यदि हम ये नहीं कर सकते तो हमसे बड़ी समस्या कोई नहीं है !- अंकुर मिश्र"युगल"

अन्ना हजारे जी ने जिस कठिनतम समस्या को समाप्त करने के लिए अनिश्चित कालीन अनशन की सुरुआत कई है, वो केवल अनशन नहीं बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण और स्वतंत्रता की नवीनतम लड़ाई है, यहाँ लड़ाई का मतलब कभी भी हिंसा मत लीजियेगा, यह तो वो लड़ाई है जिससे अहिंसा की परिभाषा बनती है इसमे देश के प्रत्येक नागरिक का लगाव होना चाहिए, प्रत्येक नागरिक को अन्ना हजारे का साथ देना चाहिए! अन्ना हजारे जी खुद कहते है" जब किसी समस्या को समाप्त करने के सभी तरीके बंद हो जाते है तो अनशन का सहारा ही बचता है" यह वो अहिंसा-भरा हथियार है जिसके सामने अच्छे लोकतंत्रवादियों, राजनीतिज्ञों को झुकना पड़ता है! वो कहते है हमें-
"जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वह भारत देश है मेरा ! को दोबारा सत्य करना है आज हमे यह गीत बदला हुआ नजर आ रहा है हम आज कह भी सकते है "जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती दी बसेरा वह भारत देश था मेरा !
अब आप सोचिये जब एक ७५ वर्षीय बृद्ध व्यक्ति इस समस्या को समाप्त करने की पहल कर सकता है तो क्या हम नहीं हम तो अभी जवान है! आप अपने आतंरिक ह्रदय से पूछिए क्या आपको भ्रस्टाचार अच्छा लगता है??और हाँ आप यह जबाब मत दीजियेगा की "भ्रष्ट तो सभी है हम क्या कर सकते है!!" क्योकि इस उत्तर से मै पागल हो चूका हूँ! हाँ इस तरीके के उत्तर वाले लोगो से मै बस इतना कहना चाहूँगा की यदि वो इसी तरह सोचते रहे तो वो दिन दूर नहीं है जब हा दोबारा किसी के अधीन होंगे!
आप सोचिये अब समस्या है तो समाधान भी होगा, हमें समाधान के लिए अंगे आना होगा, अंगे नहीं आ सकते तो जो अंगे आ रहा है उसका समर्थन तो कर सकते है, और यदि समर्थन नहीं कर सकते तो लोगो को तो जगा सकते है , यदि लोगो को नहीं जगा सकते तो शांत तो रह सकते है,यदि शांत नहीं रहा सकते तो बुरा तो मत बोलिए !!!
हाँ यदि आप या हम ये सब नहीं कर सकते तो हमसे या आपसे बड़ी समस्या कोई नहीं है !!
यहाँ केवल लोकपाल बिल की बात नहीं है, यह केवल स्विस बैंको में जमा धन की बात नहीं है, यह कोड़ा, कलमाडी, राजा या रानी की बात नहीं है यह देश की बात है यह उस "सोने की चिड़िया" की बात है जिसे यहाँ के कुछ तानाशाहों या मंद्बुध्धियों ने आपने को स्वर्ण बनाने के लालच में खोखला कर दिया है!!
अब सोचिये मत अपना कदम बढाइये, अन्ना हजारे जैसी क्रांतिकारियों की आज देश को जरुरत है,यह तो "आज" की सुरुआत है यदि आपका ,हमारा और उनका साथ रहा तो अंगे अंगे देखिये होता है क्या ???

हम जानते है फिर भी चुप है!- अंकुर मिश्र "युगल"


प्रकृति से खिलवाड का भयावह दृश्य तो हम सभी ने देखा ही है !अब भी वक्त है प्रकृति की चेतावनी को समझ लेना चाहिए उसके साथ हो रहे अपमनानीय व्यव्हार को समाप्त करना चाहिए, हमें उसे अपनत्व के साथ जोडना चाहिए वरना वह दिन दूर नहीं जब हम उसकी आग में ध्वस्त हो जायेंगे और हमें पश्चाताप का समय भी नहीं मिलेगा!
आज हम जिसकी छत्रछाया में जीवन व्यतीत कर रहे है उसे ही अपने परिवार से अलग मान रहे है और अमाननीय व्यवहार किये जा रहे है !!!
जी हाँ यहाँ हम बात कर रहे है उस पृथ्वी की जिसमे हम रहते है, उस आकाश की जिससे हमें छत मिली हुई है , उस हवा की जिसमे हम साँस ले रहे है , उस पानी की जिसकी वजह से हमारा जीवन है, उस आग की जिसमे हम खाना पकाते है और हर उस तथ्य की जो हमें प्रकृति प्रदान करती है , और इन्ही के साथ हमारा व्यव्हार भी आज द्रिश्नीय हो गया है यहाँ कारन भी खुला हुआ है , हम खुद के लिए वायु चाहिए, और जानते भी है वायु ही जीवन है और पता भी है की ना ना प्रकार के कारखानों तथा वाहनों से उत्सर्जित "ग्रीनहाउस गैस" वायु में क्या असर कर रही है . करकारखानो ,वाहनों तथा फ़सिल तेलों के जलने से उत्पादित ग्रीनहाउस गैसों से आज विश्व एक सबसे कुख्यात तथा गभीर्शील विषय से जूझ रहा है जिसे वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग कहते है.इससे धरती की छतरी "ओजोन परत" में छेद हो रहे है जिससे हमे चर्म रोग इत्यादि हो रहे है.ग्लेशियरों का पिघलना, निचले समुंदरी इलाको का डूब जाना उपरांत का दुस्परिनाम है. लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर रहे !!!!!
जल की तरफ नजर डाले तो यह जरुर कहेंगे "जल ही जीवन है" और आज इसके साथ हो रहे वर्ताव को भी हम जानते है जो जल प्रदुषण के रूप में खुख्यात है केमिकल तथा अन्य हानिकारक पदार्थो का अत्यधिक मात्रा में नदी, तालाब इत्यादि में पाया जाना जल प्रदुसन कहलाता है.जलीय जीव-जन्तु के लिए जानलेवा साबित जल प्रदुसन वातावरण के कई श्रृंखलाओ में बाधा लता है जिससे कूद्रत के प्राणियों को मुश्किलों का सामना करना परता है.नदी के उपरी सतह पर एक परत जम जाने के वजह से जलीय जीव-जन्तु को आक्सीजन तथा रौशनी न मिलने से उनकी मृत्यू हो जाती है.जिनके अभिशाप में हम आज जी रहे है !इसी तरह पृथ्वी के साथ देखे तो ना ना प्रकार के कीटनाशक तथा अन्य खादों का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करके इसे बंजर बनाने पर तुले है .कुरा-कचरा तथा अन्य हानिकारक पदार्थों जमीन में गारने से वहां के जमीन के रोपण शक्ति में कमी होती जा रही है.हमारे खाद्य पदार्थ दूषित होते जा रहे है जिससे हम अनेक रोगों के शिकार होते है, फिर भी हम चुप है!इसी तरह हर प्राकृतिक तथ्य के साथ हमारा व्यव्हार हमें खतरे में डाल सकता है जिससे जापान जैसी तबाहियां आम हो जायेगी और एक दिन ये होगा की पूरा विश्व जापान होगा!!
यहाँ सबसे बड़ी बात यह है की हम जानते है फिर भी चुप है!!

इनपुट २५० करोण आउटपुट शून्य : अंकुर मिश्र "युगल"


कहते है कनून के हाथ बहुत लंबे होते है , उससे बचाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुनकिन है !परन्तु जब कानून ही घुतंर टेंक दे तक क्या करेगे! किसी को किससे इंसाफ की आशा रहेगी ! आज यही परिस्थिति हमारे देश की हो रही है, यहाँ राष्ट्रिय स्टार अनेक बड़े बड़े केशों के मुकदमे अदालत में चल रहे है,पर उनमे अब विलम्ब के साथ साथ कानून ने इंसाफ देना भी बंद कर दिया है !
बोफोर्स घोटाले से कौन अनजान होगा !सन् १९८७ में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाला या बोफोर्स काण्ड के नाम से जाना जाता है। और आज भी केंद्र में कांग्रेस की सर्कार है, और सञ्चालन भी वाही गाँधी परिवार कर रहा है !
केश की सुनवाई २५ साल से बराबर होती अ रही है ,सी.बी,आई. जाँच भी हुई है,और सबसे बड़ी बात यह है की इस केश में खर्च होने वाली रकम २५० करोंण है, यह रकम भी आम जनता की ही है !आखिर देश का विकाश कैसे हो महंगाई क्यों न हो !आम जनता भूंखी क्यों न मरे जब उसी के धन का उपायोंग ऐसी जगह किया जा रहा है!! और इतनी रकम का अन्तिम परिनक अत है "इस केश में बहुत अधिक समय हो गया है अतः इस केश को बंद किया जाता है" !क्या हमने इसी के लिए कानून का भरोषा किया है , क्या हमने इसी लिए सरकार को चुना है !
यदि इसी तरह के निर्णय हमारी कानून व्यवस्था देती रही तो आम जनता का क्या होगा!!बोफोर्स जैसे मामलों के परिणाम में कानून के साथ साथ सर्कार का भी पूरा हाथ होना आम जनता के विश्वास घाट को प्रदर्शित करता है!!

बड़े शर्म की बात है !! अंकुर मिश्र "युगल"


दुश्मन आज आदम खान हो गया है,
बच्चा बुढा लहू-लुहान हो गया है!
हम रेड-अलर्ट घोषित करते रहे ,
जन्नते कश्मीर वीरान हो गया है !!
रोयें दादी माँ की नानी !
ये बड़ी शर्म की बात है !!
मुगलाते में तांडव करवा डाला,
पूरा सरहदी क्षेत्र चार्वा डाला!
कड़ी सुरक्षा रेड-अलर्ट के चलते,
लाखो निर्दोषों को मरवा डाला!!
थर थर कांपे मर्दानी!
ये बड़ी शर्म की बात है!!
फिर दुश्मन का हौशला बाद आया ,
एक रोज लाल किले में घुस आया!
राष्ट्रिय गौरव में दाग लगाकर ,
संसद में मिलने का सन्देश भिजवाया!!
नींद में रहे राजधानी !
ये बड़े शर्म की बात है!!
वह से भी उसका मन नहीं भरा,
पानी अब सर के ऊपर चढा!
बम्बई में अतिक्रमण बर्शाया,
हमें खून के अंशु रुलाया !!
पापी से पूंछे उसका पाप !
ये बड़ी शर्म की बात है !!
गणतन्त्र दुबका सहमा रह गया ,
आतंक बाद अपना काम कर गया !
रह में थी कश्मीर विधानसभा,
जिसमे बम बारूद और धुँआ भर गया !!
कातिल से पूछे उसकी निशानी !
ये बड़ी शर्म की बात है!
बीत गए जाने कितने मधुमास,
भूल गए अभिमान भरा इतिहास!
बलिदानों की गाथा निरर्थक गयी,
जहाँ में हो रहा हमारा उपहास !!
डूबने को नहीं "अंकुरित" हो रही जमीन!
ये बड़ी शर्म की बात है !!

आखिर हम यहाँ ही क्यों है?,आखिर हम ही क्यों है?- अंकुर मिश्र "युगल"


क्या हम कभी सोचते है -
आखिर हम यहाँ क्यों है ?
आखिर हम यहाँ ही क्यों है?
आखिर हम क्यों है?
आखिर हम ही क्यों है?
मुझे नहीं लगता की हम इस तरीके के प्रश्नों को अपने दिमाग में कभी भटकने भी देते होंगे, हम तो बस अपने कार्य कलापों में व्यस्त रहते है!
लेकिन यह प्रश्न वो प्रश्न है जो एक बार दिमाग में आ गए तो अच्छे से अच्छे "निकम्मे"(काम चोर) मनुष्य को असाधारण बना देते है !
हमारे जीवन का लक्ष्य अपना लक्ष्य पाना तो होता है पर उस लक्ष्य को पाने के बाद हम संतोष रूपी जंजीर में जकड जाते है , जबकि वास्तविकता यह है हम यहाँ केवल हमारे लिए नहीं है, इस दुनिया में एक पत्थर भी खुद के लिए नहीं है और कहे तो खुदा भी खुदा के लिए नहीं है,उसी तरह हम भी है जो हमारे लिए नहीं है! हमें यही सोचना है की हमारा "हम" हमें न जकड पाए और हम सोचे "आखिर हम यह क्यों है?"आखिर हम ही यहाँ क्यों है?"," यदि हम प्रश्न पर विचार करे तो हमें समझ में आयेगा की हम यहाँ किसी विशेष कार्य की वजह से है, अब यह कार्य हमारे परिवार में हो सकता है, हमारे समाज में हो सकता है, हमारे देश में हो सकता है ! बस यहाँ आवश्यकता है हम उनकी आवश्यकता को समझे और "आखिर हम यहाँ क्यों है?"और "आखिर हम ही यहाँ क्यों है" जैसे प्रश्नों का उत्तर खोजे !!!
इसी तरह हम सोचे तो एक साधारण सा दिखने वाला अशधारण प्रश्न हमारे दिमाग में आता है की "आखिर हम क्यों है?" और "आखिर हम ही क्यों है?" !
यह प्रश्न तो साधारण है पर इसके उत्तर पर व्याखान कोई नहीं दे सकता या देने में कठिनता होगी ! जबकि उत्तर हमें कही से खोजना नहीं है उत्तर तो हमारे अंदर से ही मिलता है की किसी विशेष काम को करने के लिए विशेष व्यक्ति की जरुरत होती है और "विशेष" व्यक्ति एक ही होता है! बस अब सोचना क्या है हमारी रचना उस विशेष कम को करने के लिए हुई है बस हमें वो विशेष कार्य खोजना है और उसको हल करना है ! यही हमारे दूसरे प्रश्न का उत्तर है -"आखिर हम क्यों है?", और "आखिर हम ही क्यों है?"!!
उत्तर तो मिल गए पर इनको वास्तविक जीवन में अमल करना बहुत ही कठिन कार्य है पर असंभव नहीं है !अब हम इस ब्रह्माण्ड की सबसे अनोखी रचना है तो हम कठिन कार्य को सरल बना ही सकते है , ऐसा मेरा सोचना है ! मै सोचता हूँ मनुष्य कोई भी कार्य कर सकता है बस उसे निचे दिए ६ बिन्दुओ पर अमल करना होगा, इनका अमल करने पर असंभव कार्य में भी संभवता का "अंकुरण" होने लगता है-
-धैर्य
-कठिन परिश्रम
-आत्ममंथन
-आत्मनियंत्रण
-समय का सदुपयोग
-विश्वास (स्वयं पर)
"सत्य , साहित्य और समाज "
अंकुर मिश्र "युगल"

हर क्षण हर पल कितना अहम हुआ विज्ञान ! अंकुर मिश्र ''युगल''

हर क्षण हर पल कितना अहम हुआ विज्ञान !
चाँद सितारों को छू लेना अब बिलकुल आसान !
नै क्रांति पैदा कर दी है धरती पर विज्ञान ने !
नए-नए सोपान सृजन के रच डाले इन्सान ने !
हुआ असंभव भी अब संभव है इसका हर प्रयोग है !
सपनो को साकार करेगी इसकी ''अंकुरित'' उडान !
..............हर क्षण हर पल कितना अहम हुआ विज्ञान.....
श्रम और समय बचा देता है प्रगति पथ का नायक है !
शांति सुरक्षा और सम्रिथ्थी में भी बहुत सहायक है !
अब तो यह वरदान हो गया उन्नति की पहचान है !
वैज्ञानिक पध्दती अपना कर खुश है आज हर किसान !
.............हर क्षण हर पल कितना अहम हुआ विज्ञान........
विकसित हो विज्ञान मगर मानव हित सर्वोपरि हो !
क्या प्राणी क्या जीवजन्तु जड़ चेतन को हितकर हो !
कठिनाई का समाधान हो ऐसा बस ऐसा विज्ञान हो !
इसके हर संभव से बन जाये अपना देश ''महान''!
.............हर क्षण हर पल कितना अहम हुआ विज्ञान.

PLEASE Sir, एक कदम हमारे साथ भी --- अंकुर मिश्र "युगल"


आज शिक्षा की स्थिति पर विचार करने की इच्छा हो रही है,
हमारे राजनीतिज्ञों का कहना है की हमारा देश शिक्षा के क्षेत्र में लगातार उन्नति कर रहा है, और हाँ यह सत्य भी है की हम शिक्षा में लगातार उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है !
परन्तु एक कठोर वास्तविकता ये भी है की ये उन्नति केवल उन्नतिशील क्षेत्रो को ही मिल रही है, यहाँ उन्नतिशील का सीधा मतलब शहरीय क्षेत्रो से है,
जी हाँ हम जानते है की यहाँ(शहरिय क्षेत्रो में)) देश के सर्वश्रेष्ठ तकनीकी संस्थान, प्रद्य्गिकीय संस्थान, प्रबंधन संस्थान एवं सभी बड़े संस्थान है परन्तु इन सबको विकास के बड़े बड़े पैकेज देते समय हम ये भूल जाते है की इन संसथानो में पढने वाले विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रो से ही होते है !यहाँ बात इन बड़े बड़े पैकेजो की नहीं है यहाँ तो शिक्षा के बदलेव की बात है, हमें तो खुशी होती है की देश को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने में हमारी सरकार इतने महत्वपूर्ण कदम उठा रही है परन्तु ये सब शहरिय इलाको में ही क्यों,हमारे गाँवो को भी देखिये "सरकार",
यदि हम ग्रामीण क्षेत्रो में इस पर नजर डालते है तो कुछ सूना-सुना सा नजर आता है, मै समझता हूँ इसका श्रेय केवल सरकार को नहीं जाता है वरन सरकार और जनता दोनों ही इस दशा और दिशा के दोषी है,
दृष्नीय तो यह है की सरकार ने गाँवो में विद्यालयों को तो बड़ी मात्रा में खड़ा कर रखा है परन्तु इनका सञ्चालन करने या अध्यापको से करवाने में वो खरी नहीं उतर पा रही है, वहाँ उन्होंने इतनी सुविधएं दे रखी है की आज हर ग्रेजूएट सोचता है की "यार मास्टर बन जाओ मस्त जिंदगी गुजर जायेगी" उन्हें उन भविष्यो की चिंता नहीं है जो आंगे देश के कर्णधार होंगे ! इसे क्या कहा जाये ग्रामीण प्रतिभाओ को दबाने की सोची समझी योजना या फिर .................. !! जैसा भी हो स्थिति सोचनीय है !देश की शिक्षा पध्धातियो में कुछ बदलाव की आवश्यकता हमेशा नजर आती है, इन समस्यायों में सबसे पहली समस्या "तकनीकी" शिक्षा की रहती है हम देखते है की ग्रामीण विद्यार्थी हमेशा इस कठिनाई से गुजरता है जब भी वो अपनी आरंभिक पढाई के बाद किसी तकनीकी शिक्षा के बारे में सोचता है तो उसे हमेशा अपनी नीव कमजोर नजर आती है वाही आप शहरिय क्षेत्रो में देखिये एक "एल.के.जी." का बच्चा तकनीक से जुड़ जाता है ! परन्तु ग्रामीण क्षेत्रो में देखे तो "तकनीकी "उदाहरण "कम्पूटर" का कोई दशवी कक्षा का विद्यार्थी "क" भी नहीं जनता !! इसी वजह से आज के भारत में ग्रामीण क्षेत्रो से प्रतिभाओ का पलायन होता जा रहा है !!
इन सब की वजह केवल सर्कार भी नहीं है जनता को भी जागरूक होंना पड़ेगा, सर्कार से गुजारिश करनी होगी ! की उसे कैसी शिक्षा की जरुरत है , और सरकार को शुरुआती शिक्षा में कुछ बदलाव करने होंगे सामान्य स्तर से ही ग्रामीण बच्चो को "तकनीकी" शिक्षा से जोडना होगा ! कक्षा एक से लेकर बारहवी तक "कम्पूटर" जैसे विषयों को जोड़ कर एक सराहनीय कदम उठाना होगा ! और जनता को महत्त्व समझते हुए इस तरीके की शिक्षाओ को अनिवार्य करना होगा !!आज के बदलते युग में प्रतिभाओ को और प्रतिभावान बनाकर उन्हें देश के काम आने का मौका देना होगा !! आशा है की इस ग्रामीण स्थिति पर सरकार की नजर जरुर पड़ेगी और वो जल्द से जल्द कुछ सराहनीय कदम उठाएगी.!!!

हमारे अधिकतम राजनेताओ के शब्दकोष में "ईमानदारी" शब्द होता ही नहीं है- अंकुर मिश्र "युगल"


माननीय मंत्री जी कह रहे है "हमारे पास अलादीन का चिराग नहीं है "!अरे आप ये क्या बोल रहे है आपके मंत्रालय से ही कुछ दिन पहले खबर आई थी की "हम बहुत जल्दी ही महंगाई पर काबू पा लेगे" !तब कोई खजान हाथ लगा था क्या ?यही तो समझ में नहीं आता कम से कम चुनाव के बाद के वादों को तो पूरा करिये!जी हाँ मै बात कर रहा हू अपने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की जिन्होंने कुछ दिन पहले देश की सबसे बड़ी समस्या "महंगाई" को काबू करने की बात कही थी ,अब ये बोल रहे है "हमारे पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है" अरे आप के पास "देश की वो सम्पूर्ण शक्तियां तो है,जिन्हें जनता ने आपको प्रदान की है"आप स्विस बैंको में जमा पैसा भारत ला सकते है, अप भ्रष्टाचार को खत्म करने में अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकते है,और ऐसे ही अनेक कम आपके आदेशो का इंतजार कर रही है ! माननीय मंत्री जी देश की सोचिये यह कोई व्यक्ति विशेष का जीवन नहीं है, आपको इसी जनता ने वहाँ पहुचाया है,यह देश भी उन्ही सब का है!यहाँ वाद-विवाद या हिम्मत हारने से काम नहीं चलने वाला मंत्री जी,आपको जनता ने इसलिए नहीं भेजा की आप उस कुर्सी पर बैठकर ऐसे जबाब दे !देश की जनता का विकास ही आपका कर्तव्य है! मै सोचता हू यदि प्रत्येक मंत्री अपने कर्तव्यों का निर्वाहन इमानदारी से करे तो "भारत" को विकसित होने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती ! लेकिन लगता है हमारे अधिकतम राजनेताओ के शब्दकोष में "ईमानदारी" शब्द होता ही नहीं है !अरे अलादीक का चिराग तो अलादीन के पास भी नहीं था उसे भी खोजना पड़ा था! मंत्री अब ऐसे शब्द मत कहियेगा,वर्ना जनता अब कुछ ज्यादा ही समझदार हो गई है,अब वो इतने समय से आपको देख रही है आपसे जबाब मांग सकती है और हाँ जबाब भी "पाई-पाई का

"दादा " नहीं तो क्रिकेट नहीं --अंकुर मिश्र "युगल"

"दादा " नहीं तो क्रिकेट नहीं --अंकुर मिश्र "युगल"

भारतीय क्रिकेट की शान सौरभ गांगुली को इंडियन प्रीमियर लीग की किसी टीम में जगह न मिलना किस बात को प्रदर्शित करता है, बांकी टीमों को छोडिये उन्हें उनकी घरेलु टीम कोलकत्ता नॉटराइडर में जगह न देना क्रिकेट को गिराने की एक मुहीम को दिखता है ! भारतीय क्रिकेट टीम को विश्व के मानचित्र में पहचान दिलाने वाले सौरभ गांगुली के बिना कोई क्रिकेट मैच संभव नहीं है ! आखिर क्या कारण है जिनके वजह से उन्हें केकेआर या किसी एनी टीम में जगह नहीं दी गई ,क्या किसी ने ग्रेग चैपल सर से किसी ने सलाह ली है या फिर उनके परफार्मेंस को देखते हुए ऐसा हुआ !पर जो भी हो सौरभ गांगुली भारतीय क्रिकेट के लिए ही नहीं बल्कि विश्व क्क्रिकेट के लिए माननीय है ,उनका न खेलना विश्व क्रिकेट में भूकंप ला सकता है ,क्रिकेट प्रेमी तो कहते है "दादा नहीं तो क्रिकेट नहीं " माननीयों यदि क्रिकेट में आतंरिक या बाह्य किसी भी रूप में लगाव रखना है लो इस प्रतिमूर्ति को नजरंदाज मत करो! २००३ का विश्काप भूल गए क्या ,उनकी १८३ की पारी भूल गए क्या ,उनके १००००० से ज्यादा रन भूल गए क्या या उनकी टीम भावना को भूल गए यदि भूल गए है तो यद् करिये !"दादा" के बिना क्रिकेट संभव ही नहीं है !!

क्या विश्वकप में व्यक्तिविशेष की टीम खेलेगी ?? अंकुर मिश्रा "युगल"



आज जो विश्वकप के लिए क्रिकेट टीम का चयन हुआ है, उसमे कही न कही कुछ कमी महसूस हो रही ही !!
महीनो से क्रिकेट प्रेमी जिस खिलाडी की प्रतीक्षा कर रहे थे उस खिलाडी को टीम में जगह न मिलना अत्यन सोचनीय ही !जी हा मै बात कर रहा हू सबके चहेते "इरफान पठान" की जिन्होंने भारतीय टीम को अनेक मैचो में जीत क सवद चखाया ही और पने प्रदर्शन से क्रिकेट प्रेमियों का मन मोह लिया ही ,इन सबके बावजूद उन्हें टीम में जगह न दें किस बात को प्रदर्शित करता है !यदि हम उनके प्रदर्शन के बात करते ही तो ,हमें उन खिलाडियों को देखना चाहिए जिन्हें इए टीम में जगह दी गई है और उनका प्रदर्शन इरफ़ान पठान के सामने नगण्य है!!!उनका प्रदर्शन तो हमेसा सराहनीय रहा है ! कुछ मैचो में अच्छा प्रदर्शन न करना इस चयन के लिए उत्तरदायी नहीं हो सकता जिसमे पठान को जगह नही दी गई !!
इन सब बातो को सोचते है तो साफ नजर आता है की वजह कुछ और ही हो सकती है, हो सकता है वो धोनी को पसंद न हो,हो सकता है कोई चयन सिमित का सदस्य उन्हें पसंद न करता हो ,हो सकता है "धन" का मामला हो जिसकी वजह से उन्हें टीम में जगह न दी गई हो !!पर इन सब कारणों को देशवाशी और क्रिकेट प्रेमी स्वीकर नहीं करेगे ,हम भारतीय क्रिकेट को देखना चाहते है किसी व्यक्ति विशेष की टीम को नहीं !! बी.सी.सी.आई. को देशवाशियो को बताना होग की इरफान पठन जैसे खिलाडी को टीम में जगह क्यों नहीं दी गई !!