बंद कमरों में बहस तो नामर्द भी कर सकते है लेकिन सीमा पर एक मर्द ही खड़ा हो सकता है : अंकुर मिश्र "युगल"

देश किस किस तरह से गिराया जा रहा है और हम किस तरह से गिरा रहे है ! सोचनीय है..  :( 
हमारा पडोसी हमारे घर  घुसकर मार जाता है हम देखते और बात करते रह जाते है! देश की सप्ता ऐसे लोगो के हांथो मे दे रखी है जिनका खुला मकसद है देश को तबाह करना और उस तबाही को भी हम देख रहे है ! 
देश में लोग खुशियाँ मानाना तो सीख  गए लेकिन अपने हक़ के लिए लड़ना भूल गए ! 
एक छोटे से उदहारण से बात करते है - शाहरुख़ खान की एक फिल्म की कामयाबी की खुशिया तो पूरा देश मनायेगा लेकिन क्या शाहरुख़ खान की सामाजिकता पर कोई गम मनायेगा ! देश में उत्तराखंड जैसी त्रासदी से अपने को कोशो दूर रखा, सीमा पर ५ जवान मार दिए गए, तो क्या देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते महोदय दो शब्द भी नहीं बोल सकते ! ऐसे व्यक्ति को क्या महत्त्व देना जो गम में  कभी भी देश  के साथ नहीं रहा, रोटी पूरे देश से लेनी है और देश अपने परिवार को समझना है ! खान साहब ये जनता है सब जानती है बस थोड़ी सी भोली है !यद्यपि मुझे भी आप पसंद हो लेकिन केवल एक कलाकार के रूप में !
दूसरी तरफ है वो बिहार के नामर्द मुख्यमंत्री साहब जिनसे उन शरीरो को देखना भी उचित नहीं समझा, उन्हें तो बस जनता चुनाव जितवा दे उसी के प्रचार प्रसार में लगे रहो.! समय बताएगा आप उन बेचारी  माँ, बहनों और विधवाओ के अभिशाप से तो बचिए …… !
अभी इसमे देश को डसने वाले कुछ बेशर्मो के नाम लेना तो बकाया ही है , एक हमारे देश के दामाद ४२० वाड्रा साहब अभी भी इनका पिटारा नहीं भरा , लूटना जारी है साथ में सोनिया जी और उनके साले साहब तो है ही ! इन बड़े नेताओ के लूटने की दर इतनी तेज हो गयी है की बेचारे छोटे नेता भूखे रह जाते है और उनकी जबान भी फिसल जाती है अभी हाल ही में एक महोदय बोले "सैनिक सरकारी बेतन पर सरकारी नौकर  होते है" ………. ! इन महोदय से एक ही प्रश्न है क्या कभी अपनी औलाद को सीमा पर भेज सकते हो ?
आप में इतनी हिम्मत नहीं है बंद कमरों में बहस तो नामर्द भी कर सकते है लेकिन  सीमा पर एक मर्द ही खड़ा हो सकता है !
गलती आपकी नहीं है , आपके आकाओ की नहीं है पाकिस्तान की भी नहीं है , अमेरिका तो बेचारा दूर है , भगवान् की भी गलती नहीं है …… गलती किसी की नहीं है, गलती है मेरी , एक आम आदमी की जिन्होंने गलती से या आलस्य से आपको वहां पंहुचा दिया जहाँ पर आप पोंछा लगाने के लायक नहीं हो !
आप एक मंदिर में बैठे है लोकतंत्र के मंदिर में आपके आधे मंत्रियो को तो लोकतंत्र भी परिभाषा भी नहीं आती होगी ! मेरे तो दिल में बस एक ही प्रश्न है क्या करे  और क्या कहे इन बेचारो को . …. अचानक से दिल बोलता है संभल जाओ कुछ दिन और झेलो मुशीबत २०१४ में देख लेंगे ! ठीक है देखते है २०१४ में ही सही !

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