अब मेरा कानपुर कैसा होगा ?

कानपूर से अलग हुए काफी दिन हो गए, एक मित्र को फोन मिलाया... वैसे मै कानपूर से १०० किलोमीटर दूर रहता हूँ... मगर कुछ अपनापन सा हमेशा लगता है कानपूर से.. स्कूल के बाद का एक साल वाही गुजारा है ! मित्रता और मित्र कानपुर को यूपी का कलकत्ता मानते हैं। उसने कहा, अब मेरा कानपुर कैसा होगा, मुझे पता नहीं। एकदम से मेरा दिमाग रुक गया, जैसे कोई शहर ठहर जाता है। यह एक ऐतिहासिक शहर की औपनिवेशिक व्याख्या है। हमारे मन में कलकत्ता का मतलब कहीं ठहर गया शहर है। हमारे अंदर का यह कलकत्ता, वह कलकत्ता कभी नहीं होता, अगर ब्योमकेश बख्शी को हमने पढ़ा नहीं होता ।... हमें तलाश है किसी कानपुरिए जासूस की, जिससे हम प्यार कर सकें और उसकी नजर से फिर शहर देख सकें। 

कानपुर कैसा होगा? 
एक कानपुर देहात है, एक कानपुर शहर। 
अपनी भी दो दिल्ली है- एक नई, एक पुरानी। 



भोपाल व लखनऊ भी एक साथ नए और पुराने शहरों को अपने अंदर लिए खुद को लगातार बदल रहे हैं। इनके बीच कोई कर्क रेखा नहीं होती। वह तो हमारे मनों में होती है, जो इनको बांटती है। वे तो बराबर एक-दूसरे में आवाजाही करते रहते हैं। पर जब हम बड़ी-बड़ी श्रेणियां बनाकर किसी जीवंत शहर का वर्गीकरण करते हैं, तब समस्याग्रस्त हो जाते हैं। हम बारीक परतों को अनदेखा कर देते हैं, जिनके बीच अतीत व वर्तमान अदृश्य रहकर भविष्य को निर्मित करने में लगे रहते हैं। वह तब शहर नहीं रहता, ‘TEXT’ बन जाता है। एक पाठ, जिसे कोई किताब की तरह पढ़ने की जिद लिए रहता है। वैसे कभी-कभी लगता है कि ऐसे सवाल हम जैसे एक-दो दिन शहर के ऊपर से उड़ने वाले कबूतर ही पूछते हैं, वहां रहने वालों को इनसे कोई फर्क नहीं पड़ता। 

घर के सामने का वो दरवाजा...

घर के सामने का वो दरवाजा 
जब भी खुलता है 
जिंदगी के और करीब ले जाता है,
मेरा कुछ हिस्सा यहाँ छोड़कर, 
उसके पास ले जाता है,
कभी बच्चे की हंसी,
तो कभी माँ का चिल्लाना,
कभी हसीन सपने,
तो कभी उदास खामोशियाँ
वहाँ से बाहर निकाल लाता है...
घर के सामने का वो दरवाजा
जिंदगी के और करीब ले जाता है,
कभी हलके रंगों से ढकी दीवारे,
तो कभी गहरे रंगों की खूटियाँ,
कभी हवा में नाचते परदे
तो कभी शांत जड़ी तश्वीरे,
मेरी अशांत आँखों को जब-जब दिखती है
एकदम खामोश सा कर जाती है
घर के सामने का वो दरवाजा
जिंदगी के और करीब ले जाता है,
कभी बरसात से बचाता
तो कभी धुप अन्दर ले जाता
कभी परदों से दिलदार
तो कभी सीमाओं की दीवार
कभी तूफानों को इंकार
तो कभी हवाओ से इकरार
करता घर के सामने का वो दरवाजा
जिंदगी के और करीब ले जाता है,
कभी बच्चों की उम्मीद दिखाता,
तो कभी माँ का इंतज़ार करता
कभी लोगो को विदा करता
तो कभी खुशियों का इजहार करता
लाखो खामोशियो के बावजूद
न जाने क्या क्या कह जाता...
घर के सामने का वो दरवाजा
जिंदगी के और करीब ले जाता है,
रोज खुलता है रोज बंद होता है
दिन में कई बार...
एक रोज घर के सामने का वो दरवाजा
न खुलेगा कभी न बंद होगा कभी
न हिलेगे परदे कभी, न झाकेंगी आँखे उसको कभी
न हवाओ से आवाजे होगी कभी,
न मुझसे बाते होगी कभी
बूढी आँखों की तरह बंद हो जायेगा
मानो मौत का आलिंगन हुआ हो...
घर के सामने का वो दरवाजा
जिंदगी के और करीब ले जाता है...
‪#‎YugalVani‬

"पापा...” कुछ कहना था उस रोज

"पापा...”
कुछ कहना था उस रोज
मगर मेरे लफ्जो में एक डर था,
न जाने किसका, किस बात का
कई बार सोचा
मगर हिम्मत नहीं थी
सोचकर फिर भूल गया

कुछ कहना था उस रोज
मगर अभी तक कुछ कह न पाया
पापा जब मै घर से निकला
तो भटकता रहता था
स्कूल से घर और घर से स्कूल
बस कमरे के चार कोने
और एक लम्बी सड़क
से अच्छी दोस्ती हो गयी थी मेरी...
मगर बचपन वाला
आपका कन्धा अब नहीं था यहाँ,
हंसने और घूमने के लिए...
कभी कभी रात को नींद आती
उसने भी एक प्यार की
ख्वाहिस पाल रखी थी आपकी...
यहाँ कभी टीचर में तो कभी किसी बुजुर्ग में
देखने की कोशिश करता हूँ आपको,
मगर कुछ एहसास नहीं होता,
उनमे वो बात नहीं होती, जो आपमें है...
और भी बहुत कुछ है जो
कभी कह न पाया...
आप थे तो सब कुछ साथ था
आपका गुस्सा था मगर एक हिम्मत भी थी,
आपकी व्यस्तता थी मगर एक प्रेरणा भी थी,
आपके साथ हर सुबह  नई किरण होती थी
हर दिन एक  नई खुशी होती थी,
हर पल, हर दिन
एक नयी सफलता होती थी,
मगर अब इतनी दूर,
हर दिन घड़ी के घंटे गिनता हूँ
और हर रात नींदों में लम्हे सजाता हूँ..
इतना सब कुछ था
मगर कभी कह न पाया...
 #YugalVani

अकेला...

अकेला...
गाँव और माँ से
दूर जब-जब हुआ,
तरक्की
“किश्तों और रिश्तो” की करने
मै एक शहर को बढ़ा,
जहा एक कमरा था
किराये का
और 'मै'
रोज रोज कुछ नए नए
लोग मिलते मगर
मगर ‘मै’ अकेला था
कल भी और आज भी बिना लोगो के...
अब बस साथ थे तो :
ख्वाहिशें
उम्मीदें,
ज़रूरतें,
और ज़िम्मेदारियाँ.....
और किराये का वो कमरा
जो अब ‘माँ’ बन चुका था
रोज दुलारता,
संवारता,
और रात तक इंतजार में जागता रहता था...
जो अब भी हमेशा मेरे साथ रहता है,
अंकुरण के युगल में...
#YugalVani

मेरे हिस्से की रोशनी भी तुम खा गए

मेरे हिस्से की रोशनी भी तुम खा गए
कल ही देखा था
हरियाली थी खेतो में
सबके घर जैसे घर थे
गांव थे, शहर थे
रात को दिए की
और
दिन में 'सूरज' की
रोशनी थी
मगर बराबर-बराबर
सर्दियों में धुप थी 
बराबर-बराबर
न जाने
आज कौन इतना खुदगर्ज हो गया
न जाने कौन खेतो में 'ईट' बो गया
ये घर न जाने कब माकन बन गए
न जाने किसका तजुर्बा था
जो एक ईमारत और
एक झोपड़ी की इबारत लिख गया
बस कल से आज हुआ था
एक झोपड़ी को इमारतों ने घेर लिया
और....
और
उस झोपड़ी के हिस्से की
धूप, रोशनी और सूरज भी खा लिया...

राजनीती की एक रोटी...

राजनीती की एक रोटी
पहले से गोलाई को तड़पती 
मौसम दर मौसम सिकुड़ती
कब पकेगी 
कैसे पकेगी 
कौन पकाएगा 
हर पल सोचती...बस सोचती... और सोचती...
कल तक थे कुछ साथ 
बिना किसी शर्त के 
मगर आज लगी एक अजीब नजर है 
किसी की 
ब्रेकअप - पैचअप 
प्रपोजल - डाईवार्स 
सब कुछ होने लगा है 
इनके बीच
आज की सी विनाश्नीति में 
और अब फसी है 
एक बेचारी ‘रोटी’ यहाँ 
“राजनीती” की 
‘तवे’ के इन्तजार में
कहा सिके 
कैसे सिके 
कौन सेके... 
एक अजीब होड़ मची है 
कल तक उसके तवे में सेक रहे थे 
आज इनका तवा गर्म दिखा है 
यहाँ सेक रहे है 
कल किसी और का दिखेगा 
वहाँ सेक लेगे
इसी होड़ में 
हा बस इसी होड़ में वो 
ये भूल गए 
की तेज आंच में तवा गर्म होकर 
रोटी जला भी देता है... tongue emoticon
‪#‎YugalVani‬

किरण जी आपकी एक हरकत ने केजरीवाल के लिए दिल में इज्जत और बढ़ा दी...


एक आन्दोलन जो आज से ठीक साढ़े तीन साल पहले शुरू हुआ था ! जिसमे सैकड़ो लोग जेल में बंद कर दिए गए थे और लाखो लोग सड़कों पर उतर आये थे ! जिसके कुछ नामो को मै कभी नही भूल सकता : अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, कुमार विश्वास, बाबा रामदेव, मनीष सिसोदिया आदि !
सारे नाम एक मंच में थे, एक मुद्दे के साथ एक मुहीम, देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करने के लिए, देश सुधार के लिए ! रोज मंच से देश सुधार के लिए आवाज आती थी, लोगो के जुड़ने की फरियाद होती थी !
मै उसी समय से इस आन्दोलन से जुड़ा हूँ ! जेल जाने वाले चन्द लोगो में मै भी था ! हमेशा गर्व रहा है उस बात का और आज ये गर्व और बढ़ गया जब किरण बेदी ने भाजपा की सदस्यता ली !
२०११ में जब आन्दोलन शुरू हुआ मंच से हर पार्टी की सच्चाई को सामने लाया गया ! सप्ताधारी कांग्रेस हो या भाजपा सभी के नाम सामने आये ! दोनों डालो में भ्रष्टाचारियो की भरमार थी और है ! आन्दोलन आगे बढ़ रहा था ! झूठे वादों के साथ सप्ताधारियों ने आन्दोलन को शांत करा दिया ! कुछ वक्त आगे बढ़ा मगर वादों पर सर्कार ने कोई विचार नहीं किया तभी अरविन्द केजरीवाल ने आगे आकर एक ऐसा दल बनाया जिसमे कुछ संभावनाएं देश को दिखी मगर दल बनाने के साथ ही विरोधी भी बना डाले ! किरण बेदी से लगाकर अन्ना हजारे सब ने विरोध किया, सबने कहा हमें राजनीती नहीं करनी हम केजरीवाल के साथ नहीं है हम राजनीती के विरोध में है हम समाजसेवक है.......
मुझे भी उस वक्त थोडा अजीब लगा मगर जब मै दिल्ली चुनाव में मनीष सिसोदिया के साथ चुनाव प्रचार में निकला, और लोगो की आश दिखी, एक ऐसी आश जिसके इन्तजार में वो काफी दिनों से थे ! जो भाजपा और कांग्रेस से दूर हो ! साफ़ हो ! स्वच्छ हो ! आम आदमी के लिए हो ! सबके लिए हो ! इस दिन के बाद मुझे विश्वास हो गया अरविन्द का निर्णय गलत नहीं था ! दिल्ली में सर्कार बनायीं और चलायी ! सरकार गिरी मगर अरविन्द ने मैदान नहीं छोड़ा ! साथ के लोगो ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया मगर उसके पैर तक नहीं डिगे !
मुझे गर्व था हमेशा की मै उस समूह का सदस्य हूँ ! समय बढ़ता गया लोकसभा चुनाव हुए हार हुयी मगर वो अडिग था हमेशा की तरह ! कुछ और साथी जो सच में देश के लिए कुछ करना चाहते थे उसके साथ खड़े थे, और आज भी खड़े है !
लोकसभा चुनाव के बाद मै धोड़ा राजनीती से अलग होता गया मगर एक दृश्य जिसने मेरा दिल दहला दिया मुझे राजनीती की तरफ फिर खीच लायी !
किरण बेदी का भाजपा में आना... राजनीती में आना...
जो कल तक राजनीती के विरोध में थी जिसने उन्ही नेताओ को गलियां दी थी अन्ना के उस मंच से, जिसने भ्रष्टाचार के खात्मे की लड़ाई में हिस्सा इया था ! जो जेल गयी थी इन्ही दलों के विरोध में ! कल तक जिसने अरविन्द को बुरा बताया राजनीती में आने के लिए ! आज वो राजनीती में आ गया !
राजनीती में आना ठीक था मगर एक ऐसी पार्टी के साथ जिसके खिलाफ कल तक खड़ी थी, सतीश उपाध्याय, नितिन गडकरी, येदुरप्पा जिसके हिस्से है !
अरविन्द ने राजनीती चुनी मगर एक अलग टीम के साथ ! एक अलग छवि के साथ !
किसी  भ्रष्ट दल में घुसकर नहीं ! सप्ता का लालची अरविन्द नहीं है सप्ता की लालची तो आप निकली किरण जी जो कही भी सेट हो लिए !
खेद है आपके विचारो पर कल तक सम्मान था आपके लिए आज नहीं है !
मगर आपकी इस हरकत ने अरविन्द के लिए इज्जत और बढ़ा दी ! “वो हमेशा से वही था जो दिखता है, बोलता है उसकी नियत साफ़ है सबके सामने है !!







क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई, जो तुमने इन बच्चो पर गोली चलाई... #YugalVani

क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई,
जो तुमने इन बच्चो पर गोली चलाई,
एक माँ तुम्हारी भी तो होगी,
जो रोने पर खुद रो पड़ती थी
आंसुओ को तुम्हारे खुद पोछते पोछते,
और न जाने कितने दर्द छिपाती
बिना कुछ बताये बिना कुछ चिल्लाये,
उस माँ के बच्चो पर तुमने गोली चलाई
क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई...
खुद तुम्हे पढ़ाती रही, बढ़ाती रही
अपने पैबंद बार बार गवांती रही,
न जाने किस मिट्टी से बनी थी वो
जो हर दर्द में साथ रही और मुस्कुराती रही
तुम्हारी भी तो ऐसी ही माँ थी न
क्या तुम्हे उस माँ की जरा सी भी याद नहीं आई...
जो जरा से देर से तुम्हारे घर
लौटने में घबरा जाती थी
तुमने उसके बच्चो को घर लौटने ही नहीं दिया...
पैर की जरा सी चोट के खून से
वो माँ सहम जाती थी
उस माँ को तुमने खून से लथपथ बच्चे भेज दिए...
खुद भूखी रहकर
आखिरी रोटी भी खिला देती दी जो तुम्हे
उस माँ के भूखे बच्चे तुमने मार डाले...
तुम्हारी उंगली को बनाया,
फिर उस उंगली को पकड़कर चलना सिखाया
आज उस माँ को तुमने कटा हुआ अगूंठा दिखा दिया...
क्या तुम्हे उस माँ की जरा सी भी याद नहीं आई
जब भी तुमने गोली चलाई
क्या तुम्हे माँ याद नहीं आई..

एक जवान देश के लिए कभी अकेला नहीं मरता...

देश, दिशा और दशा हर जगह एक फौजी होता है, 
मरने के बाद शहीद होता है ! 
मगर उसके लिए हम आप क्या करते है ? सिनेमा घर में राष्ट्र गान के समय याद कर लिया, या फिर १५ अगस्त और २६ जनवरी को याद कर लिया या कारगिल दिवस और शहीद दिवस में याद कर लिया ! हमारे लिए वो सैनिक बस एक कैलेण्डर की तारीख में कैद है ! आजकल कुछ लोग फेसबुक और अन्य सोसिल साइट्स के जरिये उन्हें देख लेते है ! मगर ये जोस स्थायी समय के लिए होता है ! कुछ घंटो के लिए या फिर कुछ चुनदा तारीखों के लिए, उसके बाद जोश ठंडा पद जाता है और उस सैनिक को भूल जाते है !
खैर जाने दीजिये उस -४० डिग्री में खड़े सैनिक की बहादुरी की तुलना तो क्या, कोई उस पर प्रश्न भी नहीं उठा सकता ! जान की बाजी लगाता है वो सैनिक !

मै हमेशा उनको अलग देखता हूँ, सरहद पर वो सैनिक अकेला नहीं दिखता मुझे उसके साथ दूर गाँव के एक माँ होती है जिसे हमेशा गर्व के साथ डर होता है, एक बीवी होती है जो ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं होती फिर भी अपने बच्चो को पढने स्कूल भेजती है , एक पिता होता है जिसे गर्व होता है और पूरे गाँव में बताता है !
सरहद पर खड़ा वो सैनिक और उसका परिवार किसी एक गाँव के छोटे से लोग होते है मगर सबसे अलग ! इनकी कहानिया कही नहीं छपती, ये कभी टीवी पर नहीं दिखते ! इन लोगो को कभी देश प्रेम जगाने के लिए सिनेमा घर जाने की जरुरत नहीं पड़ती, ये तो देश के लिए रोज, हर पल मरने को तैयार रहते है ! हम वो लोग हैं जो कैलेंडर की तारीखों के हिसाब से उस फौजी को याद करते हैं हमारा राष्ट्रप्रेम किश्तों में बाहर निकलता है।
एक सैनिक का सरहद पर खड़ा होना जितना मुश्किल होता है  उतना ही मुश्किल उसके घर का जीवन गाँव में होता है ! हमें सरहद की तस्वीर में एक सैनिक तो नजर आ जाता है मगर एक पिता, एक माँ, एक बीवी और स्कूल जाते अकेले बच्चे कभी नजर नहीं आते जो हर पल संघर्ष कर रहे होते है ! हम हर साल कैलेंडरों की उन तारीखों पर फ़िर चाहे वो १५ अगस्त हो , २६ जनवरी हो या कारगिल का विजय दिवस, उन फौजियों को याद करते हैं , पर हम कहीं न कहीं उनके परिवारों को भूल जातें हैं।
एक जवान जब भी सेना में जाता है वो कभी अकेला नहीं जाता, उसका पूरा परिवार उसके साथ होता है !
एक जवान ठण्ड में अकेला नहीं सिकुड़ता उसका पूरा परिवार उसके साथ सिकुड़ता होता है !
एक जवान सरहद पर अकेला नहीं लड़ता उसका पूरा परिवार उसके साथ लड़ता होता है !
एक जवान सरहद पर गोली अकेला नहीं खाता उसका पूरा परिवार उसके साथ गोली खाता है !
एक जवान देश के लिए कभी अकेला नहीं मरता, उसका पूरा परिवार मरता है.... पूरा परिवार


"ख़ुशी" , "हंसी" या "मुस्कान"

मेरा घर तीसरे मंजिल में था, बगल में एक परिवार रहने आया था यही कुछ ५-६ महीने हुए थे ! इतवार का दिन था मै कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था तभी अचानक दरवाजा खुलने की आहट आयी, पहले लगा हवा का झोका होगा मगर पीछे देखा तो दो छोटी छोटी आँखे और एक छोटी सी नाक दिखाई दे रही थी ! वो आखे मुझे ही देखे जा रही थी मेरे इशारा करने पर, दरवाजा जरा सा  और खुला बिलकुल जरा सा....
फिर दोबारा बुलाने पर दरवाजा तेजी से खोल एक ७-८ साल की बच्ची सीधे मेरे पास आकर खड़ी हो गयी, शांत आँखों में मानो बल्ब लगे हो ऐसे चमक रही थी, साथ में मेज पर रखे कागजो पर ऐसे नज़रे गडा राखी थी मानो मेरे लिखने का जायजा लिया जा रहा हो ! काफी सोचने के बाद मैंने उससे पूंछा...

क्या नाम है बेटे आपका?
उसका मन उन कागजो से हटा तक नहीं...

फिर मैंने कहा, बेटे आपका नाम क्या है ?
मानो इस बार भी उसके ध्यान में कोई फर्क नहीं पड़ा, उसकी नजर अब भी किताबो में ही थी...

बेटे... बेटे नाम ? नाम क्या है आपका ?
अब इस बार वो अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाकर हसने लगी....

नाम? बेटे ? नाम क्या है आपका ?
उसका मुस्कुराना जारी था, अब मुझे अजीब सा लग रहा था ! वो कुछ बोल नहीं रही थी बस मुस्कुराये जा रही थी! कुछ भी नहीं बोल रही थी, मन ही मन डरने लगा मै... कही ये ? नहीं नहीं ऐसा नही हो सकता....
कई ख्याल आ रहे थे मन में ! तभी डरते हुए मैंने पेन उठाया हाथ में और एक कागज़ में लिखा...

“बेटे आपका नाम क्या है ?”
मैंने इतना लिखा ही था की उसने अपने हाथो से मेरी ठुड्डी पकड़कर सर ऊपर किया और ‘मुस्कुराने’ लगी...
हंसी ?

उसने अपने दोनों हाथ सर पर रखे जैसे मैंने कोई बड़ी बेवकूफ़ी कर कि हो और फिर से दोनों हाथों को होठों के पार ले जाकर वही इशारा किया 
" ख़ुशी " ? अरे हाँ। "मुस्कान"

मेरे मुस्कान कहते ही उसकी मुस्कान हंसी में बदल गयी, मैंने मुस्कान उस नोटबुक पर भी लिख दिया, ये सोच कर शायद कि उसने मेरे होंठ सही पढ़े हैं, वो अपना नाम उस नोटबुक पर लिखा देख और खुश हो गयी।
पन्नों , मेरे और उसके बीच इसी तरह कुछ देर तक बातें हुई , मैंने एक नयी नोटबुक निकाली और उस पर उसका नाम लिख दिया और पहले पन्ने पर लिखा " तुम्हारा नाम क्या है " वो बड़ी तेज़ थी, समझ गयी कि मैं उससे उसकी भाषा सीखना चाहता हूँ। उसने फटाफट इशारों से मुझे समझा दिया, मैंने उन्ही इशारों को फ़िर से दोहराया , और उसने अपने हाथ अपने होठों कि तरफ ले जाकर इशारा कर के जवाब भी दिया, फिर हम दोनों काफ़ी देर तक हँसे।
अब जब भी मेरी छुट्टी होती वो मेरे पास आ जाती और उसकी भाषा में हम खूब बाते करते ! मैं उसके लिए कुछ किताबें ले आया था, जब भी वो आती उन किताबों में जाने क्या ढूंढती , मेज़ पर रखे हुए पेनों से खेलती और मुझे अपनी भाषा में हमेशा कुछ नया सिखा जाती । ये सिलसिला करीब डेढ़ महीने तक चलता रहा , हम अच्छे दोस्त बन गए थे, वो छुट्टी के दिन आकर अपने दोस्तों के बारें में बताती , किताबों में तस्वीरें देखती कुछ देर बैठती और चली जाती। मैं हमेशा उस से एक चीज़ सीखता , उसको दोहरा कर उसको दिखाता , और वो सर हिला कर हंसती। एक अलग ही दुनिया हो गयी थी हम दोनों कि, मुझे ये एहसास हो चूका था कि वो क्यों इस तरह मेरे करीब आ गयी थी , सारी दुनिया उसे कुछ न कुछ सीखाने में लगी हुई थी , और एक मैं था जो उससे सीखता था अजीब सा लगता था कि चुप रह कर भी वो कितना कुछ बोल जाती थी !

एक दिन, शाम का वक्त था बारिश तेज हो रही थी मै जल्दी जल्दी दफ्तर से निकलकर घर जा रहा था, पूरा भीग चूका था, कपकपी छूट रही थी ! अपने घर के नीचे पहुचते ही जल्दी जल्दी ऊपर जाने लगा मगर तभी एक बड़े से ट्रक और कार पर नजर पड़ी ! ट्रक में किसी का सामान लदा हुआ था, कोई जा रहा था ! मै ये सब देखते हुए जल्दी जल्दी ऊपर गया, बगल वाले घर में ताला पड़ा था ! मैंने अपना दरवाजा खोला और कपडे बदलकर चाय गैस में रखी ! फिर तौलिया लेकर खिड़की में गया ! मेरा ध्यान फिर उस कार कि खिड़की पर गया, फिर वो चेहरा सामने आया , बारिश में भीगता हुआ, वो मेरी ही खिड़की कि तरफ देख रही थी , वो जब नहीं देख रही थी तब भी वो हाथ मेरी खिड़की कि तरफ ही इशारे कर रहे थे , उसने मुझे देख लिया था, वो वही इशारे बार बार दोहरा रही थी , मैंने अपना चेहरा थोडा और बाहर निकाल कर समझने कि कोशिश कि। एक तो बारिश कि उन टकराती बूँदो से मेरी आँखें ठीक से खुल नहीं रही थी , और वो जो इशारे कर रही थी वो मैं समझ नहीं पा रहा था। उसने वो मुझे सीखाया नहीं था, मैं भी क्या जवाब देता , एक हथेली बाहर निकाल कर हिलाता रहा, पर वह अब भी वही इशारा कर रही थी , जाने क्या कहना चाहती थी , जाने क्या बताना था उसको , बाल पूरे माथे से चिपक गए थे , मैं भी फिर से भीग गया था।
कुछ तो कहना चाह रही थी वो , जिसे मै आज तक नहीं समझ पाया ! फिर मै दरवाजे के पास पंहुचा तो वहां पर एक कागज पड़ा था ! जिसमे J लिखा हुआ था बस !
जिसे पूरी दुनिया कुछ सिखाने की कोशिश कर रही थी, वो न जाने कितना सिखा गयी मुझे ! फिर भी आखिरी में कही गयी बातो को मै आज तक नहीं समझ पाया ! उसका वो पन्ना न जाने कितने गमो की मुस्कान रखता है...