‘आप’ बना सकते है लोकतंत्र के इस उत्सव को एतिहासिक : आम आदमी की जुबानी

आजादी की ६७ पूरे हो गए है, देश लोकतंत्र घोषित है! लेकिन क्या सच में एक आम नागरिक स्वतंत्र है ? खुश है ? क्या वो अपने ४-५ साल के बच्चे को ईमानदारी से बोल सकता है की “बेटा तुम एक इमानदार देश में हो”? क्या वो खुद से ईमानदारी के साथ बोल सकता है की वो इमानदार देश का नागरिक है, उसकी सरकार ईमानदार है? क्या सच में वो प्रतिदिन प्रयोग के सामानों की महंगाई से परेशान नहीं है? क्या उसे १०० रुपये किलो की प्याज और ५० रुपये किलो का दूध नहीं सताता? क्या उसकी चाय की चीनी का मूल्य मिर्च की तरह नहीं चुभता ? क्या उसे हजारो घोटालो में घुटे खुद के पैसो की घुटन नहीं सताती ?
इसी तरह के हजारो प्रश्न है जो एक आम आदमी को सता रहे है लेकिन वो किससे कहे? आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है! एक सहारा जिसे उसने पांच साल पहले यह सोचकर वोट दिया था की यह हमारे हक़ की लड़ाई लडेगा लेकिन आज वो खुद के बैंक एकाउंट की लड़ाई में लग गया. उसने उसे यह सोचकर वोट दिया था की यह हमारे परिवार को सुरक्षा देगा लेकिन आज उसी सहारे का परिवार इज्जत लूटता है, उसके समाज और देश के विकास के लिए जिसे जिताया था आज वो उस आम आदमी को ही कुविकसित कर रहा है !
अचानक उस बेचारे ने एक दिन सोचा इस बार दूसरी पार्टी को जिताते है और वो सफल भी हुआ लेकिन वो दूसरी पार्टी का नेता भी उसी तरह से लूटने लगा..
फस गया बेचारा आम आदमी.... XX-YY-XX-YY-XX-YY-XX-YY……..XX-YY के लूप में!
कौरवो के इस चक्र में बेचारा अभिमन्यु की तरह फसा है आज का आम आदमी.
इस दशा में उसे फिर से आवश्यकता है की वो अपने सबसे बड़े अधिकार “वोट” का प्रयोग सही ढंग से करे,
वोट किसे देना? क्यों देना है?.......................जैसे प्रश्न सोचकर ही उसे वोट देना चाहिये!
जिस तरह से एक आम आदमी साल में हजार पर्व मिलजुलकर मनाता है उसी तरह पांच साल में आने वाले लोकतंत्र के इस पर्व को अलग महत्त्व तो देना बनता है ! सभी दीवाली, दशहरा, होली, ईद, क्रिसमस में पुरे दिन व्यस्त रहते है, कुछ न कुछ खास करते है उसी तरह से क्या पांच साल में आने वाले इस त्योहार में १-२ घंटे का समय भी नहीं दे सकते ? देश आपका है, समाज आपका है हजार त्योहारों में से ये त्योहार आपका है तो सेलेब्रेसन भी आपका ही बनता है! इससे फायदा भी आपका है, दुसरे त्योहारों में तो आपका पैसा खर्च होता है लेकिन इस त्योहार में आपको मौका मिलता है की आप ऐसे व्यक्ति को चुन सके जो आपके खर्च कम कर सके !
घरो से निकलिए अपने हक़ के लिए अपना वोट डालिए, आपका वोट एक ऐसे समाज का विकास कर सकता है जिसकी भारत को आवश्यकता है, आज की राजनीती में कूटनीति का सहारा है यह तो सब जानते है नेता इतने गिर चुके है की जनता को बेकूफ बनाना उसने एक खेल समझ रखा है, पैसे के बदले वोट, दारु के बदले वोट, सामान के बदले वोट और ऐसे अनेक हथकंडे अपना रहे है जिससे बार बार भ्रष्टाचार का रौला होता है मंत्रिमंडल में, सरकार में और बदनाम करते है लोकतंत्र के मंदिर को... और बाद में कहते है ये इतना महंगा है वो इतना माँगा है.
अतः वो तो नहीं बदल सकते लेकिन जो बदल सकते है उनके बदलने से ही समाज बदल सकता है, यदि आप वोट डालने नहीं जा रहे तो कृपया इस बार जरुर जाईयेगा, ये उन वोट बेचने वालो के चहरे पर तमाचा होगा जो बेईमानी के दलदल में पिसे चले जा रहे है !
आम आदमी ने भाजपा- कांग्रेस की जिंदगी अच्छी तरह जी ली है, यदि इसी भ्रष्टाचार और बेईमानी भरी जिनदगी से प्यार है तो वैसा ही करिए जैसा अभी तक कर रहे थे लेकिन यदि समाज में परिवर्तन चाहिए तो आपको घरो से निकलना होगा और मताधिकार का प्रयोग सोच-समझकर करना होगा.
मै यहाँ एक ऐसी नवोदित पार्टी की बात जरुर करूँगा जो हाल ही में एक जन आन्दोलन से बनी है “आम आदमी पार्टी” कुछ लोगो से सुना है की वो आन्दोलन अन्ना हजारे का था, कुछ लोग कहते है की वो आन्दोलन अरविन्द केजरीवाल का था मेरी समझ से ये सब तो परे है लेकिन मै ये कहूँगा मै इस आन्दोलन में तीन दिन तक जेल में रहा था यह आन्दोलन तो मेरा था, हर उस आदमी का था जो सड़क पर आया था तो आना या केजरीवाल का कैसे हुआ? आन्दोलन जनता का होता है व्यक्ति विशेष का नहीं.. तो उस आन्दोलन से अन्ना या केजरीवाल के साथ-साथ पूरे देश का नाम आना चाहिए!
हाँ मै यहाँ ये बताना चाहुंग मै एक भाजपा नेता का बेटा हूँ और मेरे पिता जी को १९९१ के अयोध्या दंगो में पैर में गोली लगी थी लेकिन मै भाजपा से बिलकुल अलग हूँ और आज से दो साल पहले तक मुझे राजनीती में थोड़ा भी इंटरेस्ट नहीं था लेकिन उस जन आन्दोलन और उसकी मानगो ने मुझे राजनीती के बारे में सोचने पर विवस कर दिया, आखिर सवाल देश का था तो मुझे भी लगा की रास्ता गलत नहीं है और आज मुझे गर्व है की मै ऐसे लोगो के साथ खड़ा हूँ जिन्होंने अपना सब कुछ दांव में लगा रखा है जिनमे से मै खुद एक हूँ पापा से शर्त है आप की सरकार को लेकर, एक नौकरी से हाथ धो चुका हू, गाँव वालो से हजारो वादे है एक अच्छी सरकार को लेकर और अब तो दोस्तों को भी जबाब देना है की मेरी लड़ाई गलत नहीं थी. मै सही था मेरे साथ खड़े लोग सही थे पूरा देश सही था.. ऐसी दशा में बस एक ही उपाय बचाता है जो ऊपर के तीनो बिन्दुओ का हाल हो सकता है “आप- आम आदमी”..

एक साधारण सी गुजारिश है, प्रार्थना है, निवेदन है की लोकतंत्र के इस त्योहार का इस बार का उत्सव कुछ एतिहासिक होना चाहिए जिससे अगले पांच सालो तक आपको पछताना न पड़े, छोटे छोटे बच्चे एक ऐसे देश का सपना देश सके जो “सच में ईमानदार हो”....

“वोट और नोट” दोनों का हिसाब चाहता है “आम आदमी”

एक स्थिति होती है जिसमे लोग अपने आपको रखते है और एक परिस्थिति होती है जिसमे कोई कैसे भी रह सकता है लेकिन दोनों दशाओ में एक छोटे से छोटे आम आदमी के पास ‘हिसाब’ नाम की चीज होती है! एक बच्चा एक रुपये का और एक कंपनी हजार करोड़ रुपये का हिसाब रखती है, एक चाय वाला “चाय के कपो” का और पान वाला “पान की बिक्री” के एक एक पाई का हिसाब रखता है, पानी बेचने वाला “पानी के बिके ग्लासों का” और गाड़ी बेचने वाला ‘गाड़ियों’ का हिसाब रखता है................. यहाँ हर आदमी के पास हिसाब की किताब होती है!
ऐसी दशा में द्रश्यनीययह यह है की हमारे राजनेताओ के पास विदेश जाने के करोणों के खर्चे का हिसाब तो है लेकिन “करोडो के चंदे” का हिसाब नहीं है, एक रात में लाखो के ‘डिनर’ का हिसाब तो है लेकिन जनता के विकास में लगाये गए वास्तविक पैसे का हिसाब नहीं है! काँमन वेल्थ खेलो का फर्जी हिस्साब है लेकिन ‘आम आदमी’ के एक पैसे का हिसाब नहीं है ! अभी हाल ही में सुना की दिल्ली की तीन पार्टिया, अपनी पार्टियों के चंदे पे बात कर रही है, जो जायज भी था, इनमे आम आदमी पार्टी ने अपने चंदे का हिस्साब जनता को दिया लेकिन भाजपा और कांग्रेस के करोणों के चंदे का हिसाब अब तक आम आदमी जानने का इच्छुक है, दोनों ऐसी पार्टिया है जिन्होंने भारतीय राजनीती में शासन किया है, और एक ने तो ६० साल से ज्यादा शासन किया है! खुद को लोकतंत्र मान चुके दोनों बड़े राजनैतिक दल आखिर क्या सोच कर जनता को हिसाब नहीं देना चाहते ?
क्या ये पैसा सच में भारत का नहीं है?
क्या इसमे पाकिस्तान, चीन या अमेरिका की हिस्सेदारी है ?
क्या ये पैसा किसी आतंकवादी संगठन ने दिया है ?
क्या किसी पार्टी के पास ‘पैसे का पेड़ है’?
.....आदि अनेक ऐसे प्रश्न जो कई लोगो ने मुझसे पूंछ चुके है और मुझे भी सोचने और शक करने पर विवस कर दिया! यहाँ प्रश्न केवल हिसाब या पैसा का नहीं उठता, प्रश्न है आम आदमी के अधिकारों का, जो व्यक्ति अपने वोट की ताकत से सरकार बना सकता है तो क्या वो उसके नोटों का हिसाब भी नहीं पूंछ सकता !
 आज एक आम आदमी होने के नाते क्या मेरे पास वो ताकत भी नहीं है की मै अपने नेता से अपने पैसे के बारे में पूंछ सकू. क्या उस नेता में इतनी भी काबिलियत नहीं है की वो जनता को हिसाब दे सके. जनता को और व्यक्तिगत मुझे(एक आम आदमी) को इस पैसे का हिसाब चाहिए. जन आन्दोलन की आवाज तो जानती ही है दोनों पार्टियाँ साथ में अभी भी इस लोकतान्त्रिक देश में अदालतों में न्याय होता है, हक़ की लड़ाई में कोई दर भी नहीं होता ! Cont……..

“दशहरे के ‘पान’ की वो यादे”

नवरात्रि और दशहरा का पर्व मेरे लिए हमेशा विशेष रहा है ! मेरे मन में माँ के “जागरण” के प्रति प्यार है ! मेरे बाबा हमेशा देवी माँ की पूजा में व्यस्त रहते थे, प्रतिदिन सुबह ३-४ घंटे उनकी पूजा होती है! तब मै अपने गाँव सुमेरपुर में ही रहता था! मै उनके साथ कभी कभी रात्रि जागरण में जाया करता था, बड़े अनंदनीय होते थे वो दिन! अब पूजा पाठ का वो प्रक्रम मेरे पिता जी अपना रहे है, मै बाबा और पिता जी के इस लगन-पूर्वक की जाने वाली पूजा को देखकर ही बड़ा हुआ हूँ ! यहाँ मै अपनी दादी का जिक्र करना कैसे भूल सकता हूँ, ९० साल की उम्र तक भी जिन्होंने बिना चश्मे में ग्रन्थ पढ़े और सुबह ४ बजे उठाने का क्रम नहीं तोड़ा ! दादी की वो “भागवत”, धार्मिक कहानियां जो रोज सायं को शुरू हो जाती थी उसे कभी नहीं भूल सकता ! आज घर से निकले ९ साल हो चुके है, दादी और बाबा दोनों को खो चुके है! अब उनकी यादें वो एहसास दिलाते है जो शायद वापस मिल जाये तो मै समझू की एक नया जीवन मिल गया !
इस समय, दिल्ली में रहता हूँ. लेकिन अब भी दादी और बाबा के सपने दिल को खातोरते रहते है, कुछ सपने जो मेरे लिए थे और कुछ सपने जो समाज के लिए वो देखते थे ! हमेशा कहते थे, “भगवान हो या न हो लेकिन हिन्दू धर्म में जिंतनी भी प्रथाएं है उनको बिना सोचे पालन करो, हमेशा खुश रहोगे” बाद में मैंने उनकी हर बात पर गौर किया और कुछ सोचा बातो में सत्यता थी! तुलसीदास जी के ग्रन्थ के बारे में कहते थे, ठीक है मानता हूँ इसमे एक कहानी है लेकिन क्या आज का कोई लेखक इतनी जुडी हुयी कड़ीयो वाली कहानी लिख सकता है? क्या कोई बिना किसी जगह की शैर किये श्री लंका और भारत को जोड़ने वाली आज के दशहरे की कहानी को लिख सकता है..................................” मैंने आज इस बात पर सोचा, इन ग्रंथो में कुछ तो ताकत है !
उनके रहते हुए मुझे कभी नहीं पता चला की वो एक ऐसे कवि भी थे जिन्होंने कभी अटल बिहारी बाजपेई जी जैसे कवि के साथ कविता की होगी, लेकिन जब मैंने उनकी डी.ए.वी. कानपूर की डायरी खोली और उनकी रचनाये पढ़ी तो मेरे अन्दर “गर्व” की एक लहर दौड़ पड़ी! एक ऐसा सरकारी कर्मचारी जिसने अपने जीवन में कभी एक रुपये रिश्वत का न लिया हो(ऐसा मै नहीं उनका हर मित्र और गाँव वाले कहते है), जिसने अपने लड़के को रिश्वत की वजह से खुद नौकरी से निकलवाया हो ऐसा व्यक्ति कवि भी हो सकता है.
मैंने उनकी रचना “ओ किसान भगवान .....” को कुछ बदलकर अपने ब्लाग में पहले लिखा है, इसे पढने के बाद आप खुद समझ जायेगे, आखिर उनका व्यक्तित्व समाज के लिए क्या कहता है !
आज दशहरे के दिन उनके हाथ का पान खाने को मिलता था, पान को हमारे यहाँ दशहरे मिलन का सूचक मानते है और पुरानी लड़ाईयां ख़त्म करने का प्रेरक...
उस “पान” की वजह से एक याद कई यादे दिला गयी, उनके साथ का रामलीला और फिर रावण का दहन. वो दोबारा नहीं लौट सकता L L


“धरना-जेल-लाठियों” के बाद अरविन्द केजरीवाल के साथ एक अलग अनुभव : अंकुर मिश्र “युगल”

यद्यपि मै किसी आई आई टी से नहीं हूँ लेकिन फिर भी वहां था ! मेरे मित्रो को मेरी बातो से ये लगता है की मै भाजपा सामर्थी हूँ लेकिन फिर भी मै वहां था ! लेखनी की दुनियाँ में होने के बावजूद मेरा पत्रकारों से कोई ज्यादा सम्बन्ध नहीं है फिर भी मै वहां था ! कुछ तो कारण था जो मै वहां था, दिनभर की थकान और एक बड़े सेमिनार को ख़त्म करने के बाद भी मै वहा पूरी शक्ति के साथ वहां था ! आखिर कारण क्या था?

कारण था एक व्यक्ति जिसके पीछे पूरा देश चल पड़ा आखिर उसमे तो कुछ है ! जो व्यक्ति आज अमीरों की पंक्ति में खड़ा होकर आराम कर सकता था उसने अपने आप को दांव में लगाकर कुछ बदलने के लिए कदम उठाया ! जिसके पास आज एक ऐसी टीम है जो किसी भी प्रश्न का जबाब इमानदारी से देने में सक्षम है ! कुछ नहीं तो देश के लिए कुछ न कुछ करने में सक्षम तो है ही ! इस वजग से मै यहाँ था !



सेमिनार हाल में जाने से पहले मैंने अरविन्द केजरीवाल और रवीस कुमार से जिस तरह के अनुभव लिए उन अनुभवों के लिए मै यहाँ था! मैंने दोनों व्यक्तियों के बीच में खड़े होकर जो बाते की वो वास्तव में मेरे लिए मार्गदर्शक रहेगी ! सरलता और ओजस्विता से परिपूर्ण इन दोनों लोगो की बाते मुझे थोड़ा बहुत देश और लेखनी के तरफ तो जरुर ले जायेगी! वैसे तो मै अरविन्द केजरीवाल के साथ १६ अगस्त वाली क्रांति से जुडा हूँ लेकिन उस क्रांति के बाद कल ही उनसे मुलाकात हुयी! रविश कुमार को हमेसा टीवी में देखा था कल प्रत्यक्ष बात की, अतुभाव थोड़ा अलग तो था ही!
वैसे तो अभी तक मै इस आन्दोलन की १५ से ज्यादा संगोष्टिया में गया हूँ, देश के इस आन्दोलन के लिए जेल भी गया हूँ, लाठियां भी खायी है लेकिन कल जब अरविन्द केजरीवाल का स्वागत मैंने आई.आई.टी के १५०० से ज्यादा छात्रो की तालियों से देखा, सच में मेरे रोंगटे खड़े हो गए ! जो देश के लिए आधुनिक प्रद्योगिकी के सहयोग से देश का विकास और पैसा दोनों कम सकते है, ऐसे लोग भी आज देश की दुर्गति से परेशान हो चुके है उन्हें देश के लिए एक नया संचालक चाहिए, जो उन्हें विदेश जाने से रोके देश को सुपर पावर बनने में अपना सहयोग दे ! देश के सभी तरह के विकास के लिए एक अच्छी राजनीती की जरूरत होती है, अच्छी राजनीती एक अच्छे राजनेता से आती है और एक अच्छा नागरिक ही अच्छा राजनेता बन सकता है जो देश के लिए कुछ सोच सके, भ्रष्टाचार , जातिवाद समाजवाद के अलावा प्रगतिवाद के लिए भीं सोच सके !


अतः अंततः परिणाम यही आता है देश को एक विकल्प की जरुरत है जो आज की ग्रसित राजनैतिक विचारधारा के आगे कुछ सोच सके, विकास और सुपर पावर के लिए काम कर सके, केवल बाते नहीं ! 

बंद कमरों में बहस तो नामर्द भी कर सकते है लेकिन सीमा पर एक मर्द ही खड़ा हो सकता है : अंकुर मिश्र "युगल"

देश किस किस तरह से गिराया जा रहा है और हम किस तरह से गिरा रहे है ! सोचनीय है..  :( 
हमारा पडोसी हमारे घर  घुसकर मार जाता है हम देखते और बात करते रह जाते है! देश की सप्ता ऐसे लोगो के हांथो मे दे रखी है जिनका खुला मकसद है देश को तबाह करना और उस तबाही को भी हम देख रहे है ! 
देश में लोग खुशियाँ मानाना तो सीख  गए लेकिन अपने हक़ के लिए लड़ना भूल गए ! 
एक छोटे से उदहारण से बात करते है - शाहरुख़ खान की एक फिल्म की कामयाबी की खुशिया तो पूरा देश मनायेगा लेकिन क्या शाहरुख़ खान की सामाजिकता पर कोई गम मनायेगा ! देश में उत्तराखंड जैसी त्रासदी से अपने को कोशो दूर रखा, सीमा पर ५ जवान मार दिए गए, तो क्या देश के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते महोदय दो शब्द भी नहीं बोल सकते ! ऐसे व्यक्ति को क्या महत्त्व देना जो गम में  कभी भी देश  के साथ नहीं रहा, रोटी पूरे देश से लेनी है और देश अपने परिवार को समझना है ! खान साहब ये जनता है सब जानती है बस थोड़ी सी भोली है !यद्यपि मुझे भी आप पसंद हो लेकिन केवल एक कलाकार के रूप में !
दूसरी तरफ है वो बिहार के नामर्द मुख्यमंत्री साहब जिनसे उन शरीरो को देखना भी उचित नहीं समझा, उन्हें तो बस जनता चुनाव जितवा दे उसी के प्रचार प्रसार में लगे रहो.! समय बताएगा आप उन बेचारी  माँ, बहनों और विधवाओ के अभिशाप से तो बचिए …… !
अभी इसमे देश को डसने वाले कुछ बेशर्मो के नाम लेना तो बकाया ही है , एक हमारे देश के दामाद ४२० वाड्रा साहब अभी भी इनका पिटारा नहीं भरा , लूटना जारी है साथ में सोनिया जी और उनके साले साहब तो है ही ! इन बड़े नेताओ के लूटने की दर इतनी तेज हो गयी है की बेचारे छोटे नेता भूखे रह जाते है और उनकी जबान भी फिसल जाती है अभी हाल ही में एक महोदय बोले "सैनिक सरकारी बेतन पर सरकारी नौकर  होते है" ………. ! इन महोदय से एक ही प्रश्न है क्या कभी अपनी औलाद को सीमा पर भेज सकते हो ?
आप में इतनी हिम्मत नहीं है बंद कमरों में बहस तो नामर्द भी कर सकते है लेकिन  सीमा पर एक मर्द ही खड़ा हो सकता है !
गलती आपकी नहीं है , आपके आकाओ की नहीं है पाकिस्तान की भी नहीं है , अमेरिका तो बेचारा दूर है , भगवान् की भी गलती नहीं है …… गलती किसी की नहीं है, गलती है मेरी , एक आम आदमी की जिन्होंने गलती से या आलस्य से आपको वहां पंहुचा दिया जहाँ पर आप पोंछा लगाने के लायक नहीं हो !
आप एक मंदिर में बैठे है लोकतंत्र के मंदिर में आपके आधे मंत्रियो को तो लोकतंत्र भी परिभाषा भी नहीं आती होगी ! मेरे तो दिल में बस एक ही प्रश्न है क्या करे  और क्या कहे इन बेचारो को . …. अचानक से दिल बोलता है संभल जाओ कुछ दिन और झेलो मुशीबत २०१४ में देख लेंगे ! ठीक है देखते है २०१४ में ही सही !

जिस देश में शर्मा जी की चाय 7 रुपये की बिकती है, उस देश में खाना 5 रुपये में..

आज सुबह जब मै 'मोर्निग वाक' से  लौटकर  पार्क में वापस आया और वहाँ उस बातचीत हिस्सा बना जिसका वर्णन यहाँ करने से मै अपने आप को नहीं रोकपाया ! उन वरिष्ठ नागरिको के आलावा आज एक चाय वाले चाचा भी वहाँ आये हुए थे ! यहाँ वरिष्ठ का  मतलब उम्र और ज्ञान दोनों से है, वैसे तो इन 'सीनियर सिटीजंस' से मै रोज मिलता और बाते  लेकिन आज उन चाय वाले चाचा का आगमन कुछ विशेष था !
देश में अलग अलग कोनो से  राजनीतिग्य बाते कर रहे है की हमारे यहाँ खाना 5 रुपये का मिलता है , हमारे यहाँ 12 रूपये का मिलता है ! तो यहाँ भी वाही बात चल रही थी , ये बात चाय वाले अंकल के समझ में नहीं आयी तो उन्होंने पूरी बात पूंछी और समझने के बाद घबरा गए और बोल पड़े 'हाय राम 5 रुपये का खाना' मै तो एक ग्लास  चाय भी 7 रुपये की देता हूँ,  और उसकी कमायी के बाद भी  नहीं चल  पाता और हमारी सरकार 5 रुपये में खाना देकर पूरा देश चला लेती है !........................................"
उस चाय वाले की बात को  सोचा, जिस देश में शर्मा जी की चाय 7 रुपये की  बिकती है , उस देश में खाना 5  रुपये में कैसे मिल सकता है !  हमारी सरकार के  ऐसे काल्पनिक कथनो से तो यही लगता है की या तो सरकार के सभी  मंत्री-संत्री पागल हो चुके है या उनके पास विकास करने के लिए कुछ शेष नहीं बचा !
वही दूसरी तरफ इन सब बातो की जिम्मेदार है हमारी मीडिया, जो एक किसान की मौत को दिखाए या  दिखाए लेकिन एक नेता के थूकने की  को मुद्दा जरूर बना देते है !तो यही सार था इस वास्तविकता का जिस देश में चाय  सात रुपये में मिलती है वहाँ 5 रुपये में खाना  कहा से मिल सकता है !देश में तो मजाक चल  रहा है आइये आप भी इसका एक हिस्सा बनिए !

मिडिया इतनी भी खोखली मत बनो : अंकुर मिश्र 'युगल'

मै अन्ना हजारे की बात से पूरी तरह सहमत हूँ, पत्रकारिता विकास का एक ऐसा स्तम्भ है जिसके जरिये किसी भी परिस्थिति में देश को बचाया जा सकता है ! आम जनता की आवाज उठाने का एक ऐसा माध्यम जो संसार के कोने कोने तक आसानी से जा सकती है ! गाँव की उन्नति तो रही है लेकिन उससे ज्यादा अवनति हो रही है, मंजिले तो ऊँची हो रही है लेकिन सोच और दिमाग नीचे हो रहा है ! गरीब को सहायता तो मिल रही है लेकिन उससे ज्यादा उसे लूटा जा रहा है ! जब किसी घटना के बाद पुलिस वाला रिपोर्ट लिखने के पैसे लेता हो , विकास के किसी टेंडर को पास करने के लिए नेता पैसे लेता हो, नौकरी के लिए एक कंपनी पैसे लेती हो, इलाज के लिए सरकारी डाक्टर पैसे लेता हो ,…………………।
तब भी भारतीय मिडिया इनको कभी नहीं दिखाती है !
उन्नति और विकास जरुरी है लेकिन खोखलेपन के साथ नहीं ! यह जरुरी है हम क्रिकेट में विश्वविजेता बनते है तो उसे दिखाए लेकिन यह भी जरुरी है यदि किसी गाँव में गरीब मर रहा है तो सरकार को दिखाए ! अम्बानी या मनमोहन सिंह के घर की पार्टी आप दिखाए लेकिन ये भी जरुरी है की गाँवो में अस्पताल और स्कूल नहीं है तो उसे भी दिखाये ! यह भी जरुरी है आप किसी अभिनेता या राजनेता की उपलब्धी दिखाए लेकिन उस बच्चे की समस्याए जरुर दिखाए जिसके पास पढने के लिए किताबे नहीं है !
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है आप, जनता के लिए भरोषा है आप फिर भी उस निकम्मी सरकार  के आगे बिक जाते है आप !
मै अन्ना हजारे जी की इस पकती से पूर्णतयः सहमत हूँ : "गांव के विकास का मतलब नई पंचायत इमारत का निर्माण या मौजूदा इमारतों की ऊंचाई बढ़ाना नहीं है. इमारतों की ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ लोगों के सिद्धांत नीचे की ओर गिरते हैं. यह विकास नहीं है. विकास का मतलब लोगों को भीतर से मज़बूत बनाना है."
‘पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है, जिसे मज़बूत होना चाहिए, लेकिन चिंता की बात यह है कि इस स्तम्भ को भी घुन लग गया है.’

"सर्वशिक्षा-श्रेष्ठशिक्षा", एक छोटा सा कदम 'मलाला' के संघर्ष के नाम !!

वो दिन और थे जब पुरुष किसी महिला के बचाव में खड़ा होता था ! आज की महिलाए खुद के साथ साथ समाज की सुरक्षा करने में भी सक्षम है ! देश सेवा के लिए सेना में या राजनीती में हर जगह इन्होने अपनी शक्तिशाली छवि बनायीं हुयी है ! लेखनी की ताकत हो या उद्योग जगत की उचाई हर जगह इन्होने अपना परचम लहराया है ! ऐसा करने वाली महिलाओ व लड़कियों में भारत ही नहीं बल्कि विश्व के हर देश का अलग स्थान है ! गाँव की लड़की अब  शहर में आकर पढ़ती है, जमीन से आसमान तक का सफ़र तय करती
 है ! वही दूसरी तरफ यही माँ के रूप में 'प्यार' और ममत्व का भण्डार रखती है !
 तो यहाँ सोचना उन्हें है, जो अब भी अपनी माँ, पत्नी, बहन या बेटी को कमजोर मानते ! सोचना उन राक्षसों को है जो उनकी मजबूरी का फायदा उठाते है! 
16 साल की लड़की 'मलाल' का संदेस केवल महिलाओ या लडकियों के लिए नहीं है उसका यह सन्देश  सारी मानव जाती के लिए है ! संयुक्त राष्ट्र संघ में मनाया गया 'मलाला' का जन्मदिन सरे विश्व के लिए सन्देश है की अपने कर्म को इमानदारी और परिश्रम से करो, आज जो केवल कथन बन गया है उस पट अमल की जरुरत है !
मनुष्य के सबसे बड़े हथियार उसकी लेखनी होती है !
"मलाला" की अपील "चलो किताबें और कलम उठाओ. ये हमारे सबसे ताकतवर हथियार हैं. एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक कलम ही दुनिया को बदल सकते हैं. शिक्षा ही एकमात्र हल है." वास्तव में आज का  समाज सुधारने  का सबसे बड़ा हथियार है ! हमें किसी भी क्रांति की जरुरत नहीं होगी यदि सबको सही शिक्षा मिलने लगे !
तो बस जरुरत है छोटे से अभियान की
"सर्वशिक्षा श्रेष्ठ शिक्षा", एक छोटा सा कदम मलाला के संघर्ष के  नाम ! 

जनता ही हमेशा पीड़ित क्यों राजनेता क्यों नहीं : अंकुर मिश्र "युगल"

आखिर वो समय जल्द जल्द ही आ रहा है जिसका नेताओ  इन्तजार रहता है , जनता इनकी गलतियों का खामियाजा भुगतती है  यही घटनाएँ इन नेताओ के हथियार होते है !
इनके निवारण के लिए बात कोई नहीं करेगा बात होगी  तो बस 'तुमने क्या किया और तुमने क्या किया?" ! 
छत्तीसगढ़ में नकसली हमले हुए उसमे बड़े बड़े वादे हुए, मारे गए सुरक्षाकर्मियों के लिए 'ये करेगे वो करेगे' लेकिन ये सब करना तो दूर वहां एक और एसपी को मार डाला गया और सरकार के बस वादे रह गए ! 
यदि ख़ुफ़िया विभाग ने दो जुलाई तक सतर्कता बरतने के निर्देश दिए थे तो ये घटना कैसे हुए और इसका जिम्मेदार कौन है ? 
ये किसकी नाकामी है ?........
वही दूसरी तरफ उत्तराखंड विपदा में राजनीती हो रही है ! 
वहां की सफाई और समाधान की बाते न करके बात हो रही है , 
आखिर जिम्मेदार कौन है ? 
प्रकृति ? 
कांग्रेस ?
 भाजपा? 
या कोई और ?....
सरक्रार त्याग पत्र दे , विपक्ष सप्ता को काम नहीं करने दे रहा है आदि बाते ही नेताओं का आधार है तो बेचारी जनता क्या करे ! 
उसे तो हमेशा पीड़ित ही रहना पड़ेगा !
बिहार में बम ब्लास्ट हुए , घायल कौन हुआ ? कौन कौन मरा ? किसकी संपत्ति में घाटा हुआ? इस बात Se किसी को मतलब नहीं है !
कांग्रेस के एक समझदार नेता दिग्विजय सिंह , तुरंत बोले इसमे कही मोदी का हाथ तो नहीं है !
भाजपा से किसी ने कहा नितिश कुमार की सुरक्षा व्यवस्था में कमी है ! 
कुछ विशेसग्य इस बहस में लग गए की ये धमाके क्यों किये गए ! 
अब इन्हें कौन समझाए ये सरे काम पहले ही निपटा लेने चाहिए थे ! 
नेताओ की आपसी बहस के बीच बेचारी जनता और कब तक पिसेगी ! ये सब राजनीतिग्य क्यों नहीं भोगते !
हमारे  देश की यही विडंबना है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता ! पर जनता जागरूक हो रही है और वह नेताओ की ड्रामेबाजी को समझने लगी है ! 

नेता जी आप इतने समझदार होते तो देश का विकास ही कर रहे होते : अंकुर मिश्रा "युगल "

    उत्तराखंड जिस परिस्थिति से गुजर रहा है  के सभी नागरिको, संस्थाओ को राजनैतिक दलो को मिलकर सहायता करने करने  जरुरत है ! जहाँ हजारो जाने जा चुकी है, और अभी भी हजारो जाने फसी हुयी है , मुझे नहीं लगता ऐसे समय में भी किसी को लड़ने  की जरुरत है ! मेरा सलाम   है उन भिखारियों को जिन्होंने अपने भीख के मांगे गए पैसो से  सहायता में सहायता की , उन रिक्शा चलाने  वाले चालको को जिन्होंने अपने पेट काटकर उत्तराखंड के लोगो को सहायता पहुचाई !  सेना के उन जवानो को जो अपनी जान पे खेलकर लोगो की सहायता करने पहुच गए , और उसमे कुछ सहीद भी हुए ! उन सभी सहायता प्रदात्ताओ को सलाम है जिन्होंने किसी भी तरह से देश की  कठिन परिस्थित में सहायता की !
      लेकिन यहाँ  दिल  दहलाने वाली बात  ये है की जिनसे ऐसे समय पर  ज्यादा सहायता की उम्मीद होती है वही सरकार निकम्मापन  दिखाती है, खुद के राजमहलो में हजार रुपये की पर प्लेट पर भोग चलाते है और बाहर आकर  से गुजारिश करते है की उत्तराखंड की सहायता करे, जनता तो सहायता कर ही देगी ! लेकिन क्या इतनी  समझ नहीं है की  यदि एक दिन ये राजभोग नहीं खायेगे तो देश के  कुछ जरुर कर सकते  है ! 
            वही  दूसरी कहानी दो नेता   उत्ताराखंड जाकर इसलिए लड़ते है की वो जनता की सहायता करेगे ! अरे मालिको आप दोनों मिलकर भी सहायता कर सकते हो ! 
        विपत्ति है !  खैरियत  रहे कभी आप पे न आये, नहीं तो कोई सहायता के लिए भी नहीं आएगा ! 
एक  प्रदेश  मुख्यमंत्री वहा सहायता के लिए जाते   है तो उसके लिये खबरे उडती की  अपने लोगो को बचा लिया बस, अरे इतना तो एक साधारण आदमी भी सोच सकता है की जो काम सेना दस-पंद्रह दिनों में नहीं कर पायी वो काम कोई एक दिन में कैसे   कर सकता है लेकिन ये तो नेताओ की खाशियत है की किसी दूसरे नेता की अच्छाइयों को देख ही नहीं सकते है ! और ये मामला वही  नहीं रुक  , बिहार के महाबुद्धिमान  मंत्री जी भी बोल पड़े 'हम दिखावा नहीं करते' अरे  दिखावा तो यही  बोलकर कर दिया मान्यवर ! खैर आपमें इतनी समझ होती तो आप देश के विकास में ही  सहायता नहीं करते ! एक ऐसे दल और व्यक्ति से अलगाव नहीं करते जिससे देश को कुछ सम्भावनाये  है !
 वैसे इन राजनैतिक बातो का कुछ मतलब  नहीं था यहाँ लेकिन वास्तविकता से  भी नहीं भागा  जा सकता और कभी भी याद आ जाती है ये तो !

यहाँ मेरी यही गुजारिश है  नेता जी आप कृपया शांति  बनाये रखे, आपका  चुनाव समय अभी दूर है आप उसी में बोलियेगा !  अभी जनता को जो करना है वो कर रही है !