“बाल यौन शोषण” में कितनी संजीदगी और चाहिए हमें : अंकुर मिश्रा” युगल”

“सत्यमेव जयते” के दूसरे मुद्दे की जितनी सराहना की जाये कम है, समस्या का समाधान आसान है लेकिन शुरुआत की फिक्र है, वैसे विषय ऐसा है जिसका जिम्मेदार समाज का हर जिम्मेदार व्यक्ति है, कुछ अपने अधिकारों को भूल जाते है और कुछ इनका प्रयोग ही नहीं कर पाते और शिकार हो जाता है वो “नादान” जिसे उस शोषण की परिभाषा भी नही पता ! उस “नन्ही सी जान” का विश्वास कोई नहीं करता जो झूट बोलना भी नहीं जनता, यही वास्तविकता है हमारे समाज की, या उस “नर्क” की जहां ऐसे कुकर्म या अत्याचार छोटे छोटे बच्चो पर होते है ! कुछ समय पहले एक सर्वे हुआ जिसमे यह पता चला की भारत की कुल नन्हे बच्चो के 53% बच्चो का “यौन शोषण” बचपन में हो जाता है, यह सर्वे दिल-दहला देने वाला तथ्य सामने लाया, हर २ बच्चो में से एक बच्चा इस अत्याचार का शिकार हो चुका होता है, और “अत्याचारी” कौन होता है: हमारे हमज का एक “सभ्य” नागरिक जिसकी समाज पूजा करता है ! यही काला “सत्य” है हमारे “समाज” का !
इस समस्या को लोग आसान बताते है, और अत्याचारियो को इसका लाभ मिलता रहता है, उनके इस क्रियाकलाप पर कोई फर्क भी नहीं पड़ता, जरुरत है ऐसी जागरूपता की समाज के इस अत्याचार को रोक सके और यह संभव है “पूरे समाज” की जागरूपता से ! “सत्यमेव जयते” के माध्यम से कुछ ऐसे व्यक्तितो के विचार बाहर निकल कर आये, जिनका बचपन दिल-दहला लेने वाला था ! लेकिन उनके अंदर उस “शक्ति” का समावेश था जिसके जरिये उन्होंने उस लदी को लदा जिसमे उनके “माता-पिता” ने भी उनका साथ नहीं दिया ! लेकिन जिस तरीके से उन्होंने अपने दर्दो को जनता के सामने बताया उससे भारत की जनता को जगरूप होकर, इन 53% बच्चो की जिंदगियां बचानी होगी जिन्हें हर साल किसी न किसी प्रकार यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है ! “प्रमुख बात” इसके लिए “हमारे महान भारत” में कोई कानून नहीं है ! अतः जो करना है हमें ही करना है , “सत्यमेव जयते” के माध्यम से कुछ प्रमुख बिंदु सामने निकल कर आये जिनके जरिये हम इस अत्याचार को रोकने में कामयाब हो सकते है :-
१. हमें अपने बच्चो को ऐसी सभी चीजे बता देनी चाहिए जिनकी जानकारी उनके लिए आवश्यक है !
२. हमें उनके साथ हर हफ्ते एक वार्तालाप करना चाहिए जिसमे इस तरीके के अत्याचार से रुकने के तरीको की बात हो !
३. हमें उनकी उस बात का विश्वास करना चाहिए जिसमे वह किसी भी प्रकार के शोषण की बात कहे !
४. बच्चे की बात को कभी नजरंदाज न करे ! उस पर विचार जरुर करे, वर्ना कुछ भी हो सकता है !

इत्यादि !
इन बातों की जरुरत है आज के समाज को “आज” की वास्तविकता से अवगत करने के लिए ! समस्या का हल जागरूपता है ! बच्चो से ज्यादा “माता-पिता” को जगरूप होने की जरुरत है !
बच्चो को “1098” हमेशा याद दिलाते रहे, यह एक ऐसा जरिया है जिसके जरिये बच्चा अपनी सहायता के लिए किसी को गुहार लगा सकता है ! दस-नौ-आठ (Ten-Nine-Eight) !!

"सत्यमेव जयते" अभिव्यक्ति सत्य को सामर्थ्य दिलाने की : अंकुर मिश्र “युगल”

अभिनेता आमिर खान ने जिस जोश से “सत्यमेव जयते” की की शुरुआत की वो वास्तव में सराहनीय है ! देश के प्रत्येक व्यक्ति को इसका इंतजार था, देखा जाये तो इसमे इंटरटेनमेंट नहीं था लेकिन मुद्दा था ! इन सबके बावजूद लोगो ने इस कार्यक्रम की जो सराहना की वो वास्तव में ये दिखाती है “मेरा भारत वास्तव में महान है”! जनता का ध्यान मुद्दों की तरफ लेन की देर है, जनता हर मुद्दे से लड़ने को तैयार है ! प्रथम शो के मुद्दे की असीमित सराहना भी कम है ! “कन्या भ्रूण हत्या” जो आज की प्रमुख समस्या है ! इस शो के दौरान ऐसे-ऐसे किस्से बहार निकल के आये जो वास्तव में दिल दहला देने वाले थे ! डाक्टर, इंजिनिअर, व्यवसायी, अध्यापक एवं एक साधारण नागरिक सभी जिम्मेदार है इस खतरनाख समस्या के ! समस्या का हिस्सा तो बेचारी एक “माँ” होती है लेकिन उसे शिकार बनाने वाले कितने होते है और इस समय में वो ये भूल जाते है की आखिर इस दुनिया के अविष्कार में “माँ” की कितनी भागेदारी है ! और उसी के अंश को समाप्त करने की थान लेते है वो !!!!! माँ के लिए एक छात्रा ने कविता लिखी :-
'माँ' जिसकी कोई परिभाषा नहीं, जिसकी कोई सीमा नहीं,
जो मेरे लिए भगवान से भी बढ़कर है
जो मेरे दुख से दुखी हो जाती है
और मेरी खुशी को अपना सबसे बड़ा सुख समझती है
जिसकी छाया में मैं अपने आप को महफूज़
समझती हूँ, जो मेरा आदर्श है
जिसकी ममता और प्यार भरा आँचल मुझे
दुनिया से सामना करने की ‍शक्ति देता है
जो साया बनकर हर कदम पर
मेरा साथ देती है
चोट मुझे लगती है तो दर्द उसे होता है
मेरी हर परीक्षा जैसे
उसकी अपनी परीक्षा होती है
माँ एक पल के लिए भी दूर होती है तो जैसे
कहीं कोई अधूरापन सा लगता है
हर पल एक सदी जैसा महसूस होता है
वाकई माँ का कोई विस्तार नहीं
मेरे लिए माँ से बढ़कर कुछ नहीं।

इस शो के बात कई बातें बहार निकल के आयी: क्या भारत माँ केवल लडको की माँ है? क्या लड़कियों पर होने वाले इस अत्याचार के लड़के ही जिम्मेदार है? क्या हमारा दायित्व नहीं है की हम “माँ” के अंश का बचाए ? इत्यादि अनेक तरह के प्रश्न बहार निकल में आये ! अनेक तरह की सांखकीय देखने के बाद देखा गया की 90% इस तरह के अत्याचार शिक्षा की कमी के कारन हो रहे है, और लगभग इतने ही मुद्दे गाँवो से आते है जहां जागरूपता की कमी है ! ........... इस मुद्दे पर मैंने कई जगरूप नागरिको से बात की जिसमे अनेक आरोप एवं हल निकल के आये :

१. मेरे एक दोस्त ने कहा की “पति” चाहे तो इस समस्या को समाप्त किया जा सकता है !
२. एक डाक्टर ने ही कहा की यदि डाक्टर ही इस जाँच से मना कर दे तो इस समस्या से निजात पायी जा सकती है !
३.एक व्यंसयी ने कहा की लड़की ही इतनी सुदृण हो जाये की वो इस तरह की किसी जाँच से सहमत न हो यदि उस पर दबाव डाला जाये तो उसे पुलिस और अपने “माता-पिता” का साथ लेना चाहिए !
इत्यादि अनेक सुझाव बहार निकलकर आये लेकिन समस्या अभी भी समस्या ही है, एक कमरे में बैठकर विचार करने से कुछ नहीं होने वाल बहार निकल कर इसके लिया कुछ करना पड़ेगा ! ऐसी ही समस्या से लड़ रहे एक संगठन “स्नेह-हालया” के कई कार्य सराहनीय है उन्होंने कई सराहनीय कार्य किया है, अगर आपको इस समस्या की समाप्ति के लिए इस लदी का हिस्सा बनना है तो अपने घर से ही इस खतरनाख समस्या को समाप्त करने का प्रयास करिये !
“माँ” का आशीर्वाद हमशा आपके साथ होगा !!

“राष्ट्रपति” का पद किसी दल का “मंत्रिपद” नहीं है मान्यवर : अंकुर मिश्र "युगल"

बात राष्ट्रपति पद की जो किसी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण पद होता है!
एक लोकतान्त्रिक देश में प्रधानमत्री के पद को जिस गरिमा से देखा जाता है वास्तव में “राष्ट्रपति” का पद उससे भी ऊँचा होता है, उसकी गरिमा एवं उस पद पर बैठा व्यक्तित्व देश को किसी दूसरे देश के सामने प्रस्तुत करता है, देश की प्रथम व्यक्ति की तुलना उस व्यक्ति को दी जाती है ! ऐसे ही महत्वपूर्ण पद के लिए हमारे देश में चुनाव होने वाले है, लेकिन चुनाव पद्दति को देखने से जो लचीलापन एवं भ्रश्ताचारिता समझ में आती हो वो वास्तव में द्रिश्नीय है, देश को राष्ट्रपति पद में जो व्यक्तित्व आज तक प्राप्त हुए है उनमे से “अब्दुल कलाम” एवं “राजेंद्र प्रसाद” ही अतुलनीय थे, यह एक ऐसा पद है जहां किसी राजनैतिक व्यक्ति को नही बैठालना चाहिए ! लेकिन भारत के “राष्ट्रपति” चयन की जो प्रक्रिया है उससे किसी नैतिक व्यक्तित्व को पहुचाना मुश्किल ही लगता है! इस महत्वपूर्ण पद के चयन के लिए देश की राजनैतक डालो में जिस तरह का वाद विवाद, घमासान मचा हुआ है, उससे यही लगता है की “राष्ट्रपति” का पद किसी दल का “मंत्रिपद” हो ! राजनैतिक दलों का ये घमासान देश के इस पद के लिए उपयुक्त व्यक्तित्व को यहाँ पहुचने में वाधा बन जाता है, और देश को ऐसा राष्ट्रपति मिल जाता है जो देश का नहीं बल्कि किसी राजनैतिक दल विशेष का होता है! २०१२ राष्ट्रपति की चुनाव में “कलाम” जैसे महान व्यक्तित्वो के होने के बावजूद राजनेता ऐसे व्यक्तियों को चुनने में लगे है जो राजनितिक पृष्ठभूमि से सने हुये है , और भरत के प्रत्येक राजनेता की पृष्ठभूमि तो लगभग प्रत्येक नागरिक को पता होगी ! राष्ट्रपति के चुनाव पद्दति में परिवर्तन करना तो कथिक कम है लेकिन क्या जनता से इस पद के उम्मीदवार के लिए “मतदान” नहीं होना चाहिए ! राजनेताओ को इस पद में तो राजनीती नहीं करनी चाहिए, वो सुबक की चाय से रत के खाने तक के हर चीज में राजनीती करते है लेकिन देश के इस सर्वोच्च पद के लिए भ्रष्ट राजनीती देश को किस कठघरे में खड़ा करेगी ये तो भविष्य ही बताएगा !

भ्रष्टाचार "लोकपाल" से नहीं "घर" से ख़त्म होगा -"कलाम ": अंकुर मिश्र "युगल"

भ्रष्टाचार "लोकपाल" से नहीं "घर" से ख़त्म होगा : अंकुर मिश्र "युगल" पूर्व राष्ट्रपति एवं महं वैज्ञानिक अब्दुल कलाम द्वारा दिए गए संदेश में कहा गया की यदि भारत से भ्रष्टाचार ख़त्म करना है तो केवल "लोकपाल: पर्याप्त नहीं है उसके लिए हर छोटे से छोटे बच्चे को जगरूप होना पड़ेगा ! हर बच्चे को अपने माता-पिता को भ्रष्टाचार करने से मना करना होगा , यही एक ऐसा उपाय है जिसके जरिये देश में भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है , "लोकपाल" से केवल देश के जेलों को भरा जा सकता है लेकिन यदि हर घर से भ्रष्टाचार का खात्मा हो जाये तो जेलों की जरुरत नहीं पड़ेगी, और हमें देश को बचाने के लिए जरुरी ही नहीं की जेलों को ही भरा जाये उससे कानून व्यवस्था में भी फर्क पड़ेगा और समस्या समस्या ही बनी रहेगी ! इन वक्तव्यों को लोकपाल के लिए संघर्ष कर रहे "अन्ना हजारे" ने भी स्वीकार किया ! वैसे इन वक्तव्यों में ताकत भी है! "अब्दुल कलाम " की पुस्तक "विसन-२०२०" भी इन्ही सब पर जोर देती है, देश के ऐसे महानायक जो २०१२ में होते हुए भी २०२५ की सोचते है, जिनका अनुभव देश के प्रत्येक क्षेत्र में है, देश को परमाणु शक्ति से ओत-प्रोत कर दिया, बच्चो के प्यारे "महान वैज्ञानिक" देश की हर समस्या में साथ देने वाले ,, उनके ये वक्तव्य हर छोटे बच्चे को प्रोत्साहित करेगे ! बच्चे ही परिवार का वो हिस्सा होते है जिनकी किसी भी बात को घर वाले मान सकते है ! देश की सबसे बड़ी समस्या "भ्रष्टाचार" से लड़ाई के लिए उनके इन वक्तव्यों से देश को काफी सहायता मिलेगी ! देश से बुरे ह्लातो को खात्मा करना है न की बुरे आदमी बनाना, अतः जेल भरने से कोई फायदा नहीं है ! सबसे छोटी इकाई "घर" ही ऐसा तथ्य है जिसके जरिये जिस समस्या ने निपटा जा सकता है !

“करो या मरो” की वास्तविकता : अंकुर मिश्र "युगल"


शहीद दिवस के अवसर में कुछ ऐसे व्यक्तित्वो से मिलन हुआ जिनका कितना भी व्याख्यान किया जाये कम है ! हिंदी साहित्य की महान प्रतिभा “डा. मदनलाल वर्मा ‘क्रांत’ जी” एवं आई.ए.एस.“डा. सिन्हा जी”! इन महान व्यक्तित्यो के किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है ! इतिहास की महान पुस्तकों के इन रचयिताओ ने “शहीद दिवस” में कुछ ऐसी महान बातें बताई जो वास्तव में सत्यता के बावजूद बहुत ही कम लोगो को मालूम है !
महात्मा कहे जाने वाले मोहनदास कर्म चंद्र गाँधी ने आखिर किस अहिंसा की शक्ति से देश को आजाद कराया, वो भारत का नहीं बल्कि अग्रेजो का कम कर रहे थे ! क्या उनके किसी भी आन्दोलन से लगा की “आजाद भारत” की सोच रखते थे ! खुद को राष्ट्रपिता कहलवाने से भी नहीं सकुचाये , पिता तो निर्माता होता है क्या वो भारत के निर्माता थे ????
अनेक ऐसे आंदोलनों का हिस्सा बने जिनका भारत की आजादी का कोई वास्ता नहीं था ! क्या जरुरत थी नमक आन्दोलन की ? 1942 में नारा दिया “करो या मारो“ क्या कुछ असर हुआ इस नारे का अंग्रेजो पर ! या ये नारा उन्ही के लिए था ???
नारा था “करो या मारो” लेकिन उसमे भी अहिंसा का पाठ था, अंग्रेजो के खिलाफ अहिंसा की सीमा में रहकर लड़ो और उसके बाद मर जाओ , कही भी “मारने” का कोई शब्दांश नहीं था !!
क्या इन सबके बावजूद “महत्मा गाँधी” आजादी के महानायक थे ????
या महानायक वो था जिसने जिसने ३२ वर्ष की आयु में फंसी का फंदा चूमा जिसने महलों को छोडकर कारावासो में पना अधिकांश समय बिताया ! जिसने केवल सोचा नहीं उसे कर दिखाया !!
इन सब प्रश्नों के उत्तर हमें सोचने है, देश हमारा है देश का इतिहास हमें लिखना है ,
गहन चिंतन और इतिहास मंथन से वास्तविकता सामने जरुर आयेगी !!
कुछ पंक्तियाँ “डा. मदनलाल वर्मा” जी की :
भगत सिंह सुखदेव राजगुरु की कुर्बानी याद करें,
वैसी शक्ति हमें भी दे यह माँ से हम फरियाद करें;
नव-सम्वत्सर पर सबको है पावनतम संदेश यही-
इस जीवन का एक-एक क्षण व्यर्थ न हम बर्बाद करें.

Sorry !! आपकी यह वास्तविकता थोड़ी कड़वी है : अंकुर मिश्र “युगल”

दिल्ली (एन.सी.आर.) के कालेजो की प्रसिद्धि और मान्यता तो विश्व्प्रसिध्ध है, लेकिन वास्तविकता कुछ और भी हो सकती है ऐसा सोचना “गलत” तो नहीं अपितु सत्यता से ज्यादा सत्य होगा ! अधिकतर कालेज शिक्षा के लिए नहीं बल्कि केवल “डिग्री” के लिए खुले हुए है जिनका काम केवल “डिग्री” देना ही है, विभिन्न प्रदेशो से आने वाले वाले छात्र-छात्राओं को लुभाने के अनेक लाजबाब तरीको का उपयोग कैसे करते है कोई अच्छी तरह से सीख सकते है ! स्ववित्तपोषी कालेजो के मालिकों का मलिकानापन कालेज में हमेशा झलकता है ! विशाल इमारतों को सुंदरता के पलड़े में बैठाकर कालेजो को जिस तरह प्रस्तुत किया जाता है उसमे यही झलकता है “सुंदरता की इससे अच्छी कोई दूसरी ईमारत हो ही नहीं सकती” ! लेकिन अंदर के खोखलेपन का अनुभव होने पर जिस अनुभव की अनुभूति होती है वास्तव में अतुन्नीय होती है ! वैसे वास्तविकता तो ये भी है शिक्षा और अशिक्षा प्राप्त करने आने वाले छात्रों के प्रतिशत भी ५०-५० ही होता है ! परन्तु कालेज किन ५०% छात्रों के साथ चल रहा है इसका अनुभव कोई अपनी पूरी डिग्री में नहीं कर सकता ! भारत में “इंजिनीरिंग” सबसे अतुलनीय “डिग्री” मणि जाती है इसलिए सभी का सपना होता है “इंजिनियर” बनना, इसलिए घर से किसी भी तरह इंजीनियरिंग के द्वार में प्रवेश कर ही जाते है फिर वो कोई भी कालेज हो ! यही कहानी है दिल्ली (एन.सी.आर.) के कालेजो की जहां विद्यार्थी इसलिए आते है की ये भारत का तकनिकी केंद्र है ! यहाँ के विश्वविद्यालयो से डिग्री करने के बाद “बेरोजगारी” जैसे शब्दों का सुनना समाप्त हो जायेगा ! लेकिन 100% Placement”.. Guarantee..
“TAG” वाले कालेजो की वास्तविकता क्या होती है यहाँ ही पता चलता है ! यहाँ हजार से ऊपर कालेज निर्मित है जिनमे लाखो की संख्या में विद्यार्थी अपना जीवन बनाने का प्रयास कर रहे है ! तकनिकी , मैनेजमेंट, फार्मेसी एवं अन्य अनेक कोर्सो में लोग रोजगार पाने की कोशिश कर रहे है ! और इसमें सफलता भी पा रहे है लेकिन असफलता का प्रतिशत कुछ ज्यादा ही है !
आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ???
एक छात्र/क्षात्रा लाखो की संपत्ति खर्च करके यहाँ व्यावसायिक शिक्षा के लिए आता है लेकिन उस पर क्या बिताती है जब वो कोर्स समाप्ति के बाद अपने को उस स्थिति से भी बुरा पता है जहाँ से वो आया था !!
आखिर इसका जिम्मेदार कौन ??
यहाँ उन छात्रों की बात भी नहीं जिनकी शैक्षिक-स्थिति सही नहीं लेकिन उनका जिम्मेदार कौन जिनको
100% Placement”.. Guarantee.. के “TAG” के बव्जूओद कालेज रोजगार नहीं दिला पा रहा !!
और उसके लिए जिम्मेदार कौन है जिन्हें इस विशाल “IT-Hub” के बावजूद नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता है !!
जिम्मेदार कोई भी हो (सरकार, कालेज-मैनेजमेंट ....या और कोई ) लेकिन नुकसान उस छात्र/छात्रा का ही होना है , जो देश का भविष्य हो सकता है !!

अपना दीप जलाना होगा : अंकुर मिश्र "युगल"


खुली चुनौती देता हमको , बढ़ता हुआ अँधेरा !
पल-पल दूर जा रहा हमसे, उगता हुआ सवेरा !!
निशा नाचती दिशा-दिशा में उडी तिमिर की धुल !
अपना दीप जलना होगा , झंझा के प्रतिकूल !!
आत्मा की चिर दीप्त वर्तिका, को थोडा उकसा दो !
मांगो नहीं ज्योति जगती से, लौ बन के मुस्का दो !!
जगमग जगती के “अंकुरण” से, खिले ज्योति के फूल !
माथे से फिर विश्व लगाये, इस धरती की धुल !!
अमा ,क्षमा मांगे भूतल से, भागे सघन अँधेरा !
अवनी का अलोक स्तंभ, बन जागे भारत मेरा !!
आर्य संस्कृति के परवाने, आओ सीना ताने !
दीप बुझाने नहीं , ज्वलित पंखो से दीप जलाने !!
तब समझूंगा तुम जलने की, कितनी आग लिए हो !
और दहकते प्राणों में, कितना अनुराग लिए हो !
........ ""श्री लाखन सिंह भदौरिया जी "

भीड़ का मतलब “वोट” नहीं होता “राजकुमार जी” : अंकुर मिश्र ”युगल”


उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनावो ने ऐसे रहस्यों का खुलासा किये है जिनका खुलासा केवल जनता ही कर सकती थी !
जिस तरीके से पिछली पंचवर्षीय में “सपा” सरकार का विकल्प “बसपा” बनी थी ठीक उसी तरह इस पंचवर्षीय में जनता ने परिवर्तन ही सबसे अच्छा विकल्प समझा और “सपा” को “बसपा” का अतुलनीय विपल्क घोषित किया ! वैसे परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है ! जनता विकास में भी परिवर्तन ही चाहती है और उसने वही किया ! इस चुनाव में सबसे बड़ा दृश्य ये था की जनता जगरूप हो चुकी है इसी वजह से इस बार वोटो का प्रतिशत भी बढ़ा ! इसे “अन्ना” मुहीम का परिणाम कहे या जनता की जागरूपता ?? कुछ भी बेहतरता भारतीय राजनीती में ही अति है !! ये तो बात थी, प्रदेश की दो बड़ी पार्टियों और उ.प्र. राजनीती की ! वाही नजर डाले देख की दो बड़ी पार्टियों : “भाजपा और कांग्रेस” की तो दृश्य कुछ अदृश्य सा लगता है ! दोनों पार्टियों ने अपने अपने दिग्गजों को लेकर उ.प्र. की राजनीती की लेकिन परिणाम कुछ विपरीत ही आये ! वैसे भाजपा के पास ज्यादा खोने के लिए कुछ था नहीं क्योंकि उनका ज्यादा कुछ दाव पे नहीं था ! लेकिन कांग्रेस ने उ.प्र. की राजनीती जिस “राजकुमार” को दांव में लगाकर की वो जरुर द्रिश्नीय था ! कांग्रेस ने विधानसभा चुनावो में दांव में लगाया “राहुल गाँधी” को, राहुल गाँधी ने प्रदेश में 2 महीनो में 211 सभाए कर डाली ! और
इन सभाओ में लोगो की भीड़ “करोणों” में थी,
राहुल गाँधी ने अपनी छवि के विपरीत “भाषण” दिए !
जतिवाद्ता, स्थानवादिता का सहारा लिया जो “जनता” उनसे भी पूछ सकती थी ! लेकिन जनता शांत रही और उसी वाही जनता जो राहुल का भाषण सुनने करोणों में आती थी उसने कांग्रेस को विधानसभा में “पचासा” भी न मरने दिया ! उसने अपने अनुसार अपनी सरकार चुनी और एक अन्य युवा को मौका देना ज्यदा उपयोगी समझा !
“अखलेश यादव” की अग्निपरीक्षा है इस बार और देखते है वो इसमें कितने खरे उतरते है , उन्हें याद रखना होगा आंगे “लोकसभा” चुनाव है!

"मतदान” का अधिकार अति अनिवार्य : अंकुर मिश्र "युगल"



निरंतर किसी व्यक्ति विशेष को आधार बनाकर उसे उस संज्ञा से परिभाषित करना जिससे उसे तनिक भी फर्क नहीं पढ़ने वाला, किस बात को दर्शाता है ! शत प्रतिशत कोई भी कही भी नहीं दिखा सकता और जिससे आप इस तरह की कल्पना करते हो तो उस व्यक्ति में कोई कमी नहीं है कमी आप में है !!!
आज “फेसबुक” जो वास्तव में एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसके जरिये हम सभी सकारात्मक तथ्यों को जानकारी कर सकते है लेकिन एक सीमित प्रयोग से !! इंटरनेट एक सूचना का असीमित माध्यम है जिसके जरिये हम दुनिया से और दुनिया हमसे जुडी रह सकती है लेकिन एक सीमित और सकारात्मक प्रयोग से ! कुछ समय पहले कुछ समूहों ने और कुछ व्यक्तित्यो ने इन पर “केस” किया ! कारण यहाँ के नकारात्मक वस्तुए जो एक साधारण से वातावरण को दूषित करती जा रही है !
यह सभी जानते है किसी व्यक्ति विशेष में कोई बुराई नहीं होती है न ही किसी समूह में, कमी हमेशा उनके क्रियाकलाप के तरीको में होती है ! और तरीको के विरोध का जो रवैया जनता अपनाती है वह उससे भी ज्यादा भयावह होता है ! वह केवल उन तथ्यों पर ध्यान देकर विचार करती है जिनमे व्यक्ति की बुराई झलकती है, उनकी स्थिति को भी समझना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए!
यहाँ आज की भारतीय संस्कृति को जिस आधार ने उल्लंघित किया किया है वह आज की सबसे प्रमुख और सहायतार्थ तथ्य “इंटरनेट”. जिसमे कई तरह की अश्लील सामग्री परोशी जा रही है जिससे व्यक्ति विशेष या समूह की ही नहीं बल्कि पुरे देश की धूमिल छवि विश्व के सामने प्रकट होती है और करने में किसी बाहरी ताकत का नहीं बल्कि हम सभी का हाथ है ! इस बार खतरा सुरक्षा, धन, सरकार में नहीं बल्कि देश की संस्कृति में है ! विश्व के सामने “फेसबुक” या अन्य “सोशील नेटवर्किंग साइट्स” के जरिये जो भद्दी छवि देश के नेताओ की प्रस्तुत की जा रही है उससे उनके कर्मो को तो कोई नही लेकिन देश की छवि को बहुत फर्क पड़ने वाला है ! आखिर उस सामग्री मतलब है क्या ??
नेताओ के प्रति आक्रोश !! वैसे उस आक्रोश को व्यक्त करने के और भी तरीके है जो साफ स्वच्छ है और उनसे कुछ सुधार भी हो सकता है !! नेताओ और उनके क्रियाकलापों के प्रति आक्रोश को प्रकट करने का सबसे बड़ा आधार है हमारा सबसे बड़ा अधिकार “वोट” !!
यही वो ताकत है जिससे देश में बदलाव आ सकता है, लेकिन जनता उसी के प्रति जगरूप नहीं है, जब चुनाव आते है तब उस अधिकार को प्रयोग न करके उसी को बढ़ावा देते है जिसे रोकने के लिए खुद और देख को अभद्रता के गलियारे में खड़ा करते है !!
देश उत्थान के लिए “मतदान” और “मतदाता” के अधिकारों को समझकर 100% मतदान की कोशिश करें, ऐसा करने से देश-पतन वाले क्रियाकलापों की जरुरत नहीं पड़ेगी !!

क्या उसने “मुझे” ये कहा तो ये लो मेरा “जबाब” !! : अंकुर मिश्र “युगल”

राजनैतिक दुर्घटनाओ से ग्रसित हिंदुस्तान में चुनावो की श्रंखला की शुरुआत हो चुकी है, और इस श्रंखला में कई राज्यों के चुनाव पंक्तिबद्ध है,पुरातन राजनीती के अनुसार चुनाव प्रचार की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है, चुनाव देश के है, सरकार देश व् प्रदेश के लिए बननी है, और उसमे प्रमुख भागीदारी भी जनता की है और उसी को चुनना है कौन हम पर राज्य करेगा , इन सबके बावजूद राजनेताओ का मुद्दा कुछ अलग ही दिखाई दे रहा है, दुनिया का सबसे बड़ा “लोकतंत्र” भारत देश में है, दुनिया की सबसे बड़ी राजनीती भारत में होती है लेकिन इसका सबसे बड़ा खोखला-पन भी दुनिया में धीमे-धीमे प्रसिद्द होता जा रहा है !




दुनिया का हर देश एक ही मुद्दा रखता है “विकास” !!
कहने को तो ये मुद्दा भारत में भी है और राजनेताओ की सुने तो वो कहते भी है की हमारी पार्टी देश के “विकास” को लेकर बहुत चिंतित है लेकिन यह वाक्य कितने सही है और कितने गलत ???? ये एक यहाँ का निवासी ही बता सकता है !यह किसी विशेष राजनैतिक दल की बात नहीं है भाजपा हो !!
कांग्रेस हो !! माकपा हो !! सपा हो !! बसपा हो !!
या और कोई सा भी राजनैतिक दल सभी के चुनाव के पहले या बाद की प्रक्रियाये एक ही तरह की होती है ये ऍम जनता को भी पता है !
आज की राजनीती ही देख लो चुनाव प्रचार की रैलियां जोरो पर है , चुनाव प्रचार के ऐसे सहारे लिए जाते जो वास्तव में अतुलनीय है ! पार्टी प्रवक्ता या पार्टी प्रचारक प्रचार में “विकास” शब्द छोरकर बांकी सभी अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करते है एक दूसरे के ऊपर आरोपो का प्रत्यारोपण जिनसे जनता का कोई मतलब नहीं है !! एक कहेगा “क्या उसने “मुझे” ये कहा तो ये ले मेरा “जबाब” ! जबाब की उस भाषा में होगा जो ये सिद्ध कर देता है की हमारे राजनेता कितने “शिक्षित” है ! वैसे भी भारतीय लोकतंत्र में ये नियम “पास” हो चूका है की कोई भी “क्रिमिनल” चुनाव लड़ सकता है अब इस भाषा से ये भी सिद्ध होता है की कोई भी “गवांर” चुनाव लड़ सकता है !!
क्या किसी राजनैतिक पार्टी का मुद्दा "विकास" भी है या फिर सबका एक ही मुद्दा है एक दूसरे के ऊपर पलटवार ??
क्या कोई उस 99% जनता की भी बात करेगा जो कुल संपत्ति के 1% में पल रही है या फिर उन्ही 1% की बात करोगे जो 99% संपत्ति के मालिक है ??
क्या अपने विकास की चिंता को छोड़कर 125 करोण लोगो के विकास के बारे में नहीं सोच सकते ??
अरे देश के आकाओ आखिर देश की जनता को समझते क्या हो ??
क्या भूल गए वो एक बार जग गई तो भारत हिल जायेगा, चुनाव में सम्भलियेगा जरा कही जनता जाग न जाये और आपका विकास रुक न जाये ??