क्या सच में 'नमो ! नमो ! नमो ! ' हो सकता है ? :अंकुर मिश्र 'युगल'

     नमो ! नमो ! नमो ! की गूंज ने जिस तरह से पूरे देश में तहलका मचा रखा है क्या वो सच में देश का उद्धार करने में सक्षम है ! नरेंद्र मोदी देश के लिए आज एक ऐसा नाम है जिसे प्रधानमंत्री बनाने के लिए लगभग सभी की मुहर लग चुकी है ! यहाँ सभी से मतलब उस अधिकतम प्रतिशतता से है जो इन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें देखना चाहते है , प्रसंशको में देखे तो इनके विपक्ष के राजनेता भी इस सख्शियत में देश का अगला प्रधानमंत्री देख रहे है ! इन सबके पीछे है केवल एक कारण गुजरात का विकास ,
गुजरात में इन्होने 'रूरल' और 'अरबन' दोनों  क्षेत्रो को ध्यान में रखकर 'ररबन' विकास की जो नीव राखी उसकी सराहना केवल भारत में ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में हुयी ! विश्व की बड़ी सभाओ में अपने विकास के कदम बताने के लिए बुलाये जा चुके नरेन्द्र मोदी क्या सच में देश के अगले प्रधानमंत्री हो सकते है ये भाजपा से लेकर सभी पार्टियों केसामने बड़ा प्रश्न है ! देखा जाये तो खुद नरेन्द्र मोदी ने अपनी इस मुहीम के लिए प्रचार प्रसार शुरू कर दिया है ! बाबा रामदेव से मिलना , भाजपा के बड़े नेताओ को बार बार गुजरात बुलाना , कई बार दिल्ली आना , बड़ी सभाओ के राजनैतिक भाषण तो यही दिखाते है की वो खुद को वो भाजपा से अगली पंचवर्षीय के प्रधानमंत्री पद के दावेदार मान चुके है !
     लेकिन अभी भी प्रश्न अनेक है , क्या केवल उनके या आम जनता के सोचने से वो प्रधानमत्री बन जायेगे ??
उनकी राजनैतिक प्रष्टभूमि जो रही है क्या उनके प्रधानमंत्री बनाने के लिए सही   है  ? क्या देश को ऐसा प्रधानमत्री चाहिए जो देश के लिए कभी भी सांप्रदायिक हो सकते है ?
     इन सभी प्रश्नों के आलावा उनके सामने अनेक ऐसे प्रश्न भी है जिन्हें उनकी खुद की पार्टी ने खड़ा किया है , कई बार लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा भाजपा अभी भी उनके स्वप्नों की पार्टी नहीं है , पार्टी के अन्दर ही कई राजनेता उनके प्रधानमंत्री बनाने का खिलाफ है, और खुद नरेन्द्र मोदी क्या अपने राजनैतिक गुरु लाल कृष्ण आडवानी के होते हुये प्रधानमंत्री बनना चाहेगे !





अभी कुछ समय पहले नरेन्द्र मोदी ने इण्डिया टुडे के एक सम्मलेन में कहा- जनता उन्हें बुला रही है , जनता उनसे कह रही है भारत को भी गुजरात बनाना है !
आखिर ये शब्द उन्होंने सुने कहा से , क्या राजनीती में कल्पनाओं में ही सच्चाई है ? यदि देश की जनता उन्हें बुला रही है तो वो पिछले लोकसभा चुनावो में क्यों नहीं आये !  खैर मामला कुछ भी लेकिन मामला संदिग्ध है ! जिस तरह से उन्होंने जल्दी जल्दी में ही बाबा रामदेव , आर.एस. एस. प्रमुख , भाजपा प्रमुख से नजदीकियां बढ़ने की कोशिश की है इससे तो यही लगता है उन्हें प्रधानमंत्री बनने की बहुत जल्दी है और वो इसके लिए खुद को उम्मीदवार भी घोषित कर चुके है !

अरे ये तो चिदंबरम बजट था : अंकुर मिश्र 'युगल'

ये बजट देश के लिए था, चिदम्बरम के लिए या कांग्रेस के लिए ये किसी को नहीं पता ? मेरा तो यह कहना है की बजट किसी के लिए भी हो लेकिन आम आदमी के लिए नहीं था ! जिस सरकार द्वारा वादे किये गए थे की विकास दर दहाई के अंको तक पहुचाया जायेगा उसको जनता के सामने लाने पर दहाई के अंको में सरकार खुद फसती नजर आई ! कही ये विकास दर ५-६ के अंक से घटाकर २-३ पर न पहुच जाये ! कहा जाता है इस बार के बजट में सबसे ज्यादा ध्यान छात्रो का रखा गया है लेकिन इस घटती विकास दर में सबसे जयादा भी उन्ही युवा छात्रो के रोजगार को है ! मुद्रास्फीति की बात करे तो देखते है की जिसे दस से नीचे होना चाहए अभी भी वो दस के ऊपर ही है ! मुद्रास्फीति : सरकार के द्वारा खर्च किये गए खर्चो पर निर्भर करता है ! ये दहाई की मुद्रास्फीति अभी भी यही दिखाती है की सर्कार के खर्चो में कोई कटौती नहीं हुयी है ! कटौती हुयी है तो जनसँख्या के उस महकमे में जिसमे ९० % लोग रहते है ! पिछली सरकार से ही देख रहे है किसी चीज में कटौती नहीं देखि गयी है रोजाना प्रयोग के सामान के मुल्य में बध्होत्तरी, सब्जी के मुल्य में बराबर बढ़ोत्तरी , पेट्रोल डीजल , गैस के मूल्यों में बराबर बढ़ोत्तरी , बस बढ़ोत्तरी -बढ़ोत्तरी और बढ़ोत्तरी !! और इस बढ़ोत्तरी से सबसे ज्यादा परेशां होने वाले लोगो में है वो आम आदमी जिनके पास हनकी जीविका के लिए भी पैसे नहीं होते ! उनका क्या होगा ?? निजत न तो सरकार के पास है और न ही विपक्ष के पास ! सरकार के पास इस विकास दर की कमी के कारण तो नहीं लेकिन बताने के लिए ये जरुर है की 'चीन और इंडोनेसिया की विकास दर तेजी से बढ़ रही है' ! क्या उनकी विकास दर सुनाने से हमर पेट भर जायेगा या फिर हमारी विकास दर बढ़ जाएगी ! जिस देश में गुजरात जैसे राज्य अपने आप में विकास की परिभाषा है क्या वह चीन और इंडोनेशिया को देखने की जरुरत है ! क्या देश के अन्दर ही रहकर ऐसे मुद्दों में विचार करने की जरुरत नहीं है ? कुछ भी ऐसे बजट से कांग्रेस के इंडिया ड्रीम का सपना तो पूरा होने वाला नहीं है और यदि आंगे विपक्ष भी सरकार के इस रवैये को ऐसे ही स्वीकार करती रही तो २ १ वी शताब्दी में भी उसे सर्कार बनाने का मौका नहीं मिलेगा ! विकास देश की नहीं आम आदमी की जरुरत है ! और इसमें तो अंत में यही कहा जा सकता है की ये बजट स्विस बैंक के खता धारको को ध्यान में रखकर लाया गया है , इसमे बड़े बड़े उद्योगपतियों का ही ध्यान रखा गया है ! तो इसे आम बजट कैसे कह सकते है ! ये तो चिदम्बरम बजट ही कहलायेगा न ...!!



लगता है 'ओवैसी और कसाब' की सजाओ से काफी दुखी है शाहरुख : अंकुर मिश्र 'युगल'

आज कल के दिनों में देश के नए नए जुमलों को मुद्दों के ऊपर में उठाने की जद्दोजहद बराबर चल रही है ! देश में मिडिया के पास या तो खबरे नहीं है या जो मुद्दे की खबरे है वो दिखाना नहीं चाहते ! उसी का नतीजा है देश में शिंदे जैसे ‘गुंडे’ बिना मतलब में जनता के सामने आ जाते है ! शाहरुख खान जैसे मंद-बुद्धि अपनी खोई हुयी छवि को फिर से बटोरने लग जाते है ! जिस व्यक्ति ने अपने छोटे से परिवार के बाहर निकलकर कभी भी देश के लिए कुछ नहीं किया हो ? फिर भी जिस देश ने उसे सिर पर चढ़ाकर वो छवि दी , जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी ! वो व्यक्ति आज बोलता है उसे उसी समाज से खतरा है ! आखिर इस वक्तव्य का मतलब आम आदमी क्या सोचे ?? मेरे विचार से इस व्यक्ति के अंदर ओवैसी या कसाब जैसे विचार पनप रहे है ! जब उसके सामने उन व्यक्तियों का जनाजा उठा तो कुछ ख़यालात सामने आये ? उसे लगा अब तो इस देश में कुछ हो सकता है ! या फिर , क्या पाकिस्तान के उन भाइयो का ख्याल आ गया जिनके साथ मिलकर आतक फ़ैलाने का कुछ विचार हो ? वैसे भी पुरातन परम्परा है उस पाकिस्तान की , विकास के लिए भीख लेकर तबाही भेजने की ! और आप तो उस पहली हसरत में कामयाब हो चुके है पैसा देश से ले चुके है , तबाही की मुहीम में निकलने का इरादा ....................................................! और हाँ एक बात और याद आती है इस्लाम के जनक कहने वाले ‘ जाकिर नाइक’ के साथ भी आपके कभी अच्छे समबन्ध है ! यहाँ बात उन संबंधो की नहीं है बात है उनके आदर्शो की जो दूसरे धर्मो को हमेशा गलत बताते है ! क्या उनके साथ मिलकर कुछ करने का इरादा तो नहीं है ?? ये आपके वक्तव्य के बाद उत्पन्न हुए एक सामान्य भारतीय के विचार है ! हो सकता है ये बिल्कुल ही निरर्थक हो ! लेकिन ये भी हो सकता है ऊपर की किसी एक बात में एक प्रतिशत भी सच्चाई हो ! भाईसाहब देश में ‘दिलीप कुमार’, नासिर , अमजद खान, जीनत अमान, जावेद अख्तर अदि अनेक ऐसे मुस्लिम कलाकार हुए है लेकिन उन्हें कोई खतरा नहीं हुआ ! ये वो देश है जहा एक अंग्रेज महिला की पार्टी से सिख्ख व्यक्ति को चुनकर देश के मुस्लिम राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाई जाती है और वो भी वहाँ के लिए जहां ८० प्रतिशत से ज्यादा केवल हिंदू रहते है ! ऐसे देश देश के अंदर एक सामान्य व्यक्ति को खतरा नहीं होता और आप कहते है आपको खतरा है ! आप को बताना होगा आखिर अपके इस बयां के पीछे ख्याल क्या आया ?? यदि यह केवल व्यंग था तो आपने अपने उस खेमे में ठोस पहुचाया है जिअकी जमीं पर अआप खड़े हो ! और अगर इस बात के पीछे कुछ मकसद है तो ..................... उसे देश जानना जोर चाहेगा !! एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी फिल्मो के माध्यम से देश में प्यार की भावना फैलता है उसका वक्तव्य आता है की उसे देश के अंदर ही खतरा है ! आखिर क्यों ? यहाँ इस क्यों के पीछे प्रश्न तो कई है लेकिन उत्तर तो खुद वही दे सकते है !!

वंशवाद से नहीं विकासवाद से चलता है देश : अंकुर मिश्र 'युगल'

आखिर कुछ आच्छा दिखने लगा भाजपा में, एक बुरे दौर से गुजर रही भाजपा ने लोकसभा चुनाव के पहले कुछ अनोखे पहलुओ पर काम करते हुए देश को दिखा दिया की ये किसी परिवारवाद पर चलने वाला दल नहीं है ! वास्तव में जिस देश में दो दलों की ही सरकारी दावेदारी रहती हो , और उसमे भी एक दल ऐसा है जिसे लोकतान्त्रिक दल खा भी नहीं जा सकता ! कांग्रेस, जो अपने आप को देश का सबसे बड़ा दल कहता है और आजादी के बाद सबसे ज्यादा शासन किया है लेकिन मेरे अनुसार यह एक ऐसा दल है जिसने देश में सबसे ज्यादा कुशासन किया है और देश की आजादी के बाद की सभी लड़ाइयाँ गवाह है, पाकिस्तान गवाह है की इस बड़े दल ने देश को क्या दिया है ? एक लोकतान्त्रिक दल में राजतन्त्र जैसा माहौल पैदा करके इस दल ने जिस तरह से तानाशाही भरा शासन किया है, वह अनदेखा नहीं है ? एक दल जिसकी बागडोर हमेशा एक परिवार के हाथो में रही, पार्टी में अनेक महान नेताओ के होते हुए बड़े पदों पार हमेशा ऐसे राजनेताओ को बैठाया गया जिन पर गाँधी परिवार खुद शासन कर सके , मनमोहन सिंह जिसका सबसे बड़े उदहारण है ! पार्टी में अनेक ऐसे बड़े नेताओ के होते हुए ‘राहुल गाँधी’ उपाध्यक्ष का पद दिया जाना और अध्यक्ष का पद खुद सोनिया गाँधी के पास होना किसी लोकतान्त्रिक दल को नही दिखाता, पार्टी में जयराम रमेश, शशि थरूर अवं अनेक ऐसे युवा नेता है जो देश को राहुल गाँधी या गाँधी परिवार से अच्छा चला सकते है लेकिन उन्हें इस दल में ऐसे पद न मिलना किसी तानाशाही को ही दिखा सकता है ! वही देश में दूसरी तरफ एक ऐसा दल है जो अपनी आपसी लड़ाइयो से ही जूझता रहता है, दल मेंकुछ अच्छाइयां है जो इसे कांग्रेस से अलग करती है पहली बात पार्टी में किसी वंशवाद का न होना देश के सभी धर्मो के लोगो को पड़े पदों में बैठालना. इसी दल ने देश को अटल बिहारी बाजपेई जैसे प्रधानमंत्री व् आब्दुल कलम जैसे राष्ट्रपति दिए है ! पड़े पदों में उस व्यक्ति को बैथालना जो उपयुक्त है ! आभी वर्तमान में नितिन गडकरी को हटाकर राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाना इस बात को ही दिखता है को भाजपा केवल आर. एस . एस. के इशारों पर नहीं चलत और जारुरत पडने पर उसका साथ भी नहीं छोडती ! यह भाजपा का समर्थन नहीं था बल्कि वह सच्चाई थी जिसे देश बराबर नजरंदाज कर रहा है, जानते हुए भी अपना भला करने में असमर्थ है ! एक विकाशशील देश को दशको से वही पर खड़ा किये है ! देश वंशवाद , जातिवाद , आरक्षण, भरष्टाचार से नहीं चलता देश बढ़ता है विकास से और हम विकास नहीं निकास कर रहे है एक साच्ची बात से !

ओवैसी प्रश्न तो बहुत है , सामने होता तो जरुर पूंछता : अंकुर मिश्र ‘युगल


‘ओवैसी’ के पागलपन को आखिर हिंदुस्तान किस तरह स्वीकारे ? वह व्यक्ति जिसे जनता के बहुमत से सरकार का हिस्सा बनाया गया है उसके वक्तव्यों को १२५ करोड़ की जनता किस रूप में स्वीकारे !
उसने देश के हिन्दुओ को ही अनादरित नहीं किया उसने तो उन सच्चे मुसलमानों का भी आपमान किया है जिनका मुस्लिम धर्म खुद सिखाता है दूसरे धर्मो की इज्जत करना !
और कब तक इरादा है बातचीत से काम चलने का , एक तरफ शांति का के लिए क्रिकेट मैच होता है वही दूसरी ओर भारतीय सिम के अंदर घुसकर अपनी नामर्दानगी की ताजपोशी करता है हमारा पडोसी देश ! हमने जिसे हमेशा अपनी मौसी का दर्जा दिया है, हमने जिस देश की हरकतों को हमेशा नासमझ समझकर माफ़ किया , जिसके लिए हमेशा हमने शांति का पथ पढ़ा है आज वही भाई फिर से अपनी तुच्छ हरकतों पर उतर आया है ! सोते हुए सैनिको को मारना कही की मर्दानगी या जज्बा नहीं होता ! जज्बा दिखाना है तो बोलकर देखो एक बार ! हम शांत है ये हमारी सराफत है , कमजोरी नहीं ! वाही दूसरी तरफ हमारी ही मिट्टी में रहकर हमें ही दोषी ठहराने वाले उस ओवैसी के लिए तो कसाब की सजा भी कम है ! वैसे तो हमने कभी जताया नहीं है फिर भी यदि जबाब सुनने का मन है तो देश १०० करोड़ हिंदू नहीं बल्कि एक सच्चे दिल के मुस्लमान से ही पूंछ लो नासमझ ‘ओवैसी’ वो तुम्हे बता देगा की तुम्हारा खुद का धार्मिक स्टार कितना गिरा हुआ है !
तुम किस कसाब के लिए बात कर रहे हो जो खुद को दोषी ठहरा चूका था !
१०० करोड़ हिन्दुओ का मुकाबला तुम २५ करोड़ मुसलमानों से करोगे ?? अरे पहले अपने उन २५ करोड़ मुसलमानो से तो पूंछ लो क्या वो तुम्हारे साथ है ? चंद किराये के टट्टुओ को इकठ्ठा करके तालियाँ बजवाना शक्ति प्रदर्शन नहीं होता !
ओवैसी तू हिन्दुओ के भागवानो की बात करता है, यही हजारों भागवान तेरे २५ करोड मुसलमानों की जीविका बनाते है ! खैर तू इतना समझदार नहीं है अपने उन भाहियो की भावनाओ को समझ सके !
तू बाबरी मस्जिद की बात करता है ? तू ताजमहल की बात करता है ? तू लालकिला, जामा-मस्जिद यहाँ से लेकर जायेगा ? ............... क्या ये सब करने में तेरे साथ और कोई होगा ?
ऐसे ही अनेक प्रश्न है तुझसे , तू सामने होता तो एक पत्रकार और लेखक की हैसियत से जरुर पूंछता ! दिल में एक और तमन्ना है यदि तू सामने होता तो हिन्दुस्तानी होने के नाते एक ‘थप्पड़’ जरुर लगाता, ये एक हिंदू होने के नाते नहीं होता बल्कि ये एक मानुषी होने के नाते होता ! शायद उससे एक जानवर रूपी शारीर में कुछ फर्क पड़ता !

धार्मिकता या शर्मिंदगी : अंकुर मिश्र ‘युगल’

धार्मिकता या शर्मिंदगी ?? जब देश एक गंभीर समस्या से गुजर रहा है जहां एक बेबस और लचार लड़की ने अपनी जान गवाई, जिसके लिए कानून और सरकार सुधार के रास्ते ढूड रहे है ! देश के हर कोने में प्रार्थना सभाए हो रही है की भविष्य में ऐसी दरिंदगी न हो ! एक लड़की को कुछ दरिदे घेरकर देश के सामने एक दरिन्दागी की नीव रखते है जो पुरे देश के लिए शर्मनाक है ! सभी ऐसे कामो के न होने की प्रार्थना करते है और उन दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की पेशकस करते है ! खुद देश के पूर्व न्यायधीश ने कहा की ‘अपराध सजा देने से कम होते है सजा की कठोरता बढ़ाने से नही’ , और यह सत्य भी है एक महीना से ऊपर होने वाला है इस अत्याचार को लेकिन अभी तक उन दरिंदों को कोई सजा नहीं मिली है ! लेकिन इस बिच अनेक ऐसे बलात्कार के मामले सामने आये जो दिल दहला देने वाले थे ! आखिर इसका मतलब क्या समझा जाये, उस नादान की मौत का कुछ भी असर नही हुआ इन हैवानो पर या फिर वो ये दिखाना चाहते है की हमारे देश की कानून व्यावस्था कितनी लाचार है ! लोग कहते है
“ वो तो सो गयी , लेकिन हमें जगा गयी”
तो वो जाग्रति कहा है ? इसके आलावा देश के धार्मिक और हिंदुत्व के पालनहर काह्लाने वाले बापू आशाराम और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मोहन भागवत के वक्तव्यों को क्या समझा जाये जो इस समस्या का समाधान का हिस्सा न बनकर बल्कि उस लड़की को दोषी ठहरा रहे है ! आखिर इन ढोगियो को अध्यात्म गुरु की संज्ञा ही क्यों दी जाती है देश हित में बात नहीं कर सकते तो कम से कम अहित की बात तो न करे ! आखिर उनकी सोच का नजरिया क्या है ?? जिस लड़ाई में समाज की सबसे ज्यादा भूमिका होनी चाहिए उस समाज के सब्भ्रांत लोग ही ऐसे वक्तव्य देते है , इनकी जिम्मेदारी का सूचक है या मानसिक असंतुलन का ! कुछ भी हो देश की इस अहम लड़ाई में समाज की जागरूपता सबसे ज्यादा जरुरी है और दूसरा यह की इन मानसिक असंतुलित ढोगियो को नसीहत देने की जरुरत नहीं है !
अब तक लड़े है , अब भी लड़ेगे ! कल तक खड़े थे , आज भी खड़े है ! अब नहीं है वो तो क्या हुआ ? उसकी शक्तियां हम पर है दुआ !!

‘सचिन और आडवाणी’ दोनों को जरुरत है सन्यास की : अंकुर मिश्र ‘युगल’

देश को अपने-अपने क्षेत्र में महान उपलब्धिय दिलाने वाले दो महानायक सचिन और अडवाणी, आज प्रत्येक देशवाशी के लिए समस्या बने हुए है ! क्रिकेट के लिए उपलब्धियां की मशाल रचने वाले सचिन ने देश के लिए जो क्रिकेट में योगदान दिया है वह वास्तव में सराहनीय है ! एक् १६ साल के लड़के ने जिस तरह से क्रिकेट में आकर देश को वो उपलब्धि प्रदान की जिसके लिए टीम तरश रही थी, इसके पहले टीम में गावस्कर , कपिल देव और बिशन सिंह बेदी जैसे खिलाड़ी तो थे लेकिन इन सबके बावजूद क्रिकेट में भारत का विश्वमानचित्र में कोई आस्तित्व नहीं था, खिलाड़ी तो खेलते थे लेकिन जीतने के लिए नहीं, केवल हार से बचने के लिए ! लेकिन इस महानायक के आते ही विश्व के गेंदबाजों के छक्के छूट गये ! टीम ने २००७ में २०-२० विश्वकप जीता, २०११ में विश्वकप जीता और हजारों के तादात में रन बना डाले, इनके हर रन के साथ एक् नया रिकार्ड बन जाता है ! लेकिन अब इस बल्लेबाज का पदार्पण उस उम्र में हो चूका है, जिस पर किसी भी क्रिकेटर का खेलना नाजायज है , आलोचक प्रतिदिन नए-नए शब्द ढूढते है, और सत्य भी है विश्व के किसी भी क्रिकेटर ने इस उम्र तक क्रिकेट नहीं खेला, और इसीलिए जरूरत है इस महानायक को सन्यास लेने की जिसके बाद टीम में युवाओ को मौका मिल सके ! वही दूसरी ओर है राजनीती के महानायक लाल कृष्ण आडवानी, जिन्होंने जनता पार्टी को तब संभाला जब भारतीय राजनीती में इस पार्टी का कोई अस्तित्व भी नहीं था , कोई भी इसे स्वीकारने को तैयार नहीं था, नब्बे के दसक में इस पार्टी को लोकसभा चुनाव में २ सीटे ही मिल पाई, लेकिन अगले ही चुनाव में जिस तरह से आडवाणी का हिंदुत्व का जादू चला, ऐतिहसिक है ! इनके पहले पार्टी में नेता तो थे लेकिन उनका आस्तित्व नहीं था , राममंदिर का मुद्दा केवल मुद्दा बना हुआ था, इस महानायक ने हिंदुत्व के लिए जो जागरूपता देश भर में लायी वो वास्तव में सराहनीह है ! उनकी रथ यात्रा में वो जादू चला की अगले ही चुनाव में पार्टी ने इतिहास रच डाला, और देश को अटल बिहारी बाजपेयी जैसे प्रधानमंत्री दिए ! लेकिन वो अभी भी प्रधानमंत्री के प्रतीक्षा सूचि में है और भाजपा के भावी प्रत्यासी बने हुए है ! पार्टी में सुषमा स्वराज , अरुण जेतली और नरेन्द्र मोदी जैसे भावी नेता है लेकिन इन सबके बावजूद इस पार्टी में आज की जो खलबली है, वो पार्टी के भविष्य में खिलाफ है ! समस्या एक् है इस महानायक जिनकी उम्र ८० वर्ष से ज्यादा है और फिर भी पार्टी को जकडे हुए है ! समस्या दोनों के साथ एक् जैसी है, हिंदुत्व के महानायक और क्रिकेट के बादशाह दोनों की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता पर आज के आज की जरुरत है दोनों के सन्यास की ! इनका सन्यास ही आज के भारतीय क्रिकेट और भाजपाई राजनीती का हल हो सकता है !

वालमार्ट के पास है दो ही विकल्प , रुकेगा या लूटेगा : अंकुर मिश्र "युगल"

इतिहास गवाह है भारत में जितने भी विदेशी आये है उनके पास केवल दो ही विकल्प थे : उन्होंने या देश को लूटा है या फिर यही पर बस गए है ! मुग़ल शासको ने देश में आक्रमण किया लेकिन उनकी नीति देश को लुटाने की कभी नहीं थी, उन्होंने यही बसकर अपने परिवार के साथ जीवन यापन किया ! लेकिन वाही यदि हम अंग्रेजो के शाशन काल में नजर डाले तो विपरीत था , उन्होंने देश में आना इसलिए उचित समझा क्योंकि हम सोने की चिड़िया थे और हमें खोखल करना उनका लक्ष्य था जो उन्होंने किया और बाद में किसी अंग्रेज शासक ने ये भी लिख दिया की हम तो मुठ्ठी भर लोग आये थे भारत से एक् पत्थर ही कफी था हमें भागने के लिए, लेकिन अब कोई क्या कर सकता है उस अंग्रेज का और हमारे जैसे भारतवासियों का जो उन नेताओ के गुलाम बनकर बैठ जाते है जीनको वो खुद चुनकर भेजता है ! जिस तरह से किसी समय में पेप्सी और कोक ने देश में पदार्पण किया था और हम नेताओ की सुनते रहे थे और हसते हसते आज गुलाम बन बैठे है इसी तरह हो सकता है वालमार्ट भी एक् दिन हमारा राजा बन बैठे लेकिन ऐसी केवल कल्पना की जा सकती है ! हमारे नेताओ में संसद में जिस तरह से वालमार्ट को लेन की जद्दोजहद की वो वास्तवमें सराहनीय है, विरोध करने वालो की कुतर्क और पक्ष में होने वालो के तर्क अब तक जनता के समझ में नहीं आये ! जिस वालमार्ट को जनता के लिए लाया जा रहा है उस जनता से तो एक् भी बार नहीं पूंछा गया की ये आना चाहिए या नहीं ! राज्यसभा और लोकसभा के अंदर आपस में आंखमिचौली खेलकर एक् और प्रधितना की जंजीर जकड दी नेताओ ने देश पर ! और सबसे सरल बात तो यह है की ईस्ट इण्डिया कंपनी ने कोलकता से पदार्पण किया था तो उसे दिल्ली तक आने में समय लगा लेकिन इस वालमार्ट का पदार्पण तो दिल्ली से ही हो रहा है तो उसे तो और सरलता होगी अपने लक्ष्यों को पाने में ! वो चाहे तो देश में रुक सकता है या फिर लूट कार यहाँ से जा सकता है ! भारत के अंदर अभी तक व्यापारिक कंपनियों ने दो ही रवैये अपनाए है, अब सोचना वालमार्ट को है ! अभी एक् नए दल आम आदमी के मुखिया ने कहा की वालमार्ट के लिए जन-मत होने चाहिए, उन्हें तो जनता के बारे में यही सोचना चाहिए जिस देश में कसाब और अफजल गुरु जैसे आतंकवादी को सालो तक मेहमान बनाकर रखा जाता है , भ्रष्टाचार को रोकने लिए कोई कड़ा कानून नहीं होता, पेप्सी और कोक जैसी बाहरी कंपनियों का शाशन होता है वहाँ इस वालमार्ट के लिए कैसा जनमत ! यहाँ तो यह कहना अनुचित नहीं होगा की जनता का जनमत केवल एक् दिन होता है चुनाव में और उसी दिन उसकी कीमत होती है उसके बाद या पहले जनता केवल और केवल नेताओ की नौकर(सेवक) होती है! इस देश में कैसा जन-मत ! यहाँ आज जन-मत की कीमत होती तो क्या करोड़ो के घोटाले करने वाले कलमाड़ी , यदुरप्पा जैसे नेता जिन्दा होते है ! जनता का काम है सर्कार द्वारा थोपे गए कानूनों पर अम्ल करना ! उनके द्वारा आपस में आरक्षण औअर क्षेत्रवाद की राजनीती में हिस्सा लेना बस !

देश की दशा पर दिल से नहीं दिमाग से सोचने की जरुरत है : अंकुर मिश्र ‘युगल’

देश में परिवर्तन के लिए हमेशा से लोकतान्त्रिक परिवर्तन की जरूरत रही है, वैसे तो आज की राजनीति को देखते हुए देश में लोकतंत्र है , ऐसा सोचना भी गुनाह है ! देश को बुरी तरह से तानाशाही सरकार ने जकड़ रखा है, और वो भी ऐसे दल ने जिसे देश की आजादी में प्रमुख सहायक माना जाता रहा है ! जिसके जवाहर लाल नेहरू जैसे नेताओ की वास्तविकता को नकारते हुए लोग आदर्श मनते है, जिस दल ने ५० से ज्यादा सालो तक आजाद देश में शासन किया हो और देश की हालत उस मझधार तक न पहुच पाए जहां के लिए वो वांछनीय हो ऐसी सरकार को क्या कहेंगे ?? कहने को तो इस दल में विद्वानों का भंडार है लेकिन उनकी विद्वता का इस्तेमाल आखिर किस देश के लिए होता है ? देश की वर्तमान समस्याओ को बताने की जरुरत नहीं है एक साधारण आदमी भी प्रत्येक समस्या से अवगत है ! जरुरत है निवारण की और निवारणकर्ता की ! ऐसी समस्याओ को देखते हुए हुए देश के राजनैतिक गलियारे में एक नए दल का आवरण, हो सकता है देश को एक नई उर्जा प्रदान करने में सहायक हो सके ! अरविन्द केजरीवाल जिस व्यक्ति को आज किसी पहचान की जरुरत नहीं है ! देश में समाज सेवक से राजनेता की ओर मुडने वाले इस व्यक्ति ने पिछले एक साल में समाज सेवक अन्ना हजारे के साथ जन जागरण का जो कार्य किया है वो वास्तव में सराहनीय रहा है ! अब उनके इस राजनैतिक दल को जनता का कैसा नजरिया मिलता है यह देखने लायक होगा !
वैसे आज की नजर से देखा जाये तो देश की बिगड़ती समस्या के निवारण के लिए हमेशा किसी न किसी नए दल ने ही परिवर्तन किया है और आज के राजनैनिक दलों और राजनेताओ को देखते हुए फिर से एक बदलाव की जरुरत देश को है ! पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने कर्तव्य भूल चुके है ! दोनों का यह नजारा हिया दिन में संसद के अंदर कुर्सिय फेंकते है और रात में एक् साथ भोजन करते है , आखिर इसका मतलब क्या निकला जाये ?? क्या जनता इन पार्टियों के लिए ‘नौकर’ है !! जिस सरकार को आम जनता ने चुनकर वहाँ तक पहुछाया है जो देश के लिए नौकर है वो आज अपना पद भूलकर आम जनता को नौकर समझ रहे है ! जाब कभी भी मनुष्य अपना कर्तव्य भूलकर मालिक बनाने की गलती करता है तब-तब उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है ! अब बारी है इन तानाशाओ की ! अभी तक देश में कमी थी विकल्प की लेकिन आज देश को केजरीवाल ऐसा विकल्प दे सकते है जो इस भ्रष्टता को समाप्त करने में सहायक हो सकता है ! आज यहाँ भी अनेक सवाल खड़े हो रहे है , आखिर इन पर विश्वास क्यों करे ? इसके लिए एक् सीधा सा जबाब है : एक् बार आप जातिवाद , क्षेत्रवाद और सभी प्रकार के वादों को छोड़कर विकास के बारे में दिल से न सोचकर दिमाग से सोचो आपका दिल भी आपको इसी विकल्प की ओर इसारा करेंगे ! और ऐसा करने के बाद उन आलोचकों को भी जबाब दे सकते है ! ऐसा लगता है दिल्ली गलियों से ये आवाजे भी आती है ,जिन्हें भैसे चराना था वो सरकारे चलते है

गडकरी को भाजपा से नही भारत से निकालना चाहिए : अंकुर मिश्र 'युगल"

कभी विकास के लिए प्रसिध्धि पाने वाले महान राजनेता अटल बिहारी बाजपेई जैसे प्रधानमंत्री देने वाले राजनैतिक दल भाजपा की आज की राजनैतिक दशा इस तरह दयनीय हो सकती है , ऐसा शायद ही किसी ने सोचा हो ! जिस राजनेता को राजनीती की परिभाषा माना जाता है, जिसने अपने कार्यकाल में विकास के इतिहास रचे उस महानेता की पार्टी की इस दयनीय दशा का जिम्मेदार आखिर कौन है ?? इस प्रश्न का उत्तर किससे पूंछे, जनता से भाजपा के आलाकमान से या फिर खुद बाजपेई जी से ?? और वास्तविकता की नजर से देखे तो जनता और बाजपेयी जी से इस प्रश्न का उत्तर पूंछना भी मूर्खता होगी अंततः उत्तर की जिम्मेदारी आती है आज के भाजपा के नेताओ से, लेकिन क्या उनके पास किसी तरह का उत्तर हो सकता है ?? अब भी ये एक बड़ा प्रश्न है ?? इस राजनैतिक दल में महान नेताओ की कमी नहीं है, लेकिन किसी महान विचारक के कथन है : “किसी भी अच्छे और बड़े कार्य के लिए सञ्चालन का अच्छा होना अत्यंत आवश्यक है !” लेकिन क्या गडकरी और अडवाणी जैसे राजनेता भाजपा को सही सञ्चालन दे रहे है ?? जिस व्यक्तित्व के अंदर खुद के बोलने में नियंत्रण न हो , क्या वो किसी दल का नियंत्रण कर सकता है ! स्वामी विवेकानंद जैसे महपुरुष की तुलना आज के आतंकवादी दाउद से करना मूर्खता कहलायेगा या पागलपन ! जिस महापुरुष ने अपना जीवन देश सेवा के न्योछावर कर दिया उसकी बौद्धिक क्षमता की तुलना किसी भी देशद्रोही से करना खुद को देशद्रोही ही दिखाता है, और वो भी ऐसे राजनैतिक दल द्वारा जो आपकी ज्म्मेदारियो के लिए जाना जाता है ! गडकरी की इस मूर्खता या पागलपन से आतंक फ़ैलाने वाले समूहों को सकारात्मक सोच मिलेगी और देश में आतंक का शय बढ़ सकता है ! ऐसे वक्तव्यों के लिए गडकरी को देशद्रोही कहना अनुचित नहीं होगा ! उन्होंने इस कथन को क्यों कहा , क्या वो अभी तक अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगाये गए आरोपों से नहीं उबरे या फिर उन्हें खुद के भाजपा संचालक होने का घमंड है? कारण कुछ भी हो देश को ऐसे वक्तव्य एक गलत छवि देते है , और इस तरह के कारणों को देखते हुए उन्हें अपने सञ्चालन को छोड़कर देश से माफ़ी मांगनी चाहिए, जिस देश में भ्रष्टाचार के लिए आवाज उठाने वाले असीम त्रिवेदी जैसे व्यक्ति को जेल में डाला जा सकता है तो क्या आतंकवादियो की तुलना राष्ट्रपुरुष से करने वाले को खुले आसमान के नीचे घूमने देना खतरा नहीं दे सकता ! देश के अंदर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की आजादी नहीं है , उसके लिए जेल के दरवाजे तुरात्त खोल दिए जाते है तो क्या आतंकवाद फ़ैलाने के लए आजादी हों चाहिए ! यह प्रश्न जनता के लिए है और जनता को यह तय करना है की आखिर देख को कौन चलाएगा, आतंक को सह देने वाला एक व्यक्ति या कोई और !!