेढ़े-मेढ़े रास्तो में चलने के बाद उसकी स्कूटी एक बड़ी सी ईमारत के सामने जाकर रुकी ! मैंने अपने दोस्त और बाइक को ईमारत से थोड़ी दूर रोक दिया और मै पैदल चलने लगा !
उसने अपनी स्कूटी धीरे धीरे गेट के अन्दर ली, बच्चा अब भी स्कूटी में ही बैठा था ! अन्दर जाकर उसने बच्चे को गोद में उठाया और पास के चबूतरे में बैठालकर बाते करने लगी ! ये सब मै गेट की सलाखों के पीछे से देख रहा था !
तभी उसने उस बच्चे का चश्मा हटाया और उससे बाते करती रही, बच्चा की निगाहे कही और थी लड़की की कही और, बच्चा अपना सर हिलाए जा रहा था ! फिर मैंने ध्यान से देखा तो मुझे नजर आया की उस बच्चे की आखे नहीं है, वो होटो और हाथो से बाते कर रहा था, मगर खुश था एक मुस्कान थी उसके होटो में.... काफी देर तक वो दोनों साथ बैठे रहे और  फ़िर किसी तरह वो उसे अंदर ले गयी।

ऐसा लगा जैसे किसी ने अंदर से मुझे जंझोर दिया हो , मुझे सब समझ में आ गया था, गेट से दो कदम पीछे हटा और ऊपर लगे बोर्ड पर नज़र गयी "सक्षम - ए प्लेस फार ब्लाइंड एंड लो विजन पर्सन्स " , आँखें पानी से भरी हुईं थी फिर भी बोर्ड पर लिखा साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था। मेरे पैर अब जवाब दे रहे थे, मैं गेट से हट कर दीवार पर पीठ सटा कर आसमान तांकने लगा। सीने में एक अजीब सी घुटन होने लगी थी।
ये मुझसे क्या हो गया, ये मैंने क्या कर दिया, ये रोज़ इस तरह यहाँ अकेली आती है, अकेली जूझती है और मैं उसका मज़ाक उड़ाता रहा। और उसने क्या किया, बस मुझे देख कर मुस्कुराती रही, सिर्फ मुस्कुराती रही। किस मुश्किल से उसने उसे स्कूटी से नीचे उतारा था , ना जाने कैसे बैठाया होगा स्कूटी पर, ना जाने वो ये रोज़ कैसे कर लेती है।  कैसे हैं ये लोग, कहाँ से लाते हैं ऐसा दिल, कहाँ से लाते हैं ऐसी हिम्मत, मैंने दोनों हथेलियों से आँखें पोंछी , और फिर उन लोहे की सलाखों से झाँकने लगा।
मन किया की उससे जा कर माफ़ी मांग लूं , पर हिम्मत नहीं हुई।
कदम वापस लिए,  दोस्त और बाइक को साथ को लिया और वापस शर्मा जी दुकान की तरफ जाने लगा। उसका मुस्कुराता वो सुन्दर सा चेहरा अब भी ज़हन में आ रहा था।

सच में मर्दानी ही तो थी वो ,मर्दानी | किसी मर्द भी में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती है....

.... उनका हिसाब तो अब भी बांकी है

शाम हो चुकी थी, नजरे घडी पर थी...
सात बजते ही मै अपना लैपटाप का बैग उठाकर बाहर निकलने लगा तभी किसी कोने से एक आवाज आयी और उसे सुनकर उस केबिन में पंहुचा जहाँ से आवाज आई थी !

“कानपुर जाना है, कल सुबह जरुरी है, ‘बहुत जरुरी’....”

एक आदेश भरी आवाज आयी, और साथ में ही ट्रेन के टिकट हाथो में थमा दिए ! आफिस में दो शब्द बहुत जरुरी होते है : “बहुत जरुरी...”
मैंने बैग की चैन खोलकर टिकट अन्दर रखे और घर के लिए निकल पड़ा ! रास्ते भर जरूरी काम के बारे में सोचता रहा ! सुबह सुबह निकलना है, पैकिंग करनी है, इतना लम्बा रास्ता है..... बाते दिमाग में चल रही थी !
घर में रोज बात हो जाती है इसलिए ये बात दिमाग में नहीं आई की ‘कितने दिन हो गए कानपुर नहीं गया’...
सुबह हुयी जल्दी जल्दी बैग उठाया और ट्रेन के लिए निकल पड़ा... ६ घंटे ट्रेन में चलने के बाद कानपूर पंहुचा... स्टेसन से बाहर निकला तो काफी बदला बदला सा नजारा था ! अब बड़ी बड़ी इमारते खड़ी थी यहाँ, रिक्शो और ऑटो की लम्बी लम्बी लाइने लगी थी, शोर अब पहले से ज्यादा हो चुका था... सब कुछ बदल गया था...सब कुछ !
तभी पहले से बुक टैक्सी वाले का फ़ोन आया वो मेरे सामने ही खड़ा था, उसने मुझे बैठाया और चलने लगा, रास्ते में चलते हुए अचानक वो रास्ता दिख गया जहाँ से गाँव जाया करते थे यही एक छोटा सा स्कूल था, गाँव की ध्यान तो इतनी नहीं आई मगर स्कूल दिमाग में ऐसे घूमने लगा मानो आँखों के सामने ही आ गया हो, वैसे यहाँ से स्कूल काफी दूर था!

.................मगर ६ घंटे में वहां से होकर कानपूर वापस आ सकता हूँ..... ऐसा मैंने सोचा !

“ड्राइवर से कहा जल्दी चलो, १२ बजे तक मेरा मेरा सेमिनार ख़त्म हो जायेगा... वहां से निकलकर स्कूल गया तो आराम से वापस आ जाऊंगा.... कैसा होगा अब वहां का माहौल... मिट्टी का हुआ करता था कभी कही अब वो भी न बदल गया हो....

कई ऐसी बाते दिमाग में दौड़ने लगी, सोचते ही सोचते सेमिनार हाल आ गया, अभी १० बजे थे ११ बजे से मेरा सेमिनार था.... ११ बजते ही मैने अपनी प्रेजेंटेसन शुरू कर दी !
अभी भी १२ बजने में ५ मिनट कम थे और मैंने सभी स्लाइड्स ख़त्म कर दी ! जल्दी जल्दी वहां से निकल....

“काश ड्राइवर ने खाना खा लिया हो.....” सोचते हुए जैसे ही बाहर पंहुचा, ड्राइवर सोफे में बैठा कोई अंग्रेजी पत्रिका में घूर रहा था और मुझे देखकर ऐसे खड़ा हुए जैसे, मेरे मरने की खबर सुनने के बाद उसने मुझे दोबारा जिन्दा देख लिया हो....

“तुमने खाना खा लिया है ?” मैंने पूंछा...

“जी सर...” उसने जबाब दिया...

मैंने उससे उस जगह चलने को बोला, जिसके लिए दिमाग में समुन्दर तैर रहे थे !
पहले मुझे लगा ड्राइवर को परेशानी होगी मगर, मगर उसका जबाब ऐसा आया जैसे वो भी उसी स्कूल से पढ़ा हो और वहां जाने के लिए लालायित हो... उसने बिना रास्ता पूंछे गाड़ी ऐसी दौड़ाई जैसे रोज का आना जाना हो....
मुझे उसने दो घंटे में उस जगह खड़ा कर दिया, मगर ये क्या ....?

“कच्ची से सड़क हुआ करती थी यहाँ तो...?”

“पूरे स्कूल में कमरे कच्चे थे...”

“बहुत सारे पेड़ थे.....”

“एक चाचा “जामुन” बेचते थे यहाँ....”

ऐसे कई प्रश्न मैंने ड्राइवर से दाग दिए... मगर वो किसी एक का भी जबाब नहीं दे पाया...
फिर मै हिम्मत करके उस एसी गाड़ी से बाहर निकला और एक बड़े से गेट के अन्दर अपने कदम रखे, जैसे ही थोड़ा सा अन्दर गया जामुन की डलिया दिखने लगी !
हाँ वहां कोई जामुन बेच रहा था, सोचा वही चाचा होंगे, जिनके पास से बचपन में जामुन लिया करते थे. मगर नजदीक पहुचने पर देखा की एक बूढा आदमी है वहां ! जो ऊपर सही से देख भी नहीं सकता !

.... जब बचपन में स्कूल आते थे तो झुण्ड का झुण्ड जामुन खरीदने पहुचता था, मगर खरीदता एक था बांकी दोस्त चाचा को बातो में लगाकर उनकी जामुन चुरा लेते थे ! बाद में बटवारा होता था सभी में, और खुशिया मनाई जाती थी की कैसे मैंने चाचा को बातो में उलझाकर जामुन उठाई ! कई दिनों तक डींगे मारते रहते थे और ४-५ दिन बाद फिर से जामुन ले आते थे.... जब चाचा थे यहाँ !
मगर ये कौन है ?

फिर मै जब ज्यादा पास गया और उन्हें ध्यान से देखा तो नजारा वही था, ये वही चाचा थे मगर अब बूढ़े हो चुके थे ! डलीया भी वही थी, मगर अब जर्जर हो चुकी थी इसलिए रस्सी के टुकड़ो से बंधी थी, डालिए में कुछ जामुन थे साथ में रखे थैले में कुछ जामुन थे ! उस समय के हिसाब से बीस और आज के हिसाब से २००-२५० रुपये के होंगे!
मै ये सब देख-देख कर सोच ही रहा था की चाचा (बाबा) ने अपने हाथो में कुछ जामुन उठाये और मेरी तरफ बढ़ा दिए, और लड़खड़ाती आवाज में बोले...

“बेटा ले लो ताजे है बिलकुल, मीठे है बहुत, तो खा कर देख लो....”

मगर मै खड़ा देखता रहा, शांत था कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी बस सोच रहा था इन्ही के जामुन मैंने चुराकर खाए थे और बाद में इनका ही मजाक उड़ाया था….

“बेटा एक खाकर तो देखो,मीठे है बहुत... ” बाबा ने अपना सर ऊपर करते हुए जामुन दिखाए....

अब मुझसे रहा नहीं गया, अन्दर ही अन्दर हजारो प्रश्न दिमाग में गूंज रहे था, मै उनके पास जाकर बैठ गया...

“बाबा पहचाना मुझे...?”

“कहा रहते हो, घर में और कोई नहीं है क्या...?, आप अब भी क्यों बैठते हो आकर”

“कितने साल से जामुन बेच रहे हो...?”

मैंने बिना सोचे कई प्रश्न पूंछ लिए, बाबा शांत थे मै उत्तर सुनने का इंतजार करने लगा, काफी देर बाद लड़खड़ाती आवाज में बोले...

“नहीं बेटा, कौन हो तुम?”

“पीछे झुग्गी में रहता हूँ, घर में हम दो ही लोग है, एक बेटा था मगर अब...........”

“अब तो याद भी नहीं है कितने साल हो गए.....”

इस तरह के उत्तर सुनके मेरी कुछ आगे पूछने की हिम्मत नहीं हुयी, और सोचने लगा कैसे आते होंगे यहाँ तक, लड़का भी लाठी है जो कभी भी डगमगा जाती है, कितने जामुन बिकते होंगे यहाँ कभी बच्चे खरीदते है तो कभी नहीं खरीदते और उनमे से कुछ......

अब मेरी आँखों में हलके हलके आंसू आ चुके थे !

..... उनमे से कुछ चुरा भी लेते है ! कैसे चलता होगा गुजरा इनका झुग्गियों में !

“बेटा ले लो न बहुत मीठे है, खाकर तो देखो.....” “कुछ तो खरीद लो....”

बाबा की एक ऐसी मीठी आवाज जिसने मेरी आँखों में आंसू और बढ़ा दिए..
मैंने बाबा के हाथो वाले जामुन अपने हाथो में लिए.. बाजुओं से अपनी आँखे पोंछी और पार्ष से १००० रुपये नोट निकलते हुए बाबा को दिया !

“कितनी दे दूँ बेटा...” बाँट टटोलते हुए बाबा ने कहा...

“बाबा मैंने ले लिए है...”

“बेटा वो तो ५ रुपये की भी नहीं है...” और बाबा ने दिया हुआ नोट अपनी आँखों से ढंग से देखना चाहा...

“बेटा ये कीतेने का है...”

“५० रुपये है बाबा” बाबा से इतना बोलते ही मै खड़ा हुआ और टैक्सी की तरफ बढ़ने लगा, तभी आवाज आयी
“बेटा बांकी बचे पैसे तो ले लो, हिसाब तो कर लो”

मैंने वहीँ से कहा “बाबा आज पूरा हिसाब हो गया”..
......जामुन खाते हुए आंगे बढ़ा और गाड़ी में बैठ गया...हिसाब तो अब भी बांकी है !

और जब हथेली में रखे उन जामुनो को मैंने देखा तो मानो ऐसा लग रहा था की जैसे.... 
वो मुझ पर घूम घूम और घूर घूर कर हँस रहे हो.... उस नादानियत पर.... :( 

...वो आखिरी मेट्रो

...सात तारिख थी, आफिस में काम ज्यादा था इसलिए वो बिना घडी देखे काम करता रहा, तभी अचानक से घडी में नजर पहुची तो देखा रात के दस बज गए है टाइम देखकर वो फिर से जल्दी जल्दी काम में लग गया ! काम ११ बजे ख़त्म हुआ, काम ख़त्म होते ही उसने तुरंत बैग उठाया... और जल्दी जल्दी कंप्यूटर बंद करके ऑटो स्टैंड पर पंहुच गया... मगर रात ज्यादा होने की वजह से वहां कोई ऑटो नहीं दिख रहा था..
वो मन ही मन सोच रहा था की आज तो मेट्रो छूट ही जायेगी, आखिरी मेट्रो... आखिरी मेट्रो भी नहीं मिलेगी...
तभी सामने एक पूरा भरा हुआ ऑटो आया... मगर थोड़ी मिन्नत करने के बाद उसने ऑटो की थोड़ी सी जगह में उसे भी बैठा लिया...
मेट्रो स्टेशन पहुच गया,अब मन में थोड़ी ख़ुशी थी ...
आखिरी मेट्रो के आने में ५ मिनट शेष थे, वो इंतजार करने लगा और जैसे मेट्रो आई तुरंत चढ़ा और फिर पानी पीकर एक लम्बी साँस ली...
"अगर ये मेट्रो छूट जाती तो क्या होता आज, मर ही जाता मै तो... क्या राजीव चौक से मेट्रो मिलेगी....कही वहां से आखिरी मेट्रो निकल न गयी हो... अगर न मिली तो क्या होगा... कैसे जाऊंगा...पैसे भी नहीं है....!
मगर हाँ आज तोसात तारीख है.... तनख्वाह आ गयी होगी.... ठीक है कोई दिक्कत नहीं है... घर तो चला ही जाऊंगा... ऑटो या बस ही सही.... ....." और न जाने कितनी बाते उसके दिमाग में मेट्रो के साथ दौड़ रही थे !

राजीव चौक आते-आते १२ बज गए थे, वो तुरंत मेट्रो से उतरकर, दौड़ा-दौड़ा एक गार्ड के पसा पंहुचा, मगर उसने बताया की नोएडा की आखिरी मेट्रो तो जा चुकी है.............
२ मिनट के लिए दिमाग सुन्न सा हो गया... उसके जेब में पैसे नहीं थे....और फिर मुस्कराकर बाहर की तरफ चल दिया, चलो 'एटीएम' से तनख्वाह निकालकर ऑटो या बस से चला जाता हूँ !
....उसने पूरी सेलरी निकलकर पर्स में रखी और बाहर बस स्टैंड पंहुचा मगर काफी देर तक कोई बस या ऑटो नहीं आया, तभी बस का इंतजार करते-करते एक सिगरेट लेकर धुआं उड़ाने लगा, देखते ही देखते उसने ३-४ सिगरेट जला डाली... काफी देर हो गयी, मगर कोई बस अब भी नहीं आई !
वो खड़ा खड़ा सिगरेट का धुआं उड़ा ही रहा था की एक १८-१९ साल का लड़का आकर उससे ५० रुपये मांगने लगा...
उसने बड़े अट्टहास के साथ कहा- ५० रुपये मजाक है क्या.... इतने सारे पैसे का क्या करेगा....नशा करना है.... साले मेरे पास इतने पैसे नहीं है....और कोई 'भीख' में ५० रुपये मांगता है....
तभी उस लड़के ने कहा- साहब मै बड़ी दूर से आ रहा हूँ.... मेरी आखिरी  मेट्रो छूट गयी है...  बस भी नहीं है अब कोई.... अब ऑटो से ही जाना पड़ेगा, ऑटो वाला १०० रुपये मांग रहा है मेरे पास ५० रुपये है... मुझे ५० रुपये दे-दो... घर जल्दी पहुचना है, रात की वजह से ऑटो वाला विश्वास नहीं कर रहा, नहीं तो मई उसे घर जाके दे देता...
'मै आपको जनता हूँ, आप रोज गुडगाँव से चढ़ते हो मै भी वही से आता हूँ, कल आपके पैसे वापस कर दूंगा.....' वो लड़का बोला.
मगर उसने धुआं उड़ाते हुए उसकी एक भी बात न सुनी और गालियाँ देता हुआ रोड की दूसरी तरफ ऑटो के लिए जाने लगा...
तभी अचानक से एक बड़ी जोर की आवाज हुयी....!!
...और  जब उसकी आँख खुली तो खुद को अस्पताल में पाया, होश आते ही उसने अपनी घडी, सोने की जंजीर, अंगूठियाँ और जूते देखे... सब खुछ था वहां...!
फिर अचानक से उसका ध्यान पर्स पर गया, मगर पर्स गायब था !
"..जरुर उसी साले ने चुराया होगा, पूरी महीने की तनख्वाह थी... साला ले गया पूरे पैसे... ..." ये सब सोचकर परेशान होने लगा ! सर में तेज चोट लगी थी, पैर में एक-दो छोटे छोटे कट लगे थे और हाथ की एक कोहनी में पट्टी बंधी थी जहाँ से खून निकल रहा था !
परेशान होता देख नर्स आई और मुस्कराकर पूंछने लगी 'क्या हुआ सर" लेटे रहिये आपकी हालत सही नहीं है अभी... सर में तेज चोट है ! एक दो जाँच की रिपोर्ट आनी है अभी... आराम करिए आप... लेट जाइए...
मगर उसने नर्स से झिर्राते हुए कहा मै यहाँ कैसे आया और मेरा पर्स किसने चुराया....?
तब नर्स ने उससे बताया आपको किसी ऑटो से तेज टक्कर लगी थी, आप बेहोश थे, यहाँ आपको एक १८-१९ साल का लड़का लेकर आया था.... परेशान मत होइए आपका 'पर्स' मेरे पास है,उस लड़के ने  मुझे दिया था, ये रहा आपका पर्स......
पर्स लेते ही तुरंत उसने पैसे गिने... पैसे पूरे थे बस ५० रूपये कम थे...
उसकी आँखे भीग गयी... थोड़ी देर के लिए खामोश हो गया...
और उस आखिरी मेट्रो के बारे में सोचने लगा... उस लड़के के बारे में सोचने लगा...
उसे बस इतना पता था की पर्स से 50 रुपये कम है, मगर उसे ये नहीं पता की जिसने उसे टक्कर मारी थी वो वही ऑटो वाला था जिसमे वो खुद जाने वाला था...!!

...फिर वो सामान उठाकर "नंगे पांव" घर को चल दिये !

आज काफी दिनों बाद घर जाना हुआ, बदलाव बदलते-बदलते यहाँ भी पहुच चुका है ! घरो का झुण्ड गाँव में तो पहले ही बदल गया था अब गाँव क़स्बा बन गया है ! बैलगाड़ी की जगह मोटर गाड़ी चलने लगे है, इतवार की जगह सन्डे होने लगा है, बुजुर्ग लोग पहले टहलने जाते थे मगर अब 'वाक्' पर जाने लगे है, शहर से काफी कुछ बदलाव इस छोटे से कस्बे में भी 'इंटर' का चुका है ! लोग इसे देखकर काफी खुश है, वो इसे 'इंजॉय' भी कर रहे है और आगे बढ़ रहे है !
मै  भी शाम को दोस्तों के साथ "वाक्" पर निकला, बाज़ार जाकर 'पानी के बतासे' खाने की इच्छा हुयी मगर बाज़ार पंहुचा तो लोग इसका नाम भी भूल गए थे, अब यहाँ "पानी पूरी" का चलन हो गया है, कभी एक रुपये के पांच मिला करते थे मगर अब १० रुपये के पांच मिलने लगे है ! फिर भी मन नहीं माना, तो 'पानी पूरी' खाकर, बाज़ार की शैर में निकल पड़े ! चलते चलते उस कोने में पहुचे जहाँ से बचपन में 'स्कूल' जाया करते थे और ठीक कोने में एक बाबा बैठे रहते थे जिनसे नमस्ते करते थे...
तभी मन हुआ 'स्कूल' घूमने चलते है मगर दोस्तों ने बताया स्कूल तो वहां से हटकर कही और पहुच गया है, फिर मन मारकर उसी कोने के सामने खड़े होकर बाते करने लगे. वो कोने वाले बाबा अब भी उसी कोने में बैठे थे, उनसे उसी बचपन वाले अंदाज में नमस्ते किया... और फिर अचानक से दिमाग में एक सोच का समुन्दर बहने लगा...
उस बुजुर्ग बाबा को देखकर मै सहम सा गया, मैने स्कूल से निकलकर कालेज की पढाई कर ली और अब नौकरी भी करने लगा, इन सब में लगभग १५ साल का वक्त तो लग ही गया होगा, मगर बाबा अब बभी वैसे ही है, वही है...
आँखों में मोटे लेंस का चश्मा, जिसके अन्दर से उनकी आँखे भी दिख जाती है जिनसे उनकी आँखों की झुर्रियां साफ़ नजर आती है, कांपते हुए हाथ जो कभी कभी चाय का ग्लास पकड़ते हुए जल भी जाता है, सर पर कुछ सफ़ेद बाल, बदन में  सफ़ेद 'बंडा' और 'धोती'.... मगर अब बाबा का सर कमजोरी और बुढ़ापे की वजह से हमेशा नीचे की ओर झुका देखा , नज़रे नीचे नीचे राहगीरों के पैरो पर थी, दिनभर में हजारो पैरो की तश्वीरे उनके रात के सपनो में आती होगी,और बाबा तब भी सोचते होंगे, सब के सब सही है, इनमे से कोई भी मेरे पास नहीं आएगा....फिर अगले दिन उठकर अपना फटा और भरी बैग लेकर उसी कोने में बैठ जाते होंगे और राहगीरों के पैरो को देखने लगते होंगे, और सोचने लगते होंगे की आज किसी एक की चप्पल या जूता तो फटा होगा....आज कोई न कोई तो जरुर आएगा.... कई दिनों से शांत राखी सुई और धागे....आज हाथ में जरुर आयेगे...
मगर इसी सोच में उनके कई और दिन गुजर जाते है...
अब यहाँ सोचना जाहिर है
'बाबा' यहाँ, क्यों ? क्यों बैठते है आकर ? क्या जरुरत है इस बुढ़ापे में भी ? आखिर क्या मजबूरी है अब ?
पूरे दिन में कभी कभी उनके पास कोई एक चप्पल या जूता लेकर लेकर आ जाता है, वो भी ऐसी जर्जर हालत में होते है की उस पर आलपिन या घर के सुई धागे का अत्याचार हो चूका होता है... तब भी बाबा उसे पूरे मन से सुधारने में लग जाते है और उसके बाद उन्हें इसके ४-५ रुपये मिल जाते है...
मगर एक दिन में ४-५ रुपये में क्या होता है वो भी कभी कभी, क्या वो यहाँ तक ४-५ रुपये के लिए आते है ? ? ?
बाबा के सामने बैठे मै ये सब सोच ही रहा था की अचानक से एक नवयुवक उनके सामने आकर खड़ा हो गया... बाबा की नज़रे उनके पैर पर ही थी, आधा मिनट तक जब उस नवयुवक ने कुछ नहीं कहा, तब बाबा ने अपनी गर्दन ऊपर उठाते हुए, लड़खड़ाती आवाज में  कहा "साहब बताइए क्या सींना  है... ?"
सच में अभी तक मैंने इतनी मीठी आवाज नहीं सुनी थी, जहा कोई नहीं आता है, वहां पर भी लोगो को इतनी इज्जत मिलती है ? आजकल वो जमाना नहीं रहा जब लोग घर वालो के जूते चप्पल 'मोची' बाबा के यहाँ से सही करवाते थे.... जमाना बदल गया है, ट्रेन से मेट्रो तक लोग आसानी से पहुच गए है, चप्पल जूते टूटने के बाद कोई  सिलवाता नहीं है, ऐसे ज़माने में भी बाबा यहाँ आकर क्यों बैठते है, इतने तनाव के बाद भी इतना मीठा कैसे बोल सकते है ................? कैसे ?

......तभी साहब ने एक थैला देते हुए जबाब दिया बाबा इनको सीं देना... बाबा ने थैला लिया और बिना दाम बताये काम करना शुरू कर दिया... सारा काम करने के बाद जब बाबा ने साहब से पैसे मांगे तो साहब ने उसमे भी बाबा पर झिर्राते हुए ४-५ रुपये कम दिए, और गुस्से से सामान लेकर चले गए....
ये सब देखकर बार बार फिर से वही प्रश्न दिमाग में आ रहा है : वो रोज यहाँ आते क्यों है ? आजकल कौन जूता चप्पल सही कराता है ? किसके पास टाइम है ?.....
खैर इन सब को कौन ध्यान देता है, तेज गति से सबके पैर चले जा रहे है !
शाम का अँधेरा हो रहा था 'बाबा' ने समान बांधते हुए भी पैरो को घूरना जारी रखा मगर कोई नहीं आया, एक आशा निराशा में बदली...
फिर वो सामान उठाकर "नंगे पांव" घर को चल दिये...
#YugalVani

आज फिर मजाक बना है, उसके गाँव का एक किसान मरा है...

आज फिर मजाक बना है, 
उसके गाँव का एक किसान मरा है, 
कल तक जब 
कड़-कडाती धूप,
थर-थराती सर्दी,
गड-गड़ाती बरसात
में 
बिना गमझे, 
बिना छाता
बिना चप्पल 
बिना कम्बल 
पैदल उस खेत में जाता था,
जहाँ की दाल और अनाज 
से 
तुम्हारी थाली में खाना सजता है,
आज फिर उसका मजाक बना है...
जब तक वो था,
उस पर सब भारी थे,
तुम्हारे खाने का मालिक होकर भी 
किसी मालिक का नौकर था,
कल सबके लिए खाना उगा पाए,
कभी कभी खुद भूखा सोता था,
तब कोई नहीं आया 
...मतलब कोई नहीं 
आज एक एक करके 
सब चिल्ला पड़े 
"उस गाँव में फिर एक किसान मरा है"
उसकी वजह से मरा है 
उसकी सरकार की वजह से मरा है 
ऐसे मरा है वैसे मरा है....
किसी ने नहीं छोड़ा आज उसे
आज फिर उसका मजाक बना है...
मजाक मजाक में सरकार ने 
मुआवजा देने को कह दिया,
जनाब बस पैसो में मत लगाओ उसकी कीमत, 
वर्ना कभी चुका नहीं पाओगे कर्ज उनका, 
वो अन्नदाता था तुम्हारा...
आज फिर मजाक बना है, 
उसके गाँव का एक किसान मरा है,
#YugalVani

उस छोटू को भी जिंदगी जीने का हक़ है, उसे तो मत छीनो...

वैसे तो रोजाना सैकड़ो मांगने वाले दिख जाते थे, जो मेट्रो में जाते वक्त और निकलते वक्त हमेशा एक ही जगह पर मिलते थे ! उनमे कुछ महिलाएं होती थी, कुछ बूढ़े होते थे, कुछ अपाहिज होते थे जो अपनी जीविका के लिए कुछ न कुछ मंगाते रहते थे !
मगर सब के साथ कोई बच्चा या मांगने कारण होता था जिसे दिखाकर वो लोगो से कुछ मांग करते थे ! वैसे मैंने इनमे से कभी ही शायद किसी को पैसे दिए हो लेकिन खाने का सामान या पानी कई बार दिया होगा ! और देने के साथ ही मेट्रो के अन्दर चला जाता था या बाहर आ जाता था !
आज अक्षरधाम मेट्रो में बाहर निकलते ही, जैसे मई ओवर ब्रिज पर आया तो एक करीब ७-८ साल का बच्चा बैठा खाने के लिए पैसे मांग रहा था, नजर उस पर पड़ी और ठहर सी गयी, मानो को जानने वाला मिल गया हो और पूरे शरीर में एक तेज झटका सा लगा ! थोड़ी देर बाद जब नजर हटी तो अचानक से दिमाग में घूमा एक बच्चा जिसकी उम्र पढने की है, खेलने की है, खाने की है घूमने की है वो यहाँ बैठा क्या मांग रहा है ! ऐसा लड़का जिसके दिमाग में तेज झलक रहा था वो इस बात की ट्रेनिग ले रहा है की लोगो से भूख के लिए "भीख" कैसे मांगे ? कैसे बैठू की लोग पैसे दे दे ? कौन से तरीके से मांगू की लोग खाना दे दे?  किससे  मांगू की वो पानी दे दे ! वैसे तो लोग बड़ी बड़ी फिल्मे देखकर गरीबो की चुटकी में मदद करने की सोच लेते है मगर वो सोच बाहर कौन नकाल सकता है ऐसे आदमी को वो कैसे पहिचाने इस प्रशिक्षण में वो लगा हुआ है ........... :(
कुछ देर सोचने के बाद कुछ बात करने की इच्छा हुयी फिर सोच इसे बुलाऊ क्या .....? नाम पता नहीं है ! फिर कुछ सोचते हुए मैंने कहा -"छोटू" तो वो छोटे बच्चा सहम सा गया, उससे शायद ही किसी ने पूछा हो या बात की हो उसके पास लोग एक- दो रुपये फेकते और घूरकर निकल जा रहे थे... तो वो डरा हुआ बोला हाँ !
शायद ममता  का भूखा था और परिवार से दूर या परिवार था ही नहीं...
अब दिल में था इससे पूंछू क्या मैंने भी बड़ी हिम्मत करके पूंछा "छोटू ये सब क्यों ? घर में कोई नहीं है क्या ?............."
फिर से छोटू का जबाब डरते हुए आया "पता नहीं", उत्तर कठोर था मगर उत्तर में बच्चे का "क्रोध, डर, परेशानियाँ, भूख, प्यास..." सब कुछ झलक रहा था! तभी मैंने मेरे बैग में राखी बोतल का पानी उसे दिया और एक आधा परले बिस्कुट का पैकेट पड़ा था जो मैंने उसे खाने को दिया पहले उसने मन किया मगर फिर खा लिया !
मुझे उत्सुकता थी की मई जानू आखिर छोटू यहाँ क्यों है, फिर उसने जैसे ही पानी पिया मैंने फिर से अपना प्रश्न रख दिया : "छोटू यहाँ क्यों बैठे हो, पढाई नहीं कर सकते, घर वाले कहा है................".
फिर से उसके मन में  दर था मगर कुछ कम, मगर इस बार प्रश्न को सुनते ही उसकी आँखों में अंशू आ गए और फिर डरता हुआ बोला-
"एक ढाबा में काम करता था, वहन खाना नहीं मिलता था इसलिए भैया, भूखा लगती है तेज...... "
इस उत्तर के पीछे क्या था ये नहीं पता, लेकिन उसके उत्तर में सच्चाई थी जो उसके चहरे में झलक रही थी इसलिए मैंने इस बारे में ज्यादा न पूंछकर, मैंने घर के बारे में फिर से पूंछ लिया:
उस पर छोटू बोला : नहीं पता, बचपन से एक औरत के साथ था जो उस ढाबे में काम करती थी मगर २ साल पहले वो भी नहीं रही इसलिए वो भटक रहा है"
"कहा  से है" नहीं पता...
इस १५ मिनट के वक्त के बाद मैंने उसे एक २० रुपये की  भेलपूरी दिलायी और उसका साथ छोड़कर अपने घर की तरफ चला आया...
अब रस्ते में हजार प्रश्न थे मेरे दिमाग में...
आखिर ये छोटू कहा आया ?
आखिर छोटे बच्चो को काम करने की जरुरत क्यों पड़ती है ?
भीख मांगना तो दूर वो उस ढाबे में काम क्यों कर रहा था ?
बच्चे इमारतो के नीचे गाड़ी धोते क्यों दिख जाते है ?
आदि अनेक प्रश्न है जो अब तक दिमाग में घूम रहे है?

क्या इनकी जिंदगी नहीं है ? घर में माँ-बाप नही है तो जीने का हक़ नहीं है ? घर नहीं है तो जीने का हक़ नहीं है ? नौकर है तो जीने का हक़ नहीं है ? आप[की गाढ़ी धोते है तो जीने का हक़ नहीं है ? आपको चाय का ग्लास देते है तो जीने का हक़ नहीं है ?
इन पर भरोसा करो, इन्हें भी बड़ा होने दो !
किस बात का दर है कही ये आपसे आगे न निकल जाये ?

क्या "स्त्री" होना अपराध है ?

क्या "स्त्री" होना अपराध है ?
दिन भर ताना सुन
कर भी,
कितनी खुश होती है वो...
बिना 'खाने' के 
दिन गुजर जाता है
उसका...
बिना 'शिकायत' के 
जिंदगी गुजार देती है 
'वो'...
फिर भी उस पर ये 'इन्सान' 
इतना 'शैतान' क्यों है ?
हैवान क्यों है ?
क्या अपराध किया जो वो "स्त्री" हुयी ?
राते बिता देती है वो 
रोटी से बाते करके...
अगर एक दिन 'मै' देर से आया...
घर में अकेले पूरी 'जिंदगी'
बिता देती है 'वो' 
सीमा में खड़े 'पति' के लिए....
साथ कोई हो न हो
'वो' हमेशा साथ खड़ी होती है...
कभी भी,
कही भी,
कैसे भी,
फिर भी उसकी सांसो में चीत्कार क्यों ? 
क्या अपराध है उसका 
यही की वो "माँ", "पत्नी" या "बहिन" है ?

न जाने कितने 'वार'
व्रत में गुजर देती है वो, 
हमेशा 'पति' के जूठन से 
खोलती है सारे व्रत वो,
फिर भी मुस्कराने पर 
"बदचलन" बता दिया उसे... 
घर से बाहर निकली 
तो 'दामिनी' बना दिया उसे...
आखिर अपराध क्या था ?
यही की वो "नारी" थी ?
#YugalVani
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