नेता जी आप इतने समझदार होते तो देश का विकास ही कर रहे होते : अंकुर मिश्रा "युगल "

    उत्तराखंड जिस परिस्थिति से गुजर रहा है  के सभी नागरिको, संस्थाओ को राजनैतिक दलो को मिलकर सहायता करने करने  जरुरत है ! जहाँ हजारो जाने जा चुकी है, और अभी भी हजारो जाने फसी हुयी है , मुझे नहीं लगता ऐसे समय में भी किसी को लड़ने  की जरुरत है ! मेरा सलाम   है उन भिखारियों को जिन्होंने अपने भीख के मांगे गए पैसो से  सहायता में सहायता की , उन रिक्शा चलाने  वाले चालको को जिन्होंने अपने पेट काटकर उत्तराखंड के लोगो को सहायता पहुचाई !  सेना के उन जवानो को जो अपनी जान पे खेलकर लोगो की सहायता करने पहुच गए , और उसमे कुछ सहीद भी हुए ! उन सभी सहायता प्रदात्ताओ को सलाम है जिन्होंने किसी भी तरह से देश की  कठिन परिस्थित में सहायता की !
      लेकिन यहाँ  दिल  दहलाने वाली बात  ये है की जिनसे ऐसे समय पर  ज्यादा सहायता की उम्मीद होती है वही सरकार निकम्मापन  दिखाती है, खुद के राजमहलो में हजार रुपये की पर प्लेट पर भोग चलाते है और बाहर आकर  से गुजारिश करते है की उत्तराखंड की सहायता करे, जनता तो सहायता कर ही देगी ! लेकिन क्या इतनी  समझ नहीं है की  यदि एक दिन ये राजभोग नहीं खायेगे तो देश के  कुछ जरुर कर सकते  है ! 
            वही  दूसरी कहानी दो नेता   उत्ताराखंड जाकर इसलिए लड़ते है की वो जनता की सहायता करेगे ! अरे मालिको आप दोनों मिलकर भी सहायता कर सकते हो ! 
        विपत्ति है !  खैरियत  रहे कभी आप पे न आये, नहीं तो कोई सहायता के लिए भी नहीं आएगा ! 
एक  प्रदेश  मुख्यमंत्री वहा सहायता के लिए जाते   है तो उसके लिये खबरे उडती की  अपने लोगो को बचा लिया बस, अरे इतना तो एक साधारण आदमी भी सोच सकता है की जो काम सेना दस-पंद्रह दिनों में नहीं कर पायी वो काम कोई एक दिन में कैसे   कर सकता है लेकिन ये तो नेताओ की खाशियत है की किसी दूसरे नेता की अच्छाइयों को देख ही नहीं सकते है ! और ये मामला वही  नहीं रुक  , बिहार के महाबुद्धिमान  मंत्री जी भी बोल पड़े 'हम दिखावा नहीं करते' अरे  दिखावा तो यही  बोलकर कर दिया मान्यवर ! खैर आपमें इतनी समझ होती तो आप देश के विकास में ही  सहायता नहीं करते ! एक ऐसे दल और व्यक्ति से अलगाव नहीं करते जिससे देश को कुछ सम्भावनाये  है !
 वैसे इन राजनैतिक बातो का कुछ मतलब  नहीं था यहाँ लेकिन वास्तविकता से  भी नहीं भागा  जा सकता और कभी भी याद आ जाती है ये तो !

यहाँ मेरी यही गुजारिश है  नेता जी आप कृपया शांति  बनाये रखे, आपका  चुनाव समय अभी दूर है आप उसी में बोलियेगा !  अभी जनता को जो करना है वो कर रही है !

धर्मनिरपेक्षता को नया मुद्दा मत बनाइये, जनता सब जानती है उसे विकास चाहिए !

  एक  हिदू बाहुल्य  देश  का  नेता कहता है है की वो धर्मनिरपेक्ष है, इसमें मिडिया उनके पीछे पड़  जाती है और उस मुद्दे को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना देती है ! वही दूसरी ओर  वह नेता   उनके साथ काम कर चूका है जिन्हें अब वह खुद धर्मनिरपेक्ष नहीं मानता ! केवल एक व्यक्ति ने उनकी सोच बदल दी, कारण क्या हो सकता है : व्यक्तिगत विवाद या प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी ! आज ही मैंने धर्मनिरपेक्षवाद की  परिभाषा पढ़ी जिसमे खा गया है : 
सभी धर्म के लोग कानून, संविधान एवं सरकारी नीति के आगे समान है।
तो क्या भाजपा के शाशनकल में ऐसा नहीं था, क्या गुजरात में ऐसा नहीं है ! क्या गुजरात में दो संविधान चलते है हिन्दुओ के लिए अलग और मुसलमानों के लिए अलग ?
प्रिय नेता जी आप बिहार से आगे बढिए , बिहार ने आपको अपनी जिम्मेदारी दी थी क्योंकि उन्होंने सोचा था आप जिम्मेदार और समझदार है , लालू जी की तानाशाई का विकल्प है , लेकिन आप ऐसे है तो आपने बिहार की जनता के साथ विश्वासघात किया है ! देश के आधुनिक विकारो को मिटाने की कोशिश करिए उन्हें बढ़ने की नहीं देश वैसे ही गर्त में   जा रहा है , देश को विकल्प की जरुरत है !
एक व्यक्ति जिसे देश की जनता चाहती है की वह देश की बागडोर संभाले, उस बागडोर के लालची मत बनिए !
            एक दल है जिसके अन्दर से रोज सुबह कुछ कीड़े पकडे जाते है, जिन्होंने भ्रष्टाचार को अपनाया है ! एक दल है जो देश के लिए नया है प्रतिभा होने के बव्जीद अनुभव की कमी है ! ऐसी परिस्थिति में आप और भाजपा ही एक विकल्प है ! सोचना आपको है बिहार ही आपका घर है या देश को घर बनाना है ! आपको विकास से भी कुछ मतलब है या फिर बस आपको कुर्सी चाहिए !
धर्मनिरपेक्षता को नया मुद्दा मत बनाइये, जनता सब जानती है उसे विकास चाहिए ! 

एक सरबजीत के लिए इतने आंसू क्यों : अंकुर मिश्र "युगल"


देश का एक नागरिक शराब के नशे में देश की सीमा में घूमता है तो कोई दूसरा देश उसे अखिर क्या समझेगा ! कोई पाकिस्तानी , चीनी या नेपाली भारत के अन्दर घुसकर इस तरह से घुमते हुए पकड़ा गया तो क्या उसे भारत सरकार या कानून गिरफ्तार नहीं करेगा ? ऐसी ही दशा में जब भारत का कोई व्यक्ति पडोसी देश में जाता है तो उसका पकड़ा जाना स्वाभाविक है !
लेकिन पकडे जाने के वहां दी गयी यातनाये निंदनीय है उन्हें  इसकी जाँच करके उसे बरी करना चाहिए था !
इस बात के लिए पाकिस्तान हमेशा दोषी रहेगा और उसे इसे स्वीकार भी  चाहिए लेकिन अब देश में इतने आक्रोश का माहौल क्यों ? आखिर क्या जनता अब भी नहीं समझी की सर्कार उसकी नीतियाँ समझ चुकी है, मौन और बौन प्रधानमंत्री को पता चल चूका है "ये जनता है चल दिन हल्ला करेगी और उसके बाद शांत हो जाएगी" ! ऐसे में क्या लगता है की भारत सरकार  में इतनी हिम्मत है की पाकिस्तान से इस बात का जबाब मान सके ? या जबाब ले सके ?  जब इस देश में साडी अच्छी या बुरी बाते एक सामान हो चुकी है तो जनता को भी अपनी जिम्मेदारियां दिमाग से समझनी चाहिए !
देश में देश की रक्षा के लिए अन्दर बाहर और सीमा पर हजारो लोग मारे जाते है ! उन्हें और उनके परिवार को पता होता है की जहाँ वो है उनकी जान कभी भी जा सकती है लेकिन फिर भी उनमे जज्बा होता है जो एक साधारण मनुष्य से अलग बनाता है ! लेकिन उस व्यक्ति को मरने के बाद जो सुविधाए मिलती है उससे अच्चा तो यही है की उसे भी सरबजीत सिंह जैसी हरकते करनी चाहिए ! और सीमा पार में जाकर प्रतिदिन सुबह शाम घूमना चाहिए ! आखिर सरकारे उस व्यक्ति के मरने के बाद इतने मुआवजे देकर दर्शाना  क्या चाहती है ? या फिर यहाँ भी वोटबैंक की राजनीती ! इस मुआवजे की जरुरत उसे है जिसके पास खाने के पैसे नहीं है जिसके राते सड़क के किनारे गुजरती है ! इस नौकरी की जरुरत उसे है जिनके यहाँ दिन के चूल्हे जलने दूभर है ! इसकी जरुरत इस परिवार को बिल्कुल नहीं है ! मई मानता हूँ सरबजीत के साथ गलत हुआ इसका जिम्मेदार वह व्यक्ति खुद भी है !




मुझे तो खेद है कही कुछ दिनों बाद भारत सरकार  सरबजीत सिंह को भारत रत्न, पद्मभूषण या परमवीर चक्र देने की बात न करने लगे ! आखिर जनता , सरकार और पडोसी कब समझेगे ये तो नहीं पता लेकिन ये सरे इसके हल नहीं होते !

क्या सच में ऐसा देश है हमारा :अंकुर मिश्र 'युगल'


आखिर और कब तक सपनों की दुनिया में रहेंगा ?
अनेकता में एकता , शांति का प्रतीक, सर्वधर्म समभाव आदि जैसी खोखली कहावतो को और कब तक मानते रहेंगे ? देश के अन्दर कोई दूसरा देश घुसता चला आ रहा है और हम अब भी शांति के दूत है ?
देश में रोज बलात्कार पे बलकार होते चले जा रहे है और हम शांति के दूत है ? देश के अन्दर एक व्यक्ति यह बोल देता है की बलात्कार महिलाओ की साज  सज्जा के कारण हो रहे है उस बात को लेकर देश के अन्दर एक उबाल आ जाता है लेकिन देश की सीमओं के अन्दर  घुसकर कोई  मातृभूमि को हड़पता चला जा रहा है उसके लिए कोई नहीं बोलेगा ! जनता भी  शांत है, मिडिया भी शांत है और सरकार भी शांत है !
एक सरबजीत के लिए सारे अखबार और न्यूज चैनल भरे पड़े है लेकिन उन हजारो सरब्जीतो का क्या जिन्होंने अपनी जान गवांकर देश को सुरक्षित रखा है !
कहा  है वो नरेन्द्र मोदी जो पाकिस्तान पाकिस्तान के पीछे पड़े रहते है , क्या भारत को पाकिस्तान से ही खतरा है ! अब चीन भी आ रहा है अब आप कुछ नहीं कहेंगे ?
कहा है वो अरविन्द केजरीवाल जो आम आदमी की साख में देश को बचाने चले थे वाही आम आदमी आज खतरे में है, जल्दी ही चीन धीमे धीमे करपे दिल्ली भी आएगा क्या आप तब भी धरना कर रहे होगे !
और वो दीदी कहा है जो पश्चिम बंगाल की लड़ाई में लिए दो दिल्ली तक आ जाती है लेकिन अब तो देश खतरे में है आप भी कुछ नहीं कहेंगी ?





खैर इन सब से पूंछने का ज्यादा हक़ तो है भी नहीं !  ये सब तो फिर आरोप प्रत्यारोप शुरू कर देंगे !
प्रश्न तो सरकार से बनता है, आखिर सप्ता होते हुए भी सभी पुतले क्यों बने हुए है, क्या प्रधानमंत्री अब भी किसी जुगाड़ की फ़िराक में है या या फिर इंतज़ार कर रहे है की 2014 के चुनाव में इसे भी मुद्दा बना लेंगे !
ohhhhhhhhh फिर से गुस्ताखी प्रधानमंत्री कौन होते है उत्तर देने वाले उत्तर तो इटली की महारानी से पूंछना होगा ! इस समय पर इनके बारे में कुछ अच्छाइयां  भी सुनने में आ रही है "त्याग" की कहानिया !
अभी मै कुछ दिन पहले एक महाशय से मिला सरकार के कार्यकाल की बात चल रही थी , महाशय बोले "है किसी में इतनी हिम्मत जो भारतीय इतिहास का हिस्सा न बनना चाहता हो, प्रधानमंत्री पद का त्याग कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता "! खैर मुझे बात में दम तो लगी 'त्याग' की बात तो मननी पड़ेगी लेकिन त्याग  पद का नहीं इटली का  जो इटली छोड़कर भारत में रह रहे है सच में मेरी हिम्मत तो नहीं है की मै अपने देश को छोड़ सकू !!
तो अब आप कुछ नहीं कहेगी चीन मामले में , कही ऐसा तो नहीं है इटली का मध्यस्थ बनकर भारत को भेजने का इरादा हो आपका चीन के हाथो ! ........................
समस्याये समस्याए बनी हुयी है सरकार और राजनैतिक दलो का काम है बस आरोप प्रत्यारोप ! अखिर क्या होगा  आम आदमी का आम आदमी को भी नहीं पता !
बस देखते रहो और जागते रहो !

क्या सच में 'नमो ! नमो ! नमो ! ' हो सकता है ? :अंकुर मिश्र 'युगल'

     नमो ! नमो ! नमो ! की गूंज ने जिस तरह से पूरे देश में तहलका मचा रखा है क्या वो सच में देश का उद्धार करने में सक्षम है ! नरेंद्र मोदी देश के लिए आज एक ऐसा नाम है जिसे प्रधानमंत्री बनाने के लिए लगभग सभी की मुहर लग चुकी है ! यहाँ सभी से मतलब उस अधिकतम प्रतिशतता से है जो इन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें देखना चाहते है , प्रसंशको में देखे तो इनके विपक्ष के राजनेता भी इस सख्शियत में देश का अगला प्रधानमंत्री देख रहे है ! इन सबके पीछे है केवल एक कारण गुजरात का विकास ,
गुजरात में इन्होने 'रूरल' और 'अरबन' दोनों  क्षेत्रो को ध्यान में रखकर 'ररबन' विकास की जो नीव राखी उसकी सराहना केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में हुयी ! विश्व की बड़ी सभाओ में अपने विकास के कदम बताने के लिए बुलाये जा चुके नरेन्द्र मोदी क्या सच में देश के अगले प्रधानमंत्री हो सकते है ये भाजपा से लेकर सभी पार्टियों केसामने बड़ा प्रश्न है ! देखा जाये तो खुद नरेन्द्र मोदी ने अपनी इस मुहीम के लिए प्रचार प्रसार शुरू कर दिया है ! बाबा रामदेव से मिलना , भाजपा के बड़े नेताओ को बार बार गुजरात बुलाना , कई बार दिल्ली आना , बड़ी सभाओ के राजनैतिक भाषण तो यही दिखाते है की वो खुद को वो भाजपा से अगली पंचवर्षीय के प्रधानमंत्री पद के दावेदार मान चुके है !
     लेकिन अभी भी प्रश्न अनेक है , क्या केवल उनके या आम जनता के सोचने से वो प्रधानमत्री बन जायेगे ??
उनकी राजनैतिक प्रष्टभूमि जो रही है क्या उनके प्रधानमंत्री बनाने के लिए सही   है  ? क्या देश को ऐसा प्रधानमत्री चाहिए जो देश के लिए कभी भी सांप्रदायिक हो सकते है ?
     इन सभी प्रश्नों के आलावा उनके सामने अनेक ऐसे प्रश्न भी है जिन्हें उनकी खुद की पार्टी ने खड़ा किया है , कई बार लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा भाजपा अभी भी उनके स्वप्नों की पार्टी नहीं है , पार्टी के अन्दर ही कई राजनेता उनके प्रधानमंत्री बनाने का खिलाफ है, और खुद नरेन्द्र मोदी क्या अपने राजनैतिक गुरु लाल कृष्ण आडवानी के होते हुये प्रधानमंत्री बनना चाहेगे !





अभी कुछ समय पहले नरेन्द्र मोदी ने इण्डिया टुडे के एक सम्मलेन में कहा- जनता उन्हें बुला रही है , जनता उनसे कह रही है भारत को भी गुजरात बनाना है !
आखिर ये शब्द उन्होंने सुने कहा से , क्या राजनीती में कल्पनाओं में ही सच्चाई है ? यदि देश की जनता उन्हें बुला रही है तो वो पिछले लोकसभा चुनावो में क्यों नहीं आये !  खैर मामला कुछ भी लेकिन मामला संदिग्ध है ! जिस तरह से उन्होंने जल्दी जल्दी में ही बाबा रामदेव , आर.एस. एस. प्रमुख , भाजपा प्रमुख से नजदीकियां बढ़ने की कोशिश की है इससे तो यही लगता है उन्हें प्रधानमंत्री बनने की बहुत जल्दी है और वो इसके लिए खुद को उम्मीदवार भी घोषित कर चुके है !

अरे ये तो चिदंबरम बजट था : अंकुर मिश्र 'युगल'

ये बजट देश के लिए था, चिदम्बरम के लिए या कांग्रेस के लिए ये किसी को नहीं पता ? मेरा तो यह कहना है की बजट किसी के लिए भी हो लेकिन आम आदमी के लिए नहीं था ! जिस सरकार द्वारा वादे किये गए थे की विकास दर दहाई के अंको तक पहुचाया जायेगा उसको जनता के सामने लाने पर दहाई के अंको में सरकार खुद फसती नजर आई ! कही ये विकास दर ५-६ के अंक से घटाकर २-३ पर न पहुच जाये ! कहा जाता है इस बार के बजट में सबसे ज्यादा ध्यान छात्रो का रखा गया है लेकिन इस घटती विकास दर में सबसे जयादा भी उन्ही युवा छात्रो के रोजगार को है ! मुद्रास्फीति की बात करे तो देखते है की जिसे दस से नीचे होना चाहए अभी भी वो दस के ऊपर ही है ! मुद्रास्फीति : सरकार के द्वारा खर्च किये गए खर्चो पर निर्भर करता है ! ये दहाई की मुद्रास्फीति अभी भी यही दिखाती है की सर्कार के खर्चो में कोई कटौती नहीं हुयी है ! कटौती हुयी है तो जनसँख्या के उस महकमे में जिसमे ९० % लोग रहते है ! पिछली सरकार से ही देख रहे है किसी चीज में कटौती नहीं देखि गयी है रोजाना प्रयोग के सामान के मुल्य में बध्होत्तरी, सब्जी के मुल्य में बराबर बढ़ोत्तरी , पेट्रोल डीजल , गैस के मूल्यों में बराबर बढ़ोत्तरी , बस बढ़ोत्तरी -बढ़ोत्तरी और बढ़ोत्तरी !! और इस बढ़ोत्तरी से सबसे ज्यादा परेशां होने वाले लोगो में है वो आम आदमी जिनके पास हनकी जीविका के लिए भी पैसे नहीं होते ! उनका क्या होगा ?? निजत न तो सरकार के पास है और न ही विपक्ष के पास ! सरकार के पास इस विकास दर की कमी के कारण तो नहीं लेकिन बताने के लिए ये जरुर है की 'चीन और इंडोनेसिया की विकास दर तेजी से बढ़ रही है' ! क्या उनकी विकास दर सुनाने से हमर पेट भर जायेगा या फिर हमारी विकास दर बढ़ जाएगी ! जिस देश में गुजरात जैसे राज्य अपने आप में विकास की परिभाषा है क्या वह चीन और इंडोनेशिया को देखने की जरुरत है ! क्या देश के अन्दर ही रहकर ऐसे मुद्दों में विचार करने की जरुरत नहीं है ? कुछ भी ऐसे बजट से कांग्रेस के इंडिया ड्रीम का सपना तो पूरा होने वाला नहीं है और यदि आंगे विपक्ष भी सरकार के इस रवैये को ऐसे ही स्वीकार करती रही तो २ १ वी शताब्दी में भी उसे सर्कार बनाने का मौका नहीं मिलेगा ! विकास देश की नहीं आम आदमी की जरुरत है ! और इसमें तो अंत में यही कहा जा सकता है की ये बजट स्विस बैंक के खता धारको को ध्यान में रखकर लाया गया है , इसमे बड़े बड़े उद्योगपतियों का ही ध्यान रखा गया है ! तो इसे आम बजट कैसे कह सकते है ! ये तो चिदम्बरम बजट ही कहलायेगा न ...!!



लगता है 'ओवैसी और कसाब' की सजाओ से काफी दुखी है शाहरुख : अंकुर मिश्र 'युगल'

आज कल के दिनों में देश के नए नए जुमलों को मुद्दों के ऊपर में उठाने की जद्दोजहद बराबर चल रही है ! देश में मिडिया के पास या तो खबरे नहीं है या जो मुद्दे की खबरे है वो दिखाना नहीं चाहते ! उसी का नतीजा है देश में शिंदे जैसे ‘गुंडे’ बिना मतलब में जनता के सामने आ जाते है ! शाहरुख खान जैसे मंद-बुद्धि अपनी खोई हुयी छवि को फिर से बटोरने लग जाते है ! जिस व्यक्ति ने अपने छोटे से परिवार के बाहर निकलकर कभी भी देश के लिए कुछ नहीं किया हो ? फिर भी जिस देश ने उसे सिर पर चढ़ाकर वो छवि दी , जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी ! वो व्यक्ति आज बोलता है उसे उसी समाज से खतरा है ! आखिर इस वक्तव्य का मतलब आम आदमी क्या सोचे ?? मेरे विचार से इस व्यक्ति के अंदर ओवैसी या कसाब जैसे विचार पनप रहे है ! जब उसके सामने उन व्यक्तियों का जनाजा उठा तो कुछ ख़यालात सामने आये ? उसे लगा अब तो इस देश में कुछ हो सकता है ! या फिर , क्या पाकिस्तान के उन भाइयो का ख्याल आ गया जिनके साथ मिलकर आतक फ़ैलाने का कुछ विचार हो ? वैसे भी पुरातन परम्परा है उस पाकिस्तान की , विकास के लिए भीख लेकर तबाही भेजने की ! और आप तो उस पहली हसरत में कामयाब हो चुके है पैसा देश से ले चुके है , तबाही की मुहीम में निकलने का इरादा ....................................................! और हाँ एक बात और याद आती है इस्लाम के जनक कहने वाले ‘ जाकिर नाइक’ के साथ भी आपके कभी अच्छे समबन्ध है ! यहाँ बात उन संबंधो की नहीं है बात है उनके आदर्शो की जो दूसरे धर्मो को हमेशा गलत बताते है ! क्या उनके साथ मिलकर कुछ करने का इरादा तो नहीं है ?? ये आपके वक्तव्य के बाद उत्पन्न हुए एक सामान्य भारतीय के विचार है ! हो सकता है ये बिल्कुल ही निरर्थक हो ! लेकिन ये भी हो सकता है ऊपर की किसी एक बात में एक प्रतिशत भी सच्चाई हो ! भाईसाहब देश में ‘दिलीप कुमार’, नासिर , अमजद खान, जीनत अमान, जावेद अख्तर अदि अनेक ऐसे मुस्लिम कलाकार हुए है लेकिन उन्हें कोई खतरा नहीं हुआ ! ये वो देश है जहा एक अंग्रेज महिला की पार्टी से सिख्ख व्यक्ति को चुनकर देश के मुस्लिम राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाई जाती है और वो भी वहाँ के लिए जहां ८० प्रतिशत से ज्यादा केवल हिंदू रहते है ! ऐसे देश देश के अंदर एक सामान्य व्यक्ति को खतरा नहीं होता और आप कहते है आपको खतरा है ! आप को बताना होगा आखिर अपके इस बयां के पीछे ख्याल क्या आया ?? यदि यह केवल व्यंग था तो आपने अपने उस खेमे में ठोस पहुचाया है जिअकी जमीं पर अआप खड़े हो ! और अगर इस बात के पीछे कुछ मकसद है तो ..................... उसे देश जानना जोर चाहेगा !! एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी फिल्मो के माध्यम से देश में प्यार की भावना फैलता है उसका वक्तव्य आता है की उसे देश के अंदर ही खतरा है ! आखिर क्यों ? यहाँ इस क्यों के पीछे प्रश्न तो कई है लेकिन उत्तर तो खुद वही दे सकते है !!

वंशवाद से नहीं विकासवाद से चलता है देश : अंकुर मिश्र 'युगल'

आखिर कुछ आच्छा दिखने लगा भाजपा में, एक बुरे दौर से गुजर रही भाजपा ने लोकसभा चुनाव के पहले कुछ अनोखे पहलुओ पर काम करते हुए देश को दिखा दिया की ये किसी परिवारवाद पर चलने वाला दल नहीं है ! वास्तव में जिस देश में दो दलों की ही सरकारी दावेदारी रहती हो , और उसमे भी एक दल ऐसा है जिसे लोकतान्त्रिक दल खा भी नहीं जा सकता ! कांग्रेस, जो अपने आप को देश का सबसे बड़ा दल कहता है और आजादी के बाद सबसे ज्यादा शासन किया है लेकिन मेरे अनुसार यह एक ऐसा दल है जिसने देश में सबसे ज्यादा कुशासन किया है और देश की आजादी के बाद की सभी लड़ाइयाँ गवाह है, पाकिस्तान गवाह है की इस बड़े दल ने देश को क्या दिया है ? एक लोकतान्त्रिक दल में राजतन्त्र जैसा माहौल पैदा करके इस दल ने जिस तरह से तानाशाही भरा शासन किया है, वह अनदेखा नहीं है ? एक दल जिसकी बागडोर हमेशा एक परिवार के हाथो में रही, पार्टी में अनेक महान नेताओ के होते हुए बड़े पदों पार हमेशा ऐसे राजनेताओ को बैठाया गया जिन पर गाँधी परिवार खुद शासन कर सके , मनमोहन सिंह जिसका सबसे बड़े उदहारण है ! पार्टी में अनेक ऐसे बड़े नेताओ के होते हुए ‘राहुल गाँधी’ उपाध्यक्ष का पद दिया जाना और अध्यक्ष का पद खुद सोनिया गाँधी के पास होना किसी लोकतान्त्रिक दल को नही दिखाता, पार्टी में जयराम रमेश, शशि थरूर अवं अनेक ऐसे युवा नेता है जो देश को राहुल गाँधी या गाँधी परिवार से अच्छा चला सकते है लेकिन उन्हें इस दल में ऐसे पद न मिलना किसी तानाशाही को ही दिखा सकता है ! वही देश में दूसरी तरफ एक ऐसा दल है जो अपनी आपसी लड़ाइयो से ही जूझता रहता है, दल मेंकुछ अच्छाइयां है जो इसे कांग्रेस से अलग करती है पहली बात पार्टी में किसी वंशवाद का न होना देश के सभी धर्मो के लोगो को पड़े पदों में बैठालना. इसी दल ने देश को अटल बिहारी बाजपेई जैसे प्रधानमंत्री व् आब्दुल कलम जैसे राष्ट्रपति दिए है ! पड़े पदों में उस व्यक्ति को बैथालना जो उपयुक्त है ! आभी वर्तमान में नितिन गडकरी को हटाकर राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाना इस बात को ही दिखता है को भाजपा केवल आर. एस . एस. के इशारों पर नहीं चलत और जारुरत पडने पर उसका साथ भी नहीं छोडती ! यह भाजपा का समर्थन नहीं था बल्कि वह सच्चाई थी जिसे देश बराबर नजरंदाज कर रहा है, जानते हुए भी अपना भला करने में असमर्थ है ! एक विकाशशील देश को दशको से वही पर खड़ा किये है ! देश वंशवाद , जातिवाद , आरक्षण, भरष्टाचार से नहीं चलता देश बढ़ता है विकास से और हम विकास नहीं निकास कर रहे है एक साच्ची बात से !

ओवैसी प्रश्न तो बहुत है , सामने होता तो जरुर पूंछता : अंकुर मिश्र ‘युगल


‘ओवैसी’ के पागलपन को आखिर हिंदुस्तान किस तरह स्वीकारे ? वह व्यक्ति जिसे जनता के बहुमत से सरकार का हिस्सा बनाया गया है उसके वक्तव्यों को १२५ करोड़ की जनता किस रूप में स्वीकारे !
उसने देश के हिन्दुओ को ही अनादरित नहीं किया उसने तो उन सच्चे मुसलमानों का भी आपमान किया है जिनका मुस्लिम धर्म खुद सिखाता है दूसरे धर्मो की इज्जत करना !
और कब तक इरादा है बातचीत से काम चलने का , एक तरफ शांति का के लिए क्रिकेट मैच होता है वही दूसरी ओर भारतीय सिम के अंदर घुसकर अपनी नामर्दानगी की ताजपोशी करता है हमारा पडोसी देश ! हमने जिसे हमेशा अपनी मौसी का दर्जा दिया है, हमने जिस देश की हरकतों को हमेशा नासमझ समझकर माफ़ किया , जिसके लिए हमेशा हमने शांति का पथ पढ़ा है आज वही भाई फिर से अपनी तुच्छ हरकतों पर उतर आया है ! सोते हुए सैनिको को मारना कही की मर्दानगी या जज्बा नहीं होता ! जज्बा दिखाना है तो बोलकर देखो एक बार ! हम शांत है ये हमारी सराफत है , कमजोरी नहीं ! वाही दूसरी तरफ हमारी ही मिट्टी में रहकर हमें ही दोषी ठहराने वाले उस ओवैसी के लिए तो कसाब की सजा भी कम है ! वैसे तो हमने कभी जताया नहीं है फिर भी यदि जबाब सुनने का मन है तो देश १०० करोड़ हिंदू नहीं बल्कि एक सच्चे दिल के मुस्लमान से ही पूंछ लो नासमझ ‘ओवैसी’ वो तुम्हे बता देगा की तुम्हारा खुद का धार्मिक स्टार कितना गिरा हुआ है !
तुम किस कसाब के लिए बात कर रहे हो जो खुद को दोषी ठहरा चूका था !
१०० करोड़ हिन्दुओ का मुकाबला तुम २५ करोड़ मुसलमानों से करोगे ?? अरे पहले अपने उन २५ करोड़ मुसलमानो से तो पूंछ लो क्या वो तुम्हारे साथ है ? चंद किराये के टट्टुओ को इकठ्ठा करके तालियाँ बजवाना शक्ति प्रदर्शन नहीं होता !
ओवैसी तू हिन्दुओ के भागवानो की बात करता है, यही हजारों भागवान तेरे २५ करोड मुसलमानों की जीविका बनाते है ! खैर तू इतना समझदार नहीं है अपने उन भाहियो की भावनाओ को समझ सके !
तू बाबरी मस्जिद की बात करता है ? तू ताजमहल की बात करता है ? तू लालकिला, जामा-मस्जिद यहाँ से लेकर जायेगा ? ............... क्या ये सब करने में तेरे साथ और कोई होगा ?
ऐसे ही अनेक प्रश्न है तुझसे , तू सामने होता तो एक पत्रकार और लेखक की हैसियत से जरुर पूंछता ! दिल में एक और तमन्ना है यदि तू सामने होता तो हिन्दुस्तानी होने के नाते एक ‘थप्पड़’ जरुर लगाता, ये एक हिंदू होने के नाते नहीं होता बल्कि ये एक मानुषी होने के नाते होता ! शायद उससे एक जानवर रूपी शारीर में कुछ फर्क पड़ता !

धार्मिकता या शर्मिंदगी : अंकुर मिश्र ‘युगल’

धार्मिकता या शर्मिंदगी ?? जब देश एक गंभीर समस्या से गुजर रहा है जहां एक बेबस और लचार लड़की ने अपनी जान गवाई, जिसके लिए कानून और सरकार सुधार के रास्ते ढूड रहे है ! देश के हर कोने में प्रार्थना सभाए हो रही है की भविष्य में ऐसी दरिंदगी न हो ! एक लड़की को कुछ दरिदे घेरकर देश के सामने एक दरिन्दागी की नीव रखते है जो पुरे देश के लिए शर्मनाक है ! सभी ऐसे कामो के न होने की प्रार्थना करते है और उन दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की पेशकस करते है ! खुद देश के पूर्व न्यायधीश ने कहा की ‘अपराध सजा देने से कम होते है सजा की कठोरता बढ़ाने से नही’ , और यह सत्य भी है एक महीना से ऊपर होने वाला है इस अत्याचार को लेकिन अभी तक उन दरिंदों को कोई सजा नहीं मिली है ! लेकिन इस बिच अनेक ऐसे बलात्कार के मामले सामने आये जो दिल दहला देने वाले थे ! आखिर इसका मतलब क्या समझा जाये, उस नादान की मौत का कुछ भी असर नही हुआ इन हैवानो पर या फिर वो ये दिखाना चाहते है की हमारे देश की कानून व्यावस्था कितनी लाचार है ! लोग कहते है
“ वो तो सो गयी , लेकिन हमें जगा गयी”
तो वो जाग्रति कहा है ? इसके आलावा देश के धार्मिक और हिंदुत्व के पालनहर काह्लाने वाले बापू आशाराम और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत के वक्तव्यों को क्या समझा जाये जो इस समस्या का समाधान का हिस्सा न बनकर बल्कि उस लड़की को दोषी ठहरा रहे है ! आखिर इन ढोगियो को अध्यात्म गुरु की संज्ञा ही क्यों दी जाती है देश हित में बात नहीं कर सकते तो कम से कम अहित की बात तो न करे ! आखिर उनकी सोच का नजरिया क्या है ?? जिस लड़ाई में समाज की सबसे ज्यादा भूमिका होनी चाहिए उस समाज के सब्भ्रांत लोग ही ऐसे वक्तव्य देते है , इनकी जिम्मेदारी का सूचक है या मानसिक असंतुलन का ! कुछ भी हो देश की इस अहम लड़ाई में समाज की जागरूपता सबसे ज्यादा जरुरी है और दूसरा यह की इन मानसिक असंतुलित ढोगियो को नसीहत देने की जरुरत नहीं है !
अब तक लड़े है , अब भी लड़ेगे ! कल तक खड़े थे , आज भी खड़े है ! अब नहीं है वो तो क्या हुआ ? उसकी शक्तियां हम पर है दुआ !!