दिल्ली (एन.सी.आर.) के कालेजो की प्रसिद्धि और मान्यता तो विश्व्प्रसिध्ध है, लेकिन वास्तविकता कुछ और भी हो सकती है ऐसा सोचना “गलत” तो नहीं अपितु सत्यता से ज्यादा सत्य होगा ! अधिकतर कालेज शिक्षा के लिए नहीं बल्कि केवल “डिग्री” के लिए खुले हुए है जिनका काम केवल “डिग्री” देना ही है, विभिन्न प्रदेशो से आने वाले वाले छात्र-छात्राओं को लुभाने के अनेक लाजबाब तरीको का उपयोग कैसे करते है कोई अच्छी तरह से सीख सकते है ! स्ववित्तपोषी कालेजो के मालिकों का मलिकानापन कालेज में हमेशा झलकता है ! विशाल इमारतों को सुंदरता के पलड़े में बैठाकर कालेजो को जिस तरह प्रस्तुत किया जाता है उसमे यही झलकता है “सुंदरता की इससे अच्छी कोई दूसरी ईमारत हो ही नहीं सकती” ! लेकिन अंदर के खोखलेपन का अनुभव होने पर जिस अनुभव की अनुभूति होती है वास्तव में अतुन्नीय होती है ! वैसे वास्तविकता तो ये भी है शिक्षा और अशिक्षा प्राप्त करने आने वाले छात्रों के प्रतिशत भी ५०-५० ही होता है ! परन्तु कालेज किन ५०% छात्रों के साथ चल रहा है इसका अनुभव कोई अपनी पूरी डिग्री में नहीं कर सकता ! भारत में “इंजिनीरिंग” सबसे अतुलनीय “डिग्री” मणि जाती है इसलिए सभी का सपना होता है “इंजिनियर” बनना, इसलिए घर से किसी भी तरह इंजीनियरिंग के द्वार में प्रवेश कर ही जाते है फिर वो कोई भी कालेज हो ! यही कहानी है दिल्ली (एन.सी.आर.) के कालेजो की जहां विद्यार्थी इसलिए आते है की ये भारत का तकनिकी केंद्र है ! यहाँ के विश्वविद्यालयो से डिग्री करने के बाद “बेरोजगारी” जैसे शब्दों का सुनना समाप्त हो जायेगा ! लेकिन 100% Placement”.. Guarantee..
“TAG” वाले कालेजो की वास्तविकता क्या होती है यहाँ ही पता चलता है ! यहाँ हजार से ऊपर कालेज निर्मित है जिनमे लाखो की संख्या में विद्यार्थी अपना जीवन बनाने का प्रयास कर रहे है ! तकनिकी , मैनेजमेंट, फार्मेसी एवं अन्य अनेक कोर्सो में लोग रोजगार पाने की कोशिश कर रहे है ! और इसमें सफलता भी पा रहे है लेकिन असफलता का प्रतिशत कुछ ज्यादा ही है !
आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ???
एक छात्र/क्षात्रा लाखो की संपत्ति खर्च करके यहाँ व्यावसायिक शिक्षा के लिए आता है लेकिन उस पर क्या बिताती है जब वो कोर्स समाप्ति के बाद अपने को उस स्थिति से भी बुरा पता है जहाँ से वो आया था !!
आखिर इसका जिम्मेदार कौन ??
यहाँ उन छात्रों की बात भी नहीं जिनकी शैक्षिक-स्थिति सही नहीं लेकिन उनका जिम्मेदार कौन जिनको
100% Placement”.. Guarantee.. के “TAG” के बव्जूओद कालेज रोजगार नहीं दिला पा रहा !!
और उसके लिए जिम्मेदार कौन है जिन्हें इस विशाल “IT-Hub” के बावजूद नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता है !!
जिम्मेदार कोई भी हो (सरकार, कालेज-मैनेजमेंट ....या और कोई ) लेकिन नुकसान उस छात्र/छात्रा का ही होना है , जो देश का भविष्य हो सकता है !!
''सत्य और साहित्य'' : 'अंकुर मिश्रा' की हिंदी रचानाएँ (कहानियाँ और कवितायेँ )
अपना दीप जलाना होगा : अंकुर मिश्र "युगल"
खुली चुनौती देता हमको , बढ़ता हुआ अँधेरा !
पल-पल दूर जा रहा हमसे, उगता हुआ सवेरा !!
निशा नाचती दिशा-दिशा में उडी तिमिर की धुल !
अपना दीप जलना होगा , झंझा के प्रतिकूल !!
आत्मा की चिर दीप्त वर्तिका, को थोडा उकसा दो !
मांगो नहीं ज्योति जगती से, लौ बन के मुस्का दो !!
जगमग जगती के “अंकुरण” से, खिले ज्योति के फूल !
माथे से फिर विश्व लगाये, इस धरती की धुल !!
अमा ,क्षमा मांगे भूतल से, भागे सघन अँधेरा !
अवनी का अलोक स्तंभ, बन जागे भारत मेरा !!
आर्य संस्कृति के परवाने, आओ सीना ताने !
दीप बुझाने नहीं , ज्वलित पंखो से दीप जलाने !!
तब समझूंगा तुम जलने की, कितनी आग लिए हो !
और दहकते प्राणों में, कितना अनुराग लिए हो !
........ ""श्री लाखन सिंह भदौरिया जी "
भीड़ का मतलब “वोट” नहीं होता “राजकुमार जी” : अंकुर मिश्र ”युगल”

उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनावो ने ऐसे रहस्यों का खुलासा किये है जिनका खुलासा केवल जनता ही कर सकती थी !
जिस तरीके से पिछली पंचवर्षीय में “सपा” सरकार का विकल्प “बसपा” बनी थी ठीक उसी तरह इस पंचवर्षीय में जनता ने परिवर्तन ही सबसे अच्छा विकल्प समझा और “सपा” को “बसपा” का अतुलनीय विपल्क घोषित किया ! वैसे परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है ! जनता विकास में भी परिवर्तन ही चाहती है और उसने वही किया ! इस चुनाव में सबसे बड़ा दृश्य ये था की जनता जगरूप हो चुकी है इसी वजह से इस बार वोटो का प्रतिशत भी बढ़ा ! इसे “अन्ना” मुहीम का परिणाम कहे या जनता की जागरूपता ?? कुछ भी बेहतरता भारतीय राजनीती में ही अति है !! ये तो बात थी, प्रदेश की दो बड़ी पार्टियों और उ.प्र. राजनीती की ! वाही नजर डाले देख की दो बड़ी पार्टियों : “भाजपा और कांग्रेस” की तो दृश्य कुछ अदृश्य सा लगता है ! दोनों पार्टियों ने अपने अपने दिग्गजों को लेकर उ.प्र. की राजनीती की लेकिन परिणाम कुछ विपरीत ही आये ! वैसे भाजपा के पास ज्यादा खोने के लिए कुछ था नहीं क्योंकि उनका ज्यादा कुछ दाव पे नहीं था ! लेकिन कांग्रेस ने उ.प्र. की राजनीती जिस “राजकुमार” को दांव में लगाकर की वो जरुर द्रिश्नीय था ! कांग्रेस ने विधानसभा चुनावो में दांव में लगाया “राहुल गाँधी” को, राहुल गाँधी ने प्रदेश में 2 महीनो में 211 सभाए कर डाली ! और
इन सभाओ में लोगो की भीड़ “करोणों” में थी,
राहुल गाँधी ने अपनी छवि के विपरीत “भाषण” दिए !
जतिवाद्ता, स्थानवादिता का सहारा लिया जो “जनता” उनसे भी पूछ सकती थी ! लेकिन जनता शांत रही और उसी वाही जनता जो राहुल का भाषण सुनने करोणों में आती थी उसने कांग्रेस को विधानसभा में “पचासा” भी न मरने दिया ! उसने अपने अनुसार अपनी सरकार चुनी और एक अन्य युवा को मौका देना ज्यदा उपयोगी समझा !
“अखलेश यादव” की अग्निपरीक्षा है इस बार और देखते है वो इसमें कितने खरे उतरते है , उन्हें याद रखना होगा आंगे “लोकसभा” चुनाव है!
"मतदान” का अधिकार अति अनिवार्य : अंकुर मिश्र "युगल"

निरंतर किसी व्यक्ति विशेष को आधार बनाकर उसे उस संज्ञा से परिभाषित करना जिससे उसे तनिक भी फर्क नहीं पढ़ने वाला, किस बात को दर्शाता है ! शत प्रतिशत कोई भी कही भी नहीं दिखा सकता और जिससे आप इस तरह की कल्पना करते हो तो उस व्यक्ति में कोई कमी नहीं है कमी आप में है !!!
आज “फेसबुक” जो वास्तव में एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसके जरिये हम सभी सकारात्मक तथ्यों को जानकारी कर सकते है लेकिन एक सीमित प्रयोग से !! इंटरनेट एक सूचना का असीमित माध्यम है जिसके जरिये हम दुनिया से और दुनिया हमसे जुडी रह सकती है लेकिन एक सीमित और सकारात्मक प्रयोग से ! कुछ समय पहले कुछ समूहों ने और कुछ व्यक्तित्यो ने इन पर “केस” किया ! कारण यहाँ के नकारात्मक वस्तुए जो एक साधारण से वातावरण को दूषित करती जा रही है !
यह सभी जानते है किसी व्यक्ति विशेष में कोई बुराई नहीं होती है न ही किसी समूह में, कमी हमेशा उनके क्रियाकलाप के तरीको में होती है ! और तरीको के विरोध का जो रवैया जनता अपनाती है वह उससे भी ज्यादा भयावह होता है ! वह केवल उन तथ्यों पर ध्यान देकर विचार करती है जिनमे व्यक्ति की बुराई झलकती है, उनकी स्थिति को भी समझना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए!
यहाँ आज की भारतीय संस्कृति को जिस आधार ने उल्लंघित किया किया है वह आज की सबसे प्रमुख और सहायतार्थ तथ्य “इंटरनेट”. जिसमे कई तरह की अश्लील सामग्री परोशी जा रही है जिससे व्यक्ति विशेष या समूह की ही नहीं बल्कि पुरे देश की धूमिल छवि विश्व के सामने प्रकट होती है और करने में किसी बाहरी ताकत का नहीं बल्कि हम सभी का हाथ है ! इस बार खतरा सुरक्षा, धन, सरकार में नहीं बल्कि देश की संस्कृति में है ! विश्व के सामने “फेसबुक” या अन्य “सोशील नेटवर्किंग साइट्स” के जरिये जो भद्दी छवि देश के नेताओ की प्रस्तुत की जा रही है उससे उनके कर्मो को तो कोई नही लेकिन देश की छवि को बहुत फर्क पड़ने वाला है ! आखिर उस सामग्री मतलब है क्या ??
नेताओ के प्रति आक्रोश !! वैसे उस आक्रोश को व्यक्त करने के और भी तरीके है जो साफ स्वच्छ है और उनसे कुछ सुधार भी हो सकता है !! नेताओ और उनके क्रियाकलापों के प्रति आक्रोश को प्रकट करने का सबसे बड़ा आधार है हमारा सबसे बड़ा अधिकार “वोट” !!
यही वो ताकत है जिससे देश में बदलाव आ सकता है, लेकिन जनता उसी के प्रति जगरूप नहीं है, जब चुनाव आते है तब उस अधिकार को प्रयोग न करके उसी को बढ़ावा देते है जिसे रोकने के लिए खुद और देख को अभद्रता के गलियारे में खड़ा करते है !!
देश उत्थान के लिए “मतदान” और “मतदाता” के अधिकारों को समझकर 100% मतदान की कोशिश करें, ऐसा करने से देश-पतन वाले क्रियाकलापों की जरुरत नहीं पड़ेगी !!
क्या उसने “मुझे” ये कहा तो ये लो मेरा “जबाब” !! : अंकुर मिश्र “युगल”
राजनैतिक दुर्घटनाओ से ग्रसित हिंदुस्तान में चुनावो की श्रंखला की शुरुआत हो चुकी है, और इस श्रंखला में कई राज्यों के चुनाव पंक्तिबद्ध है,पुरातन राजनीती के अनुसार चुनाव प्रचार की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, चुनाव देश के है, सरकार देश व् प्रदेश के लिए बननी है, और उसमे प्रमुख भागीदारी भी जनता की है और उसी को चुनना है कौन हम पर राज्य करेगा , इन सबके बावजूद राजनेताओ का मुद्दा कुछ अलग ही दिखाई दे रहा है, दुनिया का सबसे बड़ा “लोकतंत्र” भारत देश में है, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीती भारत में होती है लेकिन इसका सबसे बड़ा खोखला-पन भी दुनिया में धीमे-धीमे प्रसिद्द होता जा रहा है !

दुनिया का हर देश एक ही मुद्दा रखता है “विकास” !!
कहने को तो ये मुद्दा भारत में भी है और राजनेताओ की सुने तो वो कहते भी है की हमारी पार्टी देश के “विकास” को लेकर बहुत चिंतित है लेकिन यह वाक्य कितने सही है और कितने गलत ???? ये एक यहाँ का निवासी ही बता सकता है !यह किसी विशेष राजनैतिक दल की बात नहीं है भाजपा हो !!
कांग्रेस हो !! माकपा हो !! सपा हो !! बसपा हो !! या और कोई सा भी राजनैतिक दल सभी के चुनाव के पहले या बाद की प्रक्रियाये एक ही तरह की होती है ये ऍम जनता को भी पता है !
आज की राजनीती ही देख लो चुनाव प्रचार की रैलियां जोरो पर है , चुनाव प्रचार के ऐसे सहारे लिए जाते जो वास्तव में अतुलनीय है ! पार्टी प्रवक्ता या पार्टी प्रचारक प्रचार में “विकास” शब्द छोरकर बांकी सभी अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करते है एक दूसरे के ऊपर आरोपो का प्रत्यारोपण जिनसे जनता का कोई मतलब नहीं है !! एक कहेगा “क्या उसने “मुझे” ये कहा तो ये ले मेरा “जबाब” ! जबाब की उस भाषा में होगा जो ये सिद्ध कर देता है की हमारे राजनेता कितने “शिक्षित” है ! वैसे भी भारतीय लोकतंत्र में ये नियम “पास” हो चूका है की कोई भी “क्रिमिनल” चुनाव लड़ सकता है अब इस भाषा से ये भी सिद्ध होता है की कोई भी “गवांर” चुनाव लड़ सकता है !!
क्या किसी राजनैतिक पार्टी का मुद्दा "विकास" भी है या फिर सबका एक ही मुद्दा है एक दूसरे के ऊपर पलटवार ??
क्या कोई उस 99% जनता की भी बात करेगा जो कुल संपत्ति के 1% में पल रही है या फिर उन्ही 1% की बात करोगे जो 99% संपत्ति के मालिक है ??
क्या अपने विकास की चिंता को छोड़कर 125 करोण लोगो के विकास के बारे में नहीं सोच सकते ??
अरे देश के आकाओ आखिर देश की जनता को समझते क्या हो ??
क्या भूल गए वो एक बार जग गई तो भारत हिल जायेगा, चुनाव में सम्भलियेगा जरा कही जनता जाग न जाये और आपका विकास रुक न जाये ??

दुनिया का हर देश एक ही मुद्दा रखता है “विकास” !!
कहने को तो ये मुद्दा भारत में भी है और राजनेताओ की सुने तो वो कहते भी है की हमारी पार्टी देश के “विकास” को लेकर बहुत चिंतित है लेकिन यह वाक्य कितने सही है और कितने गलत ???? ये एक यहाँ का निवासी ही बता सकता है !यह किसी विशेष राजनैतिक दल की बात नहीं है भाजपा हो !!
कांग्रेस हो !! माकपा हो !! सपा हो !! बसपा हो !! या और कोई सा भी राजनैतिक दल सभी के चुनाव के पहले या बाद की प्रक्रियाये एक ही तरह की होती है ये ऍम जनता को भी पता है !
आज की राजनीती ही देख लो चुनाव प्रचार की रैलियां जोरो पर है , चुनाव प्रचार के ऐसे सहारे लिए जाते जो वास्तव में अतुलनीय है ! पार्टी प्रवक्ता या पार्टी प्रचारक प्रचार में “विकास” शब्द छोरकर बांकी सभी अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करते है एक दूसरे के ऊपर आरोपो का प्रत्यारोपण जिनसे जनता का कोई मतलब नहीं है !! एक कहेगा “क्या उसने “मुझे” ये कहा तो ये ले मेरा “जबाब” ! जबाब की उस भाषा में होगा जो ये सिद्ध कर देता है की हमारे राजनेता कितने “शिक्षित” है ! वैसे भी भारतीय लोकतंत्र में ये नियम “पास” हो चूका है की कोई भी “क्रिमिनल” चुनाव लड़ सकता है अब इस भाषा से ये भी सिद्ध होता है की कोई भी “गवांर” चुनाव लड़ सकता है !!
क्या किसी राजनैतिक पार्टी का मुद्दा "विकास" भी है या फिर सबका एक ही मुद्दा है एक दूसरे के ऊपर पलटवार ??
क्या कोई उस 99% जनता की भी बात करेगा जो कुल संपत्ति के 1% में पल रही है या फिर उन्ही 1% की बात करोगे जो 99% संपत्ति के मालिक है ??
क्या अपने विकास की चिंता को छोड़कर 125 करोण लोगो के विकास के बारे में नहीं सोच सकते ??
अरे देश के आकाओ आखिर देश की जनता को समझते क्या हो ??
क्या भूल गए वो एक बार जग गई तो भारत हिल जायेगा, चुनाव में सम्भलियेगा जरा कही जनता जाग न जाये और आपका विकास रुक न जाये ??
नेता जी “Walks Out” या “Bunk”? : अंकुर मिश्र "युगल"
हम सभी ने स्कूल और कालेजो में “class bunks” तो खूब की होगी कभी इनसे कुछ फायदे हुए होगे और कभी नुकसान लेकिन वो उस स्तर पर भी ठीक नहीं था, ऐसा करने से खुद पर कुछ असर पद हो या न लेकिन उस कार्य से जुड़े अनेक लोगो को जैसे “कालेज प्रोफ़ेसर”, “माता-पिता”, और अन्य अनेक लोगो को कुछ न कुछ फर्क जरुर पड़ा होगा !! लेकिन उस बात पर हम ध्यान नहीं देते क्योंकि वो एक बचपना था और उससे यदि किसी पर सबसे ज्यादा फर्क पड्त था तो वो हम खुद दे !!

लेकिन आज देश के संचालक जब हमारे पैसे से बनी “विधानसभाओ” और “लोकसभा” का अपमान करते है और प्रतिदिन किसी न किसी बहाने से “walks-Out” करते है क्या वो सही है ????
किसी बेतन पर कार्य करने वाले साधारण सख्श के लिए भी कार्य करने की कुछ न कुछ समय सीमा होती है उसे सप्ताह में ५-६ दिन कार्य करने पड़ता है ! लेकिन क्या हमारे देश के मंत्रियो के पास इतना भी काम नहीं है की वो प्रतिदिन घूमने और “Bunk” करने में व्यस्त रहे !
इनका वार्षिक कार्यकाल तो पहले से ही कुछ महीनो का होता है और जो होता है उसमे भी ये अधिकतर समय “walks Out” में रहते है और बहाने होते जनता के तमाम “बिल” !!! अरे जनता का इतना ही ख्याल है तो उस संसद भवन या विधान सभा में बैठकर उस पर बहस करिये न !!
उस बिल की कमियों और अच्छाइयों पर बात करिये न ! उसे जनता के पक्ष में और अच्छा बनाने का प्रयास करिये न ! एक बार ये सोच कर इस पर सोचिये की जो मासिक बेतन आपको दिया जाता है वो किस लिए है, जिन गाडियों में आप घूमते है उसमे “तेल” किसके पैसो का होता है, जिस पड़ को लेकर इतना गुमार है उसे किसने दिया है !!
ये किसी विशेष पार्टी या विशेष व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि देश किकी हार उस पार्टी और सदस्य के लिए है जो संसद या विधानसभाओ से किसी भी तरह से जुड़े है ! “पक्ष हो या विपक्ष” दोनो को इस पर सोचने की जरुरत है !!
वर्तमान राजनीती का तो ये हाल है की “पक्ष और विपक्ष” दोनों अपने को दो देशो में रखकर किसी मुद्दे पर बात करते है, जनलोकपाल की बात क्यों करे क्योंकि इसका समर्थन विरोधी पार्टियां कर रही है, वही दूसरी ओर एफडीआई की बात क्यों करे क्योंकि इसका समर्थन सरकार कर रही है ! हमारे महान नेता बस इसी सुविचार में लगे हुए है वो भूल चुके है जिसके काम से वो वहाँ है जिसने उन्हें वहाँ भेजा है, “वो जनता है” !!
इस संसद के “walks-out’ की सबसे बड़ी जिम्मेदार “विपक्षी” पार्टियां है, सरकार तो हमेशा अपनी सोच को ही अंगे बढाना चाहेगी लेकि विपक्ष को भी अपने अधिकार मिले हुए है !
क्या बात न करने से कुछ हल निकल सकते है ? क्या बहस न होने से कोई बिल पास हो सकता है ?
मेरे हिसाब से तो नहीं और होगा भी तो किसी विशेष समूह के अनुसार !
वर्मन की इस प्रणाली को देखते हुए लगता है की संसद और स्थानीय विधान-सभाओ की कार्य करने की प्रणाली में कुछ परिवर्तन आवश्यक है ऐसा करने से देश की दिशा और दशा में दोनों में परिवर्तन आयेगा, महीनो से पड़े “बिलो” में बात होगी, व्यक्तिगत मंत्रिपद की कार्यप्रणाली में बात होगी और अन्य ऐसे कार्य होगे जिनकी आज आवश्यकता है ! जिस तरीके से साधारण व्यक्ति की प्रतिदिन की कार्य की कुछ समय सीमा होती है उसी तरह से “इनके भी कार्य करने की कुछ समय सीमा होनी चाहिए !
यदि दिन में “walks-Out” करें तो रत में अतिरिक्त समय निकालकर इनसे कार्य करवाया जाये !
आखिर ये देश के संचालक है इनके द्वारा पास कराये गए विधेयकों से देश चलता है जनता के लिए “नियम” होते है वो ! इतने बड़े कार्य को इतनी आसानी से कैसे कर सकते है हमारे , हमारे द्वारा चुने गए, हमारे पैसो से पल रहे हमारे “राजनेता”, कुछ “साधारण” से ज्यादा तो करना ही पड़ेगा इन्हें !!

लेकिन आज देश के संचालक जब हमारे पैसे से बनी “विधानसभाओ” और “लोकसभा” का अपमान करते है और प्रतिदिन किसी न किसी बहाने से “walks-Out” करते है क्या वो सही है ????
किसी बेतन पर कार्य करने वाले साधारण सख्श के लिए भी कार्य करने की कुछ न कुछ समय सीमा होती है उसे सप्ताह में ५-६ दिन कार्य करने पड़ता है ! लेकिन क्या हमारे देश के मंत्रियो के पास इतना भी काम नहीं है की वो प्रतिदिन घूमने और “Bunk” करने में व्यस्त रहे !
इनका वार्षिक कार्यकाल तो पहले से ही कुछ महीनो का होता है और जो होता है उसमे भी ये अधिकतर समय “walks Out” में रहते है और बहाने होते जनता के तमाम “बिल” !!! अरे जनता का इतना ही ख्याल है तो उस संसद भवन या विधान सभा में बैठकर उस पर बहस करिये न !!
उस बिल की कमियों और अच्छाइयों पर बात करिये न ! उसे जनता के पक्ष में और अच्छा बनाने का प्रयास करिये न ! एक बार ये सोच कर इस पर सोचिये की जो मासिक बेतन आपको दिया जाता है वो किस लिए है, जिन गाडियों में आप घूमते है उसमे “तेल” किसके पैसो का होता है, जिस पड़ को लेकर इतना गुमार है उसे किसने दिया है !!
ये किसी विशेष पार्टी या विशेष व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि देश किकी हार उस पार्टी और सदस्य के लिए है जो संसद या विधानसभाओ से किसी भी तरह से जुड़े है ! “पक्ष हो या विपक्ष” दोनो को इस पर सोचने की जरुरत है !!
वर्तमान राजनीती का तो ये हाल है की “पक्ष और विपक्ष” दोनों अपने को दो देशो में रखकर किसी मुद्दे पर बात करते है, जनलोकपाल की बात क्यों करे क्योंकि इसका समर्थन विरोधी पार्टियां कर रही है, वही दूसरी ओर एफडीआई की बात क्यों करे क्योंकि इसका समर्थन सरकार कर रही है ! हमारे महान नेता बस इसी सुविचार में लगे हुए है वो भूल चुके है जिसके काम से वो वहाँ है जिसने उन्हें वहाँ भेजा है, “वो जनता है” !!
इस संसद के “walks-out’ की सबसे बड़ी जिम्मेदार “विपक्षी” पार्टियां है, सरकार तो हमेशा अपनी सोच को ही अंगे बढाना चाहेगी लेकि विपक्ष को भी अपने अधिकार मिले हुए है !
क्या बात न करने से कुछ हल निकल सकते है ? क्या बहस न होने से कोई बिल पास हो सकता है ?
मेरे हिसाब से तो नहीं और होगा भी तो किसी विशेष समूह के अनुसार !
वर्मन की इस प्रणाली को देखते हुए लगता है की संसद और स्थानीय विधान-सभाओ की कार्य करने की प्रणाली में कुछ परिवर्तन आवश्यक है ऐसा करने से देश की दिशा और दशा में दोनों में परिवर्तन आयेगा, महीनो से पड़े “बिलो” में बात होगी, व्यक्तिगत मंत्रिपद की कार्यप्रणाली में बात होगी और अन्य ऐसे कार्य होगे जिनकी आज आवश्यकता है ! जिस तरीके से साधारण व्यक्ति की प्रतिदिन की कार्य की कुछ समय सीमा होती है उसी तरह से “इनके भी कार्य करने की कुछ समय सीमा होनी चाहिए !
यदि दिन में “walks-Out” करें तो रत में अतिरिक्त समय निकालकर इनसे कार्य करवाया जाये !
आखिर ये देश के संचालक है इनके द्वारा पास कराये गए विधेयकों से देश चलता है जनता के लिए “नियम” होते है वो ! इतने बड़े कार्य को इतनी आसानी से कैसे कर सकते है हमारे , हमारे द्वारा चुने गए, हमारे पैसो से पल रहे हमारे “राजनेता”, कुछ “साधारण” से ज्यादा तो करना ही पड़ेगा इन्हें !!
‘काल्पनिक दुनिया’ की गिरफ्त में ‘कल्पनाएँ’ :- अंकुर मिश्र “युगल”

मानव और उसका मन ही भावनाओ की ‘अंकुरण’ की सीमा निर्धारित करता है ! क्या ये सच है ?
सबका उत्तर आयेगा हाँ !!लेकिन आज को देखते हुए अधिकांश बुद्धिजीवियों का उत्तर आयेगा नहीं, और ये सच भी है क्योंकि ऐसा हम पिछले दशकों तक ही कह सकते थे जब तक तकनीकी और ‘इंटरनेट’ की दुनिया से दूर थे ! आधुनिक ‘सर्वे’ भी यही कहते है, मानव के सोचने की छमता में जो गिरावट पिछले २-३ दशको में आई है वह भयावह है, यही रहा तो वो दिन दूर नहीं है जब मानव “तकनीक” का गुलाम होगा ! हम केवल कह ही सकेंगे की “कंप्यूटर बनाया तो मानव ने ही है” कुछ करने में सक्षम नहीं होंगे ! ये सब जानकारियां होने के बावजूद हम जानते है की हम इस भयावह “प्रगति” को रोकेगे नहीं ! और कह भी सकते है अब यह असंभव है ............!!
इस तकनीकी संसार में फिर भी मानव का कुछ न कुछ विकास हो रहा था, उसके अंदर नए विचार उत्पन्न हो रहे थे, दिमाग नाम के लिए नहीं काम के लिए था लेकिन “इंटरनेट” के विस्तार का परिणाम कुछ ज्यादा ही भयावह नजर आ रहा है ! यहाँ से तो परिणाम ये आ रहे है है की मानव में विचारों का ‘अंकुरण’ ही समाप्त हो गया है ! उसने सोचने के लिए भी इंटरनेट के आधुनिक माध्यमों का उपयोग शुरू कर दिया है ! GOOGLE, YAHOO!, REDIFF, MSN, BING & ASK से पूंछ- पूंछ कर मानव चाँद पर पहुँचाने की सोच रहा है, यही कार्क्रम जरी रहा तो यहाँ जानकारी देने वाला कौन बचेगा ! Search Engions की दुनिया में कही एक दिन खुद को Search न करना पड़ जाएँ ! वही दूसरी ओर एक नहीं काल्पनिक दुनिया का निर्माण तेजी से चल रहा है –“Social – Networking” ...!! इस दुनिया में प्रमुख भूमिका निभा रहे है – Facebook, Twitter, Google+, Hi5, MySpace...............इत्यादि ! वैसे आज Facebook अपना अलग संसार ही बसा चुका है, मै समझता हूँ “फरवरी-2004” में चालू हुयी इस दुनिया के बारे में कुछ ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है !
आज ये एक ऐसी दुनिया बन चुकी है जहां जिंदगी के दोनों पहलु उपलब्ध है – “ +Ve & -Ve ” ! +ve नजरिये से हम इसका प्रयोग करके दुनिया जीत सकते है, लोग लाभ के नजरिये से देखे तो यहाँ अच्छे-अच्छे बुद्धजीवियों से संपर्क होता है, किसी क्रांति के लिए यहाँ से प्रचार-प्रसार का निशुल्क माध्यम उपलब्ध होता है , किसी व्यापर के व्यापारी-करण में यहाँ से लाभ मिलता है, शिक्षा के इसमें अलग ही नज़ारे है ................और अनेक ऐसे क्रियाकलाप करके हम इस दुनिया से हाथ मिलकर अपनी कल्पनाओ को नयी उड़न दे सकते है !
लेकिन वही अगर इसके दूसरे पहलू पर नजर डालते है तो परिणाम कुछ अच्छे नजर नहीं आते ! आज की युवा-पीढ़ी इस दुनिया में इतनी ज्यादा घुस चुकी है की उसके सोचने के प्राक्रतिक माध्यमों में भी ताला पड़ चुका है, उसका सबसे बड़ा सहयोगी “Google” बन चुका है, उसका सबसे अच्छा दोस्त “Facebook” बन चुका है ! क्या ये युवा-पीढ़ी की उन्नति या उपलब्धि है ?
यहाँ भी बुद्धिजीवियों का उत्तर नकारात्मक ही आता है, यद्यपि उन्होंने इस दुनिया को गलत नहीं बताया लेकिन वो उसके प्रयोग पर प्रतिक्रिया देने से नहीं चुके ! उन्होंने युवाओ द्वारा इसके प्रयोग पर अपनी आपत्ति जताई ! सबसे बड़ी प्रतिक्रिया “समय” पर थी जो अतुल्य दुनिया के लिए अतुल्य है ! और यह सत्य भी है की युवा पीढ़ी अपना समय प्राक्रतिक तरीके से न बिताकर ‘इंटरनेट’ के तरीके से बिता रहे है और जहाँ उन्हें कभी-कभी नकारात्मक परिणाम मिलते है ! Facebook युवा-पीढ़ी के लिए “Time-Pass” का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है ! वैसे Users के आधार “भारत” अभी इस श्रेणी में तीसरे पायदान पर है लेकिन समय के नाजरिय से भारत पहले पायदान पर आता है, जो भारत के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है, उपयोग गलत नहीं है, लेकिन वो सही तरीके से होना चाहिए ! मनुष्य की कल्पना ही एक ऐसा तथ्य है जिसके जरिये दुनिया का अस्तित्व है लेकिन इस काल्पनिक दुनिया के प्रलोभन में यदि कल्पना करना ही बंद कर दिया गया तो क्या इस अस्तित्व को जिन्दा रखा जा सकता है !!
शब्द इतने अपशब्द नहीं लगते जितना इसकी दुनिया में जीवन व्यापन लगता है ! वैसे देखे तो वो सारी काल्पनिक वस्तुए यहाँ उपलब्ध है जिनके जरिये हम मयुशी महसूस नहीं कर सकते !
अब सोचना आपको है की कौन-सी दुनिया किस तरीके से सही है, किस तरीके से आपको जीना है, कल्पनाओ की कल्पनाओ को जिन्दा रखना है या नहीं !!
!! इस सोचनीय सोच पर एक बार सोचियेगा जरुर !!
नजरिये की राजनीती से लड़ता भारत :- अंकुर मिश्र “युगल”
परिस्थितियां तो हमेशा परिवर्तनशील होती ही, लेकिन जब ऐसी परिस्थितियों का सामना जनता को करना पड़े जिसके लिए जनता वाध्य हो और उसे किसी भी परिवर्तन की आशाएं न दिखे तब जनता क्या करे बड़ी दुविधा हो जाती है, इस भ्रम की शिकार जनता किस नजरिये से अपना हित सोचे यह बड़ा ही कथानतम प्रश्न बन जाता है ! आज का भारत कल के भारत से अच्छा है यह कैसे कहे या आने वाले कल का भारत आज के भारत से अच्छा होगा ये कैसे कहे, जब हम आज को अच्छा नहीं बना पा रहे, तो कल की बात करना ही बेकार है !

देश तो लोकतान्त्रिक है, लेकिन क्या यहाँ जरा सा भी लोकतंत्र के सम्मान है! देश सर्वोपरि है, देश को प्रधानमंत्री चलाता है, लेकिन प्रधानमंत्री को कोई और यो चलाता है !!
देश में करोड़ो की संपत्ति बड़े-बड़े पार्को, दार्शनिक स्थलों को बनाने में लगा दिए जाते है, फिर भी देश में करोणो लोग भूखे पेट क्यों सोते है !!
हमसे सुरक्षा के नाम से करोड़ो रूपये वसूले जाते है , फिर भी आतंवादियो को देश के अंदर रखकर उनकी सुरक्षा कराकर उन्ही से बम कांड क्यों करवाए जाते है !!
देश का सफ़ेद पैसा देशीय बैंको में न रखकर विदेशो कला धन बनाकर क्यों रखा जाता है, उसे विदेशो के उन्थान में क्यों लगाया जाता है !!
राजनीती देश के संचालन का सर्वोच्च माध्यम है, फिर भी इस सर्वोच्च स्थान पर “खूनियों”,“भ्रष्टाचारियों” ,”अनपढो” और “बलात्कारियों” को क्यों बैठाया जाता है !!
........................... इत्यादि अनेक ऐसे वाद-विवाद के बिंदु है जिसमे मै और हम की लड़ाई मची हुई है !
आखिर ये कैसा नजरिया है जिसके नीचे खुद को दबाए जा रहे है !
राजनीती के नजरिये पर नजर :-
आखिर इतने वोट किसके लिए पड़ते है “खूनियों”,“भ्रष्टाचारियों” ,”अनपढो” और “बलात्कारियों” के लिए या खुद आत्महत्या करने के लिए ! यहाँ तो राजनीती की परिभाषा ही समझ में नहीं आ पाता और भारत के “वोटर” बन जाते है किस आधार पर, “वोटर” तो ठीक भी है लेकिन यहाँ के “राजनेता” को भी राजनीती की परिभाषा नहीं पता होती और वो मंत्री बन जाता है ! ऐसी स्थिति में बेहद कष्ट के साथ कहना पड़ता है की “हम एक लोकतान्त्रिक देश के निवासी है” ! लेकिन उससे भी ज्यादा काष्ट तब होता है जब हमारा “वोटिंग” का नजरिया हमारे सामने “अंकुरित” होता है ! वो भी ऐसा नजरियाँ जिसमे “देश” के नाम पर वोटिंग का सवाल ही नहीं उठता ! लोग कहते है – वो(राजनेता) “ब्राह्मण”, “क्षत्रिय”, “शुद्र” या “वैश्य” था इसलिए मैंने उसे वोट दिया, वो(राजनेता) भाजपा, कांग्रेस , बसपा ,माकपा, जदयू या सपा का था इसलिए मैंने उसे वोट दिया, वो मेरा रिश्तेदार था इसलिए मैंने उसे वोट दिया वो मेरे घर वोट मांगने आया था इसलिए मैंने उसे वोट दिया .................................................... !
लेकिन इन सबसे ऊपर क्या कभी किसी ने सोचा की कौन है जो “भारत” के लिए खड़ा हुआ है, कौन सा ऐसा प्रत्याशी है जो देश-विकाश में काम कर सकता है ??????
कौन सा ऐसा राजनेता है जो गर्व से कह सके की “मै भ्रष्ट नहीं हूँ”, “मै ख़ूनी नहीं हूँ”...............
मेरे विचार से तो नहीं !! “Right to Reject” की मांग बिल्कुल सही है !
पञ्च साल की मुश्किल से तुरंत लड़ना ज्यादा अच्छा है, विकास तो होगा ! और राजनैतिक पार्टियां केवल उन्ही प्रत्याशियों को मैदान में उतरेंगी जिनकी छवि अच्छी होगी !
आज के भारत को कल से बेहतर बनाने के लिए राजनैनिक नजरिये को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी भूल है, वर्ना आज के सरकार की तानाशाही कल के “भारत” को ...............................!!
नजरिया ही एक ऐसा ब्रह्माष्त्र जो “विकसित भारत” के स्वप्न को हकीकत में बदल सकती है !!

देश तो लोकतान्त्रिक है, लेकिन क्या यहाँ जरा सा भी लोकतंत्र के सम्मान है! देश सर्वोपरि है, देश को प्रधानमंत्री चलाता है, लेकिन प्रधानमंत्री को कोई और यो चलाता है !!
देश में करोड़ो की संपत्ति बड़े-बड़े पार्को, दार्शनिक स्थलों को बनाने में लगा दिए जाते है, फिर भी देश में करोणो लोग भूखे पेट क्यों सोते है !!
हमसे सुरक्षा के नाम से करोड़ो रूपये वसूले जाते है , फिर भी आतंवादियो को देश के अंदर रखकर उनकी सुरक्षा कराकर उन्ही से बम कांड क्यों करवाए जाते है !!
देश का सफ़ेद पैसा देशीय बैंको में न रखकर विदेशो कला धन बनाकर क्यों रखा जाता है, उसे विदेशो के उन्थान में क्यों लगाया जाता है !!
राजनीती देश के संचालन का सर्वोच्च माध्यम है, फिर भी इस सर्वोच्च स्थान पर “खूनियों”,“भ्रष्टाचारियों” ,”अनपढो” और “बलात्कारियों” को क्यों बैठाया जाता है !!
........................... इत्यादि अनेक ऐसे वाद-विवाद के बिंदु है जिसमे मै और हम की लड़ाई मची हुई है !
आखिर ये कैसा नजरिया है जिसके नीचे खुद को दबाए जा रहे है !
राजनीती के नजरिये पर नजर :-
आखिर इतने वोट किसके लिए पड़ते है “खूनियों”,“भ्रष्टाचारियों” ,”अनपढो” और “बलात्कारियों” के लिए या खुद आत्महत्या करने के लिए ! यहाँ तो राजनीती की परिभाषा ही समझ में नहीं आ पाता और भारत के “वोटर” बन जाते है किस आधार पर, “वोटर” तो ठीक भी है लेकिन यहाँ के “राजनेता” को भी राजनीती की परिभाषा नहीं पता होती और वो मंत्री बन जाता है ! ऐसी स्थिति में बेहद कष्ट के साथ कहना पड़ता है की “हम एक लोकतान्त्रिक देश के निवासी है” ! लेकिन उससे भी ज्यादा काष्ट तब होता है जब हमारा “वोटिंग” का नजरिया हमारे सामने “अंकुरित” होता है ! वो भी ऐसा नजरियाँ जिसमे “देश” के नाम पर वोटिंग का सवाल ही नहीं उठता ! लोग कहते है – वो(राजनेता) “ब्राह्मण”, “क्षत्रिय”, “शुद्र” या “वैश्य” था इसलिए मैंने उसे वोट दिया, वो(राजनेता) भाजपा, कांग्रेस , बसपा ,माकपा, जदयू या सपा का था इसलिए मैंने उसे वोट दिया, वो मेरा रिश्तेदार था इसलिए मैंने उसे वोट दिया वो मेरे घर वोट मांगने आया था इसलिए मैंने उसे वोट दिया .................................................... !
लेकिन इन सबसे ऊपर क्या कभी किसी ने सोचा की कौन है जो “भारत” के लिए खड़ा हुआ है, कौन सा ऐसा प्रत्याशी है जो देश-विकाश में काम कर सकता है ??????
कौन सा ऐसा राजनेता है जो गर्व से कह सके की “मै भ्रष्ट नहीं हूँ”, “मै ख़ूनी नहीं हूँ”...............
मेरे विचार से तो नहीं !! “Right to Reject” की मांग बिल्कुल सही है !
पञ्च साल की मुश्किल से तुरंत लड़ना ज्यादा अच्छा है, विकास तो होगा ! और राजनैतिक पार्टियां केवल उन्ही प्रत्याशियों को मैदान में उतरेंगी जिनकी छवि अच्छी होगी ! आज के भारत को कल से बेहतर बनाने के लिए राजनैनिक नजरिये को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी भूल है, वर्ना आज के सरकार की तानाशाही कल के “भारत” को ...............................!!
नजरिया ही एक ऐसा ब्रह्माष्त्र जो “विकसित भारत” के स्वप्न को हकीकत में बदल सकती है !!
भारतीय क्रिकेट टीम की इस परिसथिति को दयनीय कहे या सराहनीय ?- अंकुर मिश्र "युगल"
आखिर अब वो समय आ गया है जब भारतीय क्रिकेट को “बदले की भावना” का अंकुरण करना अनिवार्य है ! क्रिकेट वो भी भारतीय क्रिकेट, जिसके १२५ करोण उपासक है जहां की क्रिकेट आधारित फिल्म-“लगान” को कुछ समय पहले ही विश्व सिनेमा की सर्वोत्तम ५० फिल्मो में जगह मिली है, लेकिन भारतीय क्रिकेट का वर्तमान कुछ गर्त में दिख रहा है ! अब “लगान” की कहानी दोहराने का समय आ गया है ! अभी हाल ही में भारतीय क्रिकेट ने जिस कठिनतम समय की ललकार को झेला है, विचारक कहते है की वो भारतीय क्रिकेट इतिहास का सबसे कठिन समय था, उस कठिनतम समय में भारत के खिलाफ सारी परिस्थितियां भी थी, सभी खिलाडी चोटिल थे और “अंग्रेजी” टीम अपनी धरती पर हमारी टीम पर भरी थी ! हमें इस ऐतिहासिक हार का एहसास कुछ खुशियों की वजह से नहीं हुआ , धन्यवाद हो उन- “गैरी क्रिस्टन” का जिन्होंने हमें ऐसा बना दिया था की हम एक साथ सभी श्रेणियों के क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ हो गए थे , लेकिन उनके भारतीय क्रिकेट को छोडते ही हमें एक खतरनाख “झटका” लगा ! इसमें किसी को दोष भी नहीं दे सकते !
लेकिन अब पुनः हमारे पास ऐसा मौका है जिसके जरिये हम अपनी साख पुनः पा सकते है, इंग्लैण्ड का भारत दौरा है ,हमारे लिए सुनहरा मौका है ! अब उस धर्म की रक्षा करनी है जिसे हमने खुद अपने लिए बनाया है, हमें इन दौरे में सभी सकारात्मक परिस्थियां प्राप्त होगी, हमारा देश है , हमारे लोग है , हमारे समर्थक है, हमारे मैदान है और अब “हम” खेल रहे है !
लेकिन अब एक विपरीत परिस्थिति है अब न ही अन्ना हजारे का अनशन है और न ही बेकार टीम ! और भारतीय “मिडिया” भी जगी हुयी है यदि अब हारे तो “समर्थक और मीडिया” दोनों की टिप्पणियों के साथ-साथ कुछ अराजकता भी झेलनी पड़ सकती है! भारतीय क्रिकेट टीम की इस परिसथिति को दयनीय कहे या सराहनीय ????
परिणाम कुछ भी हो ,क्रिकेट धर्म के उपासक टीम से एक अच्छी विजय की कामना करते है, विजय दशमी का समय भी है विजय की कामना तो “धोनी” भी कर रहे होंगे , उनकी कामना पुरे देश की कामना है, अब तो विजय की जरुरत सबको है !
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लेकिन अब पुनः हमारे पास ऐसा मौका है जिसके जरिये हम अपनी साख पुनः पा सकते है, इंग्लैण्ड का भारत दौरा है ,हमारे लिए सुनहरा मौका है ! अब उस धर्म की रक्षा करनी है जिसे हमने खुद अपने लिए बनाया है, हमें इन दौरे में सभी सकारात्मक परिस्थियां प्राप्त होगी, हमारा देश है , हमारे लोग है , हमारे समर्थक है, हमारे मैदान है और अब “हम” खेल रहे है !
लेकिन अब एक विपरीत परिस्थिति है अब न ही अन्ना हजारे का अनशन है और न ही बेकार टीम ! और भारतीय “मिडिया” भी जगी हुयी है यदि अब हारे तो “समर्थक और मीडिया” दोनों की टिप्पणियों के साथ-साथ कुछ अराजकता भी झेलनी पड़ सकती है! भारतीय क्रिकेट टीम की इस परिसथिति को दयनीय कहे या सराहनीय ????
परिणाम कुछ भी हो ,क्रिकेट धर्म के उपासक टीम से एक अच्छी विजय की कामना करते है, विजय दशमी का समय भी है विजय की कामना तो “धोनी” भी कर रहे होंगे , उनकी कामना पुरे देश की कामना है, अब तो विजय की जरुरत सबको है !
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क्या बात है !! सरकार.... अंकुर मिश्र"युगल"

क्या बात है !! सरकार ,
फिर एक और "हार",
कहाँ व्यस्त हो आप,
कुछ तो सोचो जनाब !!
हम भी यहीं है,
आप भी यहीं है,
पर हम ही क्यों हर बार !!
बोले भी तो फिर वही,
हम कुछ करेंगे,
पर ये तो बताया ही नहीं
करेंगे पर कब करेंगे !!
हमें खैरात नहीं
अपना हक चाहिए ,
हमें वक्तव्य नहीं,
सुरक्षा चाहिए !!
कुछ तो करो !! सरकार ,
क्या आपको नहीं है हमारी जरुरत ,
यदि नहीं तो ठीक है,
पर किसी और को तो है,
उन "अंकुरो" की तो सोचिये,
जिन्हें है हमारी जरुरत !!
क्या लगते है आपके ,
"अफजल" और "कसाब"!
क्यों करतें है, उन पर
हमारा पैसा बर्बाद !!
कुछ तो बोलो !!! सरकार
आपको रोना नहीं आता,
पर सुनना तो आता होगा,
उन चीखो को तो सुनिए,
जिनमे दुःख होता है
अपनों को खोने का !!
कुछ तो करो !!सरकार!!
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