मेरे हिस्से की रोशनी भी तुम खा गए

मेरे हिस्से की रोशनी भी तुम खा गए
कल ही देखा था
हरियाली थी खेतो में
सबके घर जैसे घर थे
गांव थे, शहर थे
रात को दिए की
और
दिन में 'सूरज' की
रोशनी थी
मगर बराबर-बराबर
सर्दियों में धुप थी 
बराबर-बराबर
न जाने
आज कौन इतना खुदगर्ज हो गया
न जाने कौन खेतो में 'ईट' बो गया
ये घर न जाने कब माकन बन गए
न जाने किसका तजुर्बा था
जो एक ईमारत और
एक झोपड़ी की इबारत लिख गया
बस कल से आज हुआ था
एक झोपड़ी को इमारतों ने घेर लिया
और....
और
उस झोपड़ी के हिस्से की
धूप, रोशनी और सूरज भी खा लिया...

कोई टिप्पणी नहीं: