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क्या शम्भू अपने घर वालो से मिल पायेगा, क्या शम्भू बैंक में पैसे जमा कर पायेगा ?

दीवाली की ही बात है, जब शम्भू शहर गया था! घर में पूजा के लिए कुछ नए बर्तन, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ती, कुछ मिठाई लाया था!
उसी वक्त उसने दीवाली पूजा के लिए बैंक से पैसे भी निकल लिए थे !  उसके के चाचा की लड़की की शादी भी है, नवम्बर के आखिरी हफ्ते में, काफी कपडे लेने पड़ेगे, तैयारियाँ करनी होगी और चाचा की भी सहायता करनी पड़ सकती है, इन सब बातो को सोचते हुए उसने करीब तीस हजार रुपये निकाल लिए
शम्भू: .....काफी होंगे इतने या और निकालू, चलो देखता हूँ अभी तीस हजार काफी ही होंगे, जरूरत पड़ेगी तो किसी से ले लूंगा और मकर संक्रांति में जब शहर आऊंगा तो दोबारा निकाल लूंगा ! अभी वैसे भी पांच हजार रुपये ही बचे है !...
मन ही मन शम्भू कुछ देर सोचता रहा और उसने तीस हजार रुपये निकाल लिए ! ख़ुशी से साइकल में सामान लादकर गॉंव को निकल गया ! घर पहुचते हुए काफी देर हो गयी ! 
वक्त गुजरा, दीवाली ख़ुशी से गुजर गयी!
अब शादी का इंतजार था, तैयारियां शुरू हो गयी ! 
शम्भू टीवी और समाचार से थोड़ा दूर रहता है, गाँव के लगभग सभी लोग अपने काम के व्यस्त रहते है !  देश में क्या चल रहा है , इन लोगो को देर से पता चलता है !
शम्भू  दूसरे हफ्ते में अपने परिवार के साथ पास वाले कस्बे में गया, वहां बस कुछ दुकाने थी, सबने कई दुकानों में कपड़े देखे और फिर एक जगह पसंद आ गए !
शम्भू: सभी कपड़ो के सही-सही दाम लगाओ, और इन्हें झोले में डाल दो!
दूकानदार पैसे जोड़ने लगा, और कपडे तह करके रखने लगा !
दूकानदार: ४४५० रुपये हुए !
शम्भू: ज्यादा है सही रेट लगाओ !
और काफी बहस के बाद ४००० में सौदा पक्का कर दिया गया !
शम्भू ने दूकानदार को चार , हजार-हजार के नए नोट दिए जो उसने दीवाली के वक्त निकाले थे !
दुकानदार: हँसते हुए, साहब क्यों मजाक करते हो? ४००० रुपये दो न !
शम्भू: चार हजार ही तो है !
दुकानदार: साहब, तफरी मत करो चार हजार दो !
शम्भू सुकपुकाते हुए, चार हजार है तो, हजार हजार के चार नोट है ये लो !
इस बार दुकानदार गुस्से में आ गया, सामान लेने आये हो या मजाक करने, चुपचाप चार हजार रुपये दो वार्ना जाओ यहाँ से !
एक बुजुर्ग समझदार सा व्यक्ति इन सबकी बहस दुकान के बाहर से सुन रहा था, कुछ सोचते हुए उसने शम्भू से कहा, ये नोट बंद हो गए है, सरकार ने ५००  और  १००० के नॉट बंद कर दिए है !
शम्भू घबराते हुए बोला : क्या ? कब ?कैसे ?
ऐसे कैसे बंद कर दिए है, पागल हो गए है सब लोग क्या यहाँ ?
... अभी एक हफ्ते पहले ही निकाले है बैंक से, ऐसे कैसे बंद कर दिए है ?
तुम्हे कपड़े नहीं देने मत दो तुम नहीं दोगे, तो कोई नहीं देगा क्या, हम कहीं और से ले लेंगे। चिल्लाते हुए शम्भू ने अपने परिवार को वहाँ से लेकर दूसरी में चलने को कहा !
तभी उस समझदार व्यक्ति ने शम्भू को शांत करते हुए समझाया-
हाँ ये नोट सच में बंद हो गए है !
मगर तुम इन्हें बैंक में जाकर जमा कर सकते हो, और नए नोट बैंक से निकाल सकते हो !
आस पास वाले लोगो ने भी शम्भू को समझाया!
शाम हो चुकी थी, शम्भू अपने परिवार और साइकल के साथ गाँव वापस आ गया !
अगले दिन सुबह उठकर शहर को निकल गया, करीब १२ बजे शहर पहुंचा ! बैंक में लोगो की लंबी लाइन थी! शम्भू भी लाइन में करीब ३०० लोगो के पीछे खड़ा हो गया ! ५ घंटे में बैंक बंद हो गयी करीब २०० लोगो के ही पैसे जमा हो पाए ! शम्भू यह सोचकर गांव को वापस निकल गया की कल सुबह जल्दी आ जाऊंगा और लाइन में लग जाऊंगा मगर अगले दिन लाइन और लंबी थी करीब ४०० लोग शम्भू के आगे थे !
क्या करे बेचारे लोग आस पास के गाँवो में  एक ही बैंक है !
फ़ी से ऐसा ही हुआ करीब ३०० शम्भू के आगे वाले लोगो के पैसे ही जमा हो पाए !
अब आज शम्भू ने निर्णय किया की यहीं खुले आसमान में, बैंक के बाहर रात बिताएगा ताकि सुबह जल्दी नंबर आ सके! 
शम्भू ने यह निर्णय ले तो लिया, मगर उसके पास कुछ खाने को नहीं था और सुबह घर से खाना खाने के बाद कुछ नहीं खाया था इसलिए भूख भी लगी थी, उसने निर्णय किया की किसी ढाबे में जाकर खा लेगा !
पास के ढाबे में जाकर बैठ गया, मगर तभी ध्यान आया की उसके पास तो १००० का नोट है जो चलेगा नहीं !
रात भर बिना खाना, रहने पर शम्भू के हालात और तबियत ख़राब हो गयी ! सुबह लाइन में खड़े लोगो ने शम्भू  को सरकारी अस्पताल पहुचाया, वहीं उसका इलाज हो रहा है ! शम्भू के घर वालो को अभी तक नहीं पता शम्भू कहाँ है !



प्रश्न ये है - 
क्या शम्भू अपने घर वालो से मिल पायेगा ?
क्या शम्भू बैंक में पैसे जमा कर पायेगा ?
क्या शम्भू को नए नोट मिल पाएंगे?
क्या शम्भू  परिवार वाले नए कपडे और सामान ले पाएंगे?
क्या शम्भू शादी में शाम्मलित हो पायेगा?
.
इत्यादि !!!!






'एक और सुबह'


हर रोज दफ्तर में बेवक्त
एक शाम आती है,
एक जाम लिए
कभी भोजनालय में
तो कभी मदिरालय में,
शोर और अट्ठाहस होता है
हर जगह जिस्म और तिलस्म का...
फिर घर मिलता है मुझसे
या
कभी मै मिलता हूँ घर से
जहाँ कुछ बेजान चीजे होती है
कुछ अनजान यादे होती है
और
एक सूनसान रात के साथ
अकेला ‘मै’...
जहाँ साथ मिलकर ख्वाबो की
एक बड़ी गठरी बनती है
बिगड़ती है
और फिर से बनती है हर ‘रोज’
हर रोज यही होता है
फिर सुबह आती है
मुस्कराते मुस्कराते
और ‘एक और सुबह’ साथ चल देती है
रात के पके ख्वाबो की गठरी लेकर
हर ‘रोज’...

भिखारी नहीं थी वो


अब भी वही थी
आज भी वहीँ थी
वही रास्ता था
और वो वहीँ पर पड़ी थी
मेरी बस नजर जा पड़ी उस पर
सहम सा गया था दिल उसका
रोजाना का खेल बन गया था अब
ट्राफिक सिग्नल कप्तान था
मर्जी से रोकता था,
मर्जी से मिलाता था
चौराहे के पांच मिनट
उसे कभी गम में देख
दिल दहल जाता था
तो कभी ख़ुशी में पागल देख था
दिल बहल जाता था
बिना हाथ
बिना पैर
अजीब हाल थे उसके
बस एक चेहरा सही था
जिसमे जान थी ,
एक मुस्कान थी
और उसकी सांसे थी
जिन्हें गुब्बारों में भर भर कर
बेंचती थी वो गर्व से सान से...
भिखारी नहीं थी वो
सबको मेहनत का पाठ
सिखाती युगल की 'आदर्श' थी वो...   
  

चाँद


चाँद
दाग साथ लिये मगर फिर भी बेदाग,
कभी टूटी छतो से टपकता,
कभी बादलो में लुका छुपी खेलता,
कभी सर्दियों में सिकुड़ता,
कभी रास्तो में साथ चलता।
चाँद
हमेशा बचपन से किश्तों में मिला,
कभी रोटी में मिला,
तो कभी रिश्तो (मामा) में मिला,
मोहब्बत के अल्फाजो में मिला,
शहीदो के जनाजो में मिला।
चाँद
अब इश्क की इबादत है
गुमसुम, खोयी रात में
समुन्दर में खोयी मायूसी में
बेसब्री के इन्तजार में
खोये हुए प्यार के इश्तेहार में.
चाँद
मगर अब चाँद डरा है
सब कुछ बिक रहा है
अभी तो चाँद की बस जमीं बिकी है,
अगर चाँद बिका तो ….
सोचो क्या क्या बिकेगा ? क्या क्या बिकेगा ?




#YugalVani

भारत में किसान का मतलब : “बेचारा किसान”, “बीमार किसान”, “गरीब किसान”

एक और किसान ने सबके सामने, फिर से आत्महत्या कर ली ! वैसे तो पहले भी कई किसानो ने आत्महत्या की है मगर इस बार बस नया ये थे की उसने सबके सामने की ! पूरे देश के सामने की, उसको मरते हुए देखने वालो में केवल रैली वाले लोग नहीं थे, उसे टीवी देखने वालो ने, अख़बार पढने वालो ने, सबने... सबने उसकी मौत को सुना, देखा और पढ़ा ! पत्रकारों और राजनेताओ ने उसकी मौत पर राजनीती शुरू कर दी ! कुछ महान लोग तो यहाँ तक बोल बैठे की वो किसान नहीं था ! एक व्यापारी था, उसने अच्छे कपडे पहन रखे थे, पगड़ी का धंधा था उसका, एक गाड़ी भी थी उसके पास, वो किसान कैसे हो सकता है ? बताइए ?
वाह क्या परिभाषा है ‘किसान’ की मेरे देश में... जो फटे-पुराने कपडे पहने वही किसान होता है, जिसके पैर मे प्लास्टिक के काले जूते हो वही किसान होता है, जिसके सर पर मैली पगड़ी हो वही किसान होते है ! जिसके पास लकड़ी की बैलगाड़ी और हल हो वही किसान होता है !
मेरे देश में किसान को कोई हक़ नहीं है वो अच्छे कपड़े पहने, गाड़ी रखे, अच्छे जूते पहने, अच्छे घर में रहे... कोई हक़ नहीं है, किसान का एक अच्छी जिंदगी जीने का !
भारत में किसान का मतलब : “बेचारा किसान”, “बीमार किसान”, “गरीब किसान”...
एक अजीब छवि बना रखी है हमने अपने अन्नदाताओ की, किसान कितनी भी मेहनत करले, उसकी ये छवि बदलती ही नहीं है... या तो हम बदलना ही नहीं चाहते !



कल ‘शहीद’ हुए उस किसान ने अच्छे कपडे पहन रखे थे, इसलिए उसकी मौत पर ‘भी’ उंगलिया उठ रही है, इससे अच्छा है किसान गंदे कपडे ही पहने कम से कम “किसान” तो कहलायेगा, उसे अपने नाम के लिए लड़ना तो नहीं पड़ेगा ! राजनीती वाले उसकी मौत पर राजनीती करने में लग गए, मीडिया वाले ‘शेखीबघारने’ में लग गए !  मौत, मौत होती है , मौत दुखद होती है, मौत में पीड़ा होती है फ़िर वो चाहे किसी की भी हो। जंग में भी अगर दुश्मन मारा जाए तो जीत का जश्न मनाया जाता है, दुश्मन की मौत का नहीं, और गजेन्द्र कोई दुश्मन तो नहीं था, एक किसान था मेरे देश का अन्नदाता था ।
कभी आपने सोचा है, आप हमेशा बड़े बड़े मॉल में जाकर ‘एसी’ में रखी हरी सब्जियां, दाल, आटा और बहुत सारा रशोई का सामान लाते हो, वो भी ‘एसी’ में बिना किसी परेशानी के ! जनाब ये वही चीज़ें हैं जो किसान भरी धूप में कड़ी मेहनत कर अपने खेतों में उगाता है। मॉल मे आपको इन चीजो की चमचमाहट तो खूब दिखती होगी मगर क्या आपको कभी इसके पीछे का किसान का ‘पसीना’ दिखा है ! नहीं !! और तो और अगर वो किसान अपने फटे पुराने कपड़ो के साथ माल में आ जाये तो लोग कितनी बाते सुनाते है उसे, “जाहिल और गंवार” बोलकर बोलकर !
खैर छोडिये किसान तो रोज मरते हो रहते है बस एक और मर गया ! क्या घट गया मेरे इस देश का ! आप आराम से ‘एसी’ में बैठकर टीवी देखिये, कहीं कोई दूसरा किसान आपके लिए खाने का सामान बना रहा होगा कड़ी धुप में, अपने खेत में !


नई किताब

नई किताब 
मतलब एक नई दुनिया 
एक नया चेहरे,
एक नया शहर,
नये नये विचार 
सब कुछ नया, एक-दम नया 
एक नई किताब के साथ आता था
बाबा के साथ पढने को 
मगर,
मगर बस कल तक...
आज वक्त के साथ 
सब गुजर गए 
'बाबा' भी और वो 'किताबे' भी 
कल उस नई किताब के 
पन्नो के 'बीच' 
एक नया 'खिला' हुआ 'फूल' रखा था,
सब तल्लीन थे इकरार में, 
प्यार में 
कभी फूल पन्ने की खुसबू सूंघता
तो कभी पन्ना फूल की खुसबू
मगर,
मगर बस कल तक...
आज... आज, 
बच्चो के हाथ में तो एक नयी 'ई-किताब' है 
जिससे 'बाबा' बेहिसाब और
बच्चे की परेशानियाँ लाजबाब है
'आज' की इस नई किताब के साथ...
परसों तक 'वो' बच्चे 
बिना कलम, बिना दवात और बिना तख्ती 
को जाने... पहचाने 
पेड़ो के पत्तो से कहानियों 
की एक किताब बना लेते थे
अजनबी चेहरों के साथ अजनबी शहर में
मगर आज मुकम्मल है एक नई 'ई-किताब' 
"बाबा" की किताब से बहुत दूर...
‪#‎YugalVani‬

'मोहब्बत' न रही अब

'मोहब्बत'
न रही अब
ख़त्म हो गयी,
मर गयी
इक लाश बन गयी...
अब उसके साथ है
एक चादर
लफ्ज,
अल्फाज
और शायरी की...
'दिल में बाकी थी
जो अर्जियां
सब इन्जार में है
अब दफन होने के...
कल तक जो जिंदगी थी
अब... अब वो मोहब्बत
पड़ी है अकेले लाश बनकर...
लाश से 'अल्फाजो का चद्दर'
इस कदर चिपटा है
मानो इन्ही की मोहब्बत थी
मै, तू  और हम तो बस
बस
परवाने थे,
बस मोहब्बत की खिदमत के लिए
लायक नहीं थे मोहब्बत के.
#YugalVani


वो नन्ही सी यादें

वो नन्ही सी यादें 
न जाने... न जाने कहाँ खो गयी
अंधेरे से उजाले में लाया
संवारा और निखारा था उन्हें
कुछ अंकुरि'त रिश्तों के भरोशे
वो आंगे बढ़ाया था उन्हें...
नन्ही यादें
बिन गम, बिन खता
हर चीज देख मुस्कुराई थी वो,
सपनो को सर पर चढ़ाकर बेठी थी
मगर बस कुछ देर
आसमान में कुछ सपने उड़े भी थे
मगर बस कुछ देर
चाँद सी सजी थी वो यादे... नन्ही
न जाने... न जाने कहाँ खो गयी
'युगल' यादें 'तेरी और मेरी'
यादों में बदल गयी
अब मै अकेला,
यादें अकेली...
दोनों लिपटे है,
एक दूजे के साथ
रात के डर और
पिघली यादो के लबरेज से..
वो नन्ही सी याद
न जाने... न जाने कहाँ खो गयी...
#YugalVani



इंसान, दिल और बारिश

बारिश..
एक बारिश ने
कहा कुछ भी नहीं
ऐसी भी आदते होती हैं
दिल...
मगर दिल ने
सबकुछ सुना
ऐसी भी आदते होती हैं...
बारिश...
बारिश का वो शोर
जिसमे शहर के कुछ घर
शहम कर बैठ गए...
बारिश की वो ठंडक
मानो जैसे समसफ़र के साथ
हम खुद बैठ गए...
इंसान...
बारिश के उस पानी में
कुछ इंसान बेखौफ भीगातें रहे
तो कुछ बस अपने
मोबाईल और पैसे लपेटते रहे...
इंसान, दिल और बारिश
सब मनचले है
अपनी मर्जियों पर चलाते है
अपना कारोबार...
बिन बताए - बेवक्त
आते है और चले आते है
अजीब अदब है
ख़राब लगता है कभी-कभी?
‪#‎YugalVani‬


'फौजी'

बारूदी बंदूख लिए
खड़ा मौत के बाजार,
रह रहकर ताकता दुश्मन
की हुंकार...
फौजी बनना उसने खुद चुना
दो रस्ते थे उसके सामने
फ़ौज या मौज
उसके सब साथी मौज में है
और वो फ़ौज में...
फौजी कहता है
मेरी किसी से दुश्मनी नहीं है
हालाँकि अब किसी से
दोस्ती भी नहीं है...
युगल तो बस उसकी 'गल' है
उसने पहले अपना घर जलाया
जब तक घर रहेगा,
लौटने की मंसा रहेगी,
कइयो को फ़ौज से मौज में लौटते देखा है
उसने अपने पड़ोस में
घर एक विकराल 'जाल' है...
जोर जोर दहाड़ता है वो फौजी
हम यहाँ शांत सोते है
बेखबर होके
चिंतित होता है वो फौजी
जाग जागकर...




#YugalVani

फाँसी पर हँसते हँसते चढ़ा था, मगर क्या इसलिए... ?

२३ मार्च, तारीख तो सबको याद रहती है, जिनको नहीं रहती है अगल-बगल वालो से या फेसबुक-ट्विटर से पता चल जाता है की आज के दिन १९३१ में किसी ने जान दी थी देश के लिए किसी ने ! हाँ अपना अपना जीवन दिया था इस देश को !
एक दिन अचानक से देश की हालत पता करने वो शहीद सैर पर निकला ! टहलते टहलते शाम हो गयी, किसी डगर से गुजरते हुए उसने एक ‘जमादार’ से पूछा, सब सही है न अब यहाँ, सब लोग आज़ाद है न, हमारी माँ- बहने सुरक्षित है न, खाना पीना मिलता है न सबको अब यहाँ, कोई किसी को लूटता तो नहीं है, किसान आराम से है न अब देश में..... आदि अनेक सवाल उस जमादार से पूंछ डाले !
बिना रोके ‘शहीद’ ने मुस्कुराते हुए बोला अब तो बहुत आगे बढ़ गए होगे हम, बहुत बदल गए होगे हम अब, ८२ साल हो गए, काफी वक्त बदल गया अब, सब मिलजुल कर रहते होगे सब.....
‘शहीद’ और सवाल करते इससे पहले जमादार ने पूंछा कहा घूम रहे हो, कैसी बाते कर रहे हो.... और उसका दिमाग चेहरे पर गया, जमादार मन ही मन सोचने लगा कही देखा है, पहचाना सा चेहरा है.... कही तो देखा है...
आपको कही देखा है’ इतना पूंछते पूछते उसे अचानक से याद आया ये ‘भगत सिंह’ है, उसने अपने बच्चो की किताबो में पढ़ा था !



जमादार बोला “आप तो भगत सिंह हो न, जो हिंदुस्तान के लिए ‘शहीद’ हो गए थे...?”
“हाँ मै भगत सिंह ही हूँ” मुस्कुराते हुए ‘शहीद’ बोले, अब तो सब ठीक है न मेरे देश में... ?
जमादार बोला हाँ साहब सब ठीक तो है, मगर ये “मेरे देश में” समझा नहीं ? अब आप पाकिस्तान के लाहोर में हो...
आपका मुल्क ‘हिदुस्तान’ सरहद के उस पार है !
इतना सुनते ही ‘शहीद’ पलट कर चल दिए, शांत, बिना किसी मुस्कान के ! मन ही मन सोचने लगे किस लिए “शहीद” हुआ था मै ?
चेहरे पर हंसी नहीं थी अब... आखें भीग आयीं थी ....
वोह इतना कमज़ोर नहीं था.. फाँसी पर भी हँसते हँसते चढ़ा था वह ...... पर आज आखें भीग आयीं थी.. जान दी थी उसने.... जान.....

मगर क्या इसलिए ‘जान थी उसने’ ?

न जाने क्यों इतना याद आते है

सुबह की वो छोटी छोटी बातें
छुट्टियों की फिर फिर मुलाकातें
सूरज की रौशनी में जवां इश्क
जिंदगी के बड़े बड़े ख्वाब
और तेरे और मेरे वो अल्फाज
न जाने क्यों इतना याद आते है...
कहीं दूर-दूर घूमने के नमकीन इरादे
कसमो में वो कच्चे कच्चे वादे
तेरी यादो में बिखरे बिखरे दिन
तारीखों के साथ जवां होती उम्मीदे
और रातो के यकीनी सपने
न जाने क्यों इतना याद आते है...
हर गुजरते दिन की यादो से
कोई कहो जरा ठहरो तो
बदलती तारीखों के वक्त से
कोई कहो वक्त बदलो तो
जिंदगी के मेले को कोई बता दो
तुम्हारे बाद खुद भी खो गया हूँ मै यहाँ
और बस तुम इतना सुन लो
तुम्हे बस "प्यार" था मुझसे
मुझे न जाने क्या क्या था की
अब भी खुद को करीने से लगा दूं मै
तुम अब भी,
न जाने क्यों इतना याद आते है...
न जाने क्यों...?



#YugalVani 

न जाने क्यों इतनी उदास है 'वो'

न जाने क्यों इतनी उदास है 'वो'
उसे नहीं पता क्या कितनी खास है 'वो'
उसे तो सिर्फ मोहब्बत है मुझसे
उसे न जाने क्या क्या तलाश है तुझसे
न जाने क्यों इतनी उदास है 'वो
ये खेल मोहब्बत का बस
एक 'हम' के एहसास में है
ये न तेरे 'खुद' की साँस में है 
और न ही उसकी प्यास में है...
न जाने क्यों इतनी उदास है 'वो
उसे नहीं पता क्या कितनी खास है 'वो'
आसमान के एक 'अधूरे' चांद की
'पूरी' ख्वाहिश में बैठी है क्यों तू ?
खाली मन और निडर वदन लिए,  
क्यों काली रात में बैठी है तू ?
न जाने क्यों इतनी उदास है 'तू'
तुझे नहीं पता क्या कितनी खास है 'तू'




जिंदगी की डगर में रोज खेलते थे तुम
अब 'युगल' न हुआ तो क्या हुआ
तुम ही हम बनकर खेल लो अब ये खेल
उदासी खोकर तुम्हे 'तुम' पाने में मजा आयेगा
तुम्हे नहीं पता क्या कितनी खास थी 'तुम'
आजमा के देख लो नव अंकुर'ण को,
न जाने क्यों इतनी उदास है 'वो'

उसे नहीं पता क्या कितनी खास है 'वो'
#YugalVani

'होली'

'होली'
क्या लिखू तुझ पर,
क्या तस्वीर बनाऊ,
न लफ्ज है और न ही रंग
तेरी खूबसूरती के बयान के लिए...
बचपन में कभी पेन्सिल से
काला गोला बनाकर
पीला रंग भरा था उसमे
जो 'आम' तो कभी 'सूरज'
बन गया था 'युगल'
तब तक यही था रंगों का मायना
मेरे इस संसार का...
फिर बाजार में बिकते दिखे
कागजो में लपेटकर कुछ रंग
गुलाबी, लाल, पीला, हरा
और सुनहरी... सब रंग
एक साथ, एक  दुकान में ऐसे थे
मानो कोई 'परी' रंगों से लिपटी हो
और दुकान के बाहर मानो
पूरे शहर में रंगीन धूप सी बिखर गई हो
किसी ने बताया ये "होली" है...
भींगे भींगे लोग,
मिठाइयों के साथ रंगीन धुप,
हँसते और दौड़ते बच्चे,
रात को होलिका की आग
और दिन में बुजुर्गो संग फाग
बड़ा रंगीन होता है ये त्यौहार, 'युगल'
कुछ रंगीन दिन में रंग नहीं खेल पाते
अगले दिन सड़क पर पड़े रंग छुडाते है
बच्चे टूटी पिचकारिया उठाते है और
अमीरों के यहाँ से कुछ मिठाइयाँ ले आते है
और 'माँ'
'माँ' सर पर घड़ा रख
रोज दूर-दूर से पानी ले आती है
रोज भीग जाती है,
उसकी होली तो रोज ही हो जाती है, 'युगल'    
#YugalVani

सब कहा खो गए ?

सब कहा खो गए ?
कल की ही बात है
यहाँ एक खेत था
एक खलियान,
कच्चा घर और कुआँ था
गोरैया का एक घोसला था
नीम के उस पेड़ में
और आज,
आज न जाने
सब कहा खो गए ?

सुबह - सुबह ही देखा
बहु मंजिल मकान था
हजारो इमारतो के झुंड में,
दिन में 'दिन' तो दिखा
मगर रोशनी में अपना नहीं था कोई
आसमान पर परिंदा न था
मेहंदी की झाड़ियों में रंग न था,
शाम को जब घर गया
ख़ामोशी से डरा खामोश घर
इंतजार में था...
खिड़की खोली तो
छत नदारद थी
तारे तो थे असमान पर
मगर खोये थे कही अंजान रोशनी में...
कल ही की बात है
न जाने...
सब कहा खो गए ?
#YugalVani

आंगन के कोने में पड़ी “खामोश” कुर्सी...

आंगन के कोने में पड़ी खामोश कुर्सी...
एक शख्स हर शाम
थक हार कर यहाँ बैठ जाता था 
मिट्टी से सने पांवो को धोकर
अपनी धोती को सवारकर
सुपाड़ी कत्था और पान बड़े चाँव से खता था
इसी आँगन में पड़ी उस कोने की कुर्सी में !

कभी एकदम शांत होकर अख़बार पढता
कभी संगतियो के चेहरो की चमक,
एक शोर तो था मगर बड़ा खामोश सा
एक चहल पहल थी,
कोई अपना लगता था ‘अपना’
जो कभी डाटता था,  चिल्लाता था,  सुनाता था
मगर कुछ भी करो हमेशा ‘अपनाता’ था
इसी आँगन में पड़ी उस कोने की कुर्सी से !

दिन गुजरते गए और कुर्सी ‘खिजती’ गयी,
शोर - शांत होता गया और चिल्लाना - खामोश
सुना था बड़ा लम्बा सफ़र है जिंदगी का 'युगल'
मगर अभी तो जिदगी का अंकुर'ण ही हुआ था
और कुर्सी का बुढ़ापा आ गया,
जो कोने में सिमट गया
बुढ़ापे के ‘वाणी’ की मृत ख़ामोशी.
जो सफ़ेद चादर में सिमट गयी...
अब बस चार दीवारे और एक आँगन है
एक छत के नीचे,
कोने में पड़ी एक अकेली कुर्सी के साथ..."खामोश" ..."खामोश" 

#YugalVani